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मतवालों ने नहीं टेके घुटने, दिखाई सुबह-ए-आजादी
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मतवालों ने नहीं टेके घुटने, दिखाई सुबह-ए-आजादी
बुलंदशहर। देश को आजाद हुए आज 73 वर्ष पूरे हो गए। आजाद भारत की पहली सुबह देखने वाले हमारे कुछ जनपदवासी आज भी वो दिन याद कर प्रफुल्लित हो उठते हैं। अपने नाती-पोतों और बच्चों को उस समय की कहानियां सुनाते हैं। देश की आजादी में किए गए संघर्षों को याद कर आज भी उनकी बूढ़ी आंखों में वही चमक दिखाई देती है। किस तरह स्वतंत्रता की वेदी पर मतवालों ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया था, गांव, कस्बा, शहर और गली-मोहल्लों में लोग आजादी के तराने गुनगुनाते थे। भारत की आजादी के लिए गांव की चौपाल पर प्रबुद्धजन एकत्रित होते और अपने-अपने विचार रखा करते थे। अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने की सजा भी झेला करते थे। लेकिन, वो सजा का जख्म भी देश की आजादी की खुशी में धुल जाया करता था। देश को आजादी मिली तो हर आंख में खुशी और जुबां पर भारत माता की जयकार थी।
आजादी की आवाज बुलंद करने पर मिलती थी लाठी
सिकंदराबाद तहसील क्षेत्र के गांव खानपुर निवासी रघुनाथ सिंह सोलंकी ने बताया कि उनका जन्म 1931 में हुआ था। देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने के लिए हर एक भारतवासी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए था। लोग अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में बड़ी संख्या में भाग लेते थे और अंग्रेजी शासकों की क्रूरता का शिकार भी हुआ करते थे। कभी लाठी खाते तो कभी जेल में यातनाएं सहनी पड़ती थीं। साथ ही वह लाठी चार्ज में घायल आंदोलनकारियों की अपने पिता के साथ मदद किया करते थे। बताया कि उनके पिता आंदोलनों में भाग लेने के कारण दो बार जेल भी गए।
अंग्रेजी हुकूमत जब्त कर लेती थी संपत्ति
सिकंदराबाद निवासी वयोवृद्ध भाजपा के पूर्व नगर अध्यक्ष पिंकी बोहरा के पिता भजनलाल बोहरा ने बताया कि जिस आजादी को लेकर देश में आंदोलन चल रहा था उस समय वह करीब दस वर्ष के थे। उस समय वह अपने परिवार के साथ आज के पाकिस्तान में रहते थे। बताया कि उन्हें आज भी स्मरण है आजादी के लिए आवाज उठाने पर अंग्रेज जुल्म किया करते थे। आंदोलनों में भाग लेने वाले आंदोलनकारियों की संपत्ति को अंग्रेजी हुकूमत जब्त कर लिया करती थी। मगर आजादी के मतवालों ने अंग्रेजों के जुल्म के सामने घुटने नहीं टेके और देश की आजादी के लिए संघर्ष करते रहे।
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आजादी मिलने के दौरान देश में खुशी.. लेकिन माहौल गर्म था
15 अगस्त 1947 को भारत देश को अंग्रेजों से आजादी मिली थी। उस दौरान लोग खुशी से झूम रहे थे। वहीं पाकिस्तान के बंटवारे के बाद यहां का माहौल भी गर्म था। क्षेत्र के गांव कैलावन निवासी 108 वर्षीय शिकारपुर के पूर्व ब्लाक प्रमुख कांति प्रसाद शर्मा बताते हैं कि आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था। उसी दौरान यहां से मुस्लिम लोग पाकिस्तान जा रहे थे और वहां से हिंदू भारत की ओर कूच कर रहे थे। उस दौरान देश का माहौल बहुत गर्म था। जो काफी दिन बीतने के बाद शांति में बदला था।
आजाद हिंद फौज में रहे सिपाही, सात साल काटी काले पानी की सजा
शिकारपुर क्षेत्र के गांव दरवेशपुर निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 105 वर्षीय जहान सिंह की उम्र के चलते याददाश्त कुछ कमजोर हो चुकी है। वह कुछ बताने की स्थिति में नहीं है। लेकिन, नवीन कुमार ने बताया कि उनके नाना ने सुभाष चंद्र बोस के आह्वान पर अंग्रेजी सेना से त्यागपत्र दे दिया था और आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए थे। विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज ने जापान के साथ लड़ाई लड़ी थी। जिसमें जापान की हार हुई थी। जिसके बाद उन्हें काला पानी की सजा हुई थी। 7 साल की सजा काटकर 1939 में वह भारत लौटे थे। नाना आजादी के बारे में बताते थे कि आजादी मिलने के दौरान यहां लोगों में खुशी का माहौल था। लोग एक दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी का इजहार कर रहे थे।
आजादी की सुबह मना था त्योहार
जहांगीराबाद के मोहल्ला प्रभुदयाल निवासी 92 वर्षीय मायावती भी आजादी के समय को याद कर सिहर उठती हैं। वह बताती हैं कि आजादी से पूर्व का वक्त और आजादी के बाद के वक्त में बहुत अंतर है। आजादी से पूर्व न बोलने की आजादी थी और न ही अपने विचार रखने की आजादी थी। देश की आजादी के बाद लोगों ने जमकर जशभन मनाया था। उन्होंने बताया कि आजादी की सुबह मोहल्लों में कलई से सताया गया था। त्योहार के दिन की तरह लोग उत्सव मना रहे थे।
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बुलंदशहर। देश को आजाद हुए आज 73 वर्ष पूरे हो गए। आजाद भारत की पहली सुबह देखने वाले हमारे कुछ जनपदवासी आज भी वो दिन याद कर प्रफुल्लित हो उठते हैं। अपने नाती-पोतों और बच्चों को उस समय की कहानियां सुनाते हैं। देश की आजादी में किए गए संघर्षों को याद कर आज भी उनकी बूढ़ी आंखों में वही चमक दिखाई देती है। किस तरह स्वतंत्रता की वेदी पर मतवालों ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया था, गांव, कस्बा, शहर और गली-मोहल्लों में लोग आजादी के तराने गुनगुनाते थे। भारत की आजादी के लिए गांव की चौपाल पर प्रबुद्धजन एकत्रित होते और अपने-अपने विचार रखा करते थे। अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने की सजा भी झेला करते थे। लेकिन, वो सजा का जख्म भी देश की आजादी की खुशी में धुल जाया करता था। देश को आजादी मिली तो हर आंख में खुशी और जुबां पर भारत माता की जयकार थी।
आजादी की आवाज बुलंद करने पर मिलती थी लाठी
सिकंदराबाद तहसील क्षेत्र के गांव खानपुर निवासी रघुनाथ सिंह सोलंकी ने बताया कि उनका जन्म 1931 में हुआ था। देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने के लिए हर एक भारतवासी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए था। लोग अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में बड़ी संख्या में भाग लेते थे और अंग्रेजी शासकों की क्रूरता का शिकार भी हुआ करते थे। कभी लाठी खाते तो कभी जेल में यातनाएं सहनी पड़ती थीं। साथ ही वह लाठी चार्ज में घायल आंदोलनकारियों की अपने पिता के साथ मदद किया करते थे। बताया कि उनके पिता आंदोलनों में भाग लेने के कारण दो बार जेल भी गए।
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अंग्रेजी हुकूमत जब्त कर लेती थी संपत्ति
सिकंदराबाद निवासी वयोवृद्ध भाजपा के पूर्व नगर अध्यक्ष पिंकी बोहरा के पिता भजनलाल बोहरा ने बताया कि जिस आजादी को लेकर देश में आंदोलन चल रहा था उस समय वह करीब दस वर्ष के थे। उस समय वह अपने परिवार के साथ आज के पाकिस्तान में रहते थे। बताया कि उन्हें आज भी स्मरण है आजादी के लिए आवाज उठाने पर अंग्रेज जुल्म किया करते थे। आंदोलनों में भाग लेने वाले आंदोलनकारियों की संपत्ति को अंग्रेजी हुकूमत जब्त कर लिया करती थी। मगर आजादी के मतवालों ने अंग्रेजों के जुल्म के सामने घुटने नहीं टेके और देश की आजादी के लिए संघर्ष करते रहे।
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आजादी मिलने के दौरान देश में खुशी.. लेकिन माहौल गर्म था
15 अगस्त 1947 को भारत देश को अंग्रेजों से आजादी मिली थी। उस दौरान लोग खुशी से झूम रहे थे। वहीं पाकिस्तान के बंटवारे के बाद यहां का माहौल भी गर्म था। क्षेत्र के गांव कैलावन निवासी 108 वर्षीय शिकारपुर के पूर्व ब्लाक प्रमुख कांति प्रसाद शर्मा बताते हैं कि आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था। उसी दौरान यहां से मुस्लिम लोग पाकिस्तान जा रहे थे और वहां से हिंदू भारत की ओर कूच कर रहे थे। उस दौरान देश का माहौल बहुत गर्म था। जो काफी दिन बीतने के बाद शांति में बदला था।
आजाद हिंद फौज में रहे सिपाही, सात साल काटी काले पानी की सजा
शिकारपुर क्षेत्र के गांव दरवेशपुर निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 105 वर्षीय जहान सिंह की उम्र के चलते याददाश्त कुछ कमजोर हो चुकी है। वह कुछ बताने की स्थिति में नहीं है। लेकिन, नवीन कुमार ने बताया कि उनके नाना ने सुभाष चंद्र बोस के आह्वान पर अंग्रेजी सेना से त्यागपत्र दे दिया था और आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए थे। विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज ने जापान के साथ लड़ाई लड़ी थी। जिसमें जापान की हार हुई थी। जिसके बाद उन्हें काला पानी की सजा हुई थी। 7 साल की सजा काटकर 1939 में वह भारत लौटे थे। नाना आजादी के बारे में बताते थे कि आजादी मिलने के दौरान यहां लोगों में खुशी का माहौल था। लोग एक दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी का इजहार कर रहे थे।
आजादी की सुबह मना था त्योहार
जहांगीराबाद के मोहल्ला प्रभुदयाल निवासी 92 वर्षीय मायावती भी आजादी के समय को याद कर सिहर उठती हैं। वह बताती हैं कि आजादी से पूर्व का वक्त और आजादी के बाद के वक्त में बहुत अंतर है। आजादी से पूर्व न बोलने की आजादी थी और न ही अपने विचार रखने की आजादी थी। देश की आजादी के बाद लोगों ने जमकर जशभन मनाया था। उन्होंने बताया कि आजादी की सुबह मोहल्लों में कलई से सताया गया था। त्योहार के दिन की तरह लोग उत्सव मना रहे थे।