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मेहनत और संघर्ष से तय किया रास्ता...पर, मंजिल अभी बाकी है
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बदायूं। शालिनी चौहान का जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है। सिर से पिता का साया उठने के बाद मां ने सहारा देकर संभाला। शादी तो हुई पर रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चल पाया। ससुराल वाले इकलौता बेटा लेने की जिद कर रहे थे, लेकिन शालिनी ने उसे देने से इंकार कर दिया। बकौल शालिनी ससुराल वालों ने बेटा उन्हें सौंपने के बदले सारा बिजनेस और प्रापर्टी मांगी तो उन्होंने हंसते हुए सब कुछ उनके नाम कर दिया और बेटे को कलेजे से लगाकर चली आईं।
शहर के श्रीराम नगर कॉलोनी निवासी शालिनी का होम डेकोरेटर्स का अच्छा खासा बिजनेस था। केदारनाथ इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट करने के बाद ही उनका रुझान इस काम की तरफ था, जिसे उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर कर भी दिखाया। फैशन डिजाइनिंग और एक्सपोर्ट मैनेजमेंट का कोर्स किया तो बिजनेस को पंख लग गए। वर्ष 2003 में अनूपशहर से शादी हुई, लेकिन ससुराल वाले पैसों के लिए तंग करने लगे थे। शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जाने लगा। ससुराल में रहना मुश्किल था। इसी बीच बेटे ने जन्म लिया, लेकिन ससुराल वालों के जुल्म कम नहीं हुए। तलाक की भी शर्त थी कि बेटा देना होगा। शालिनी के अनुसार, उन्होंने मना किया तो शर्त रख दी गई कि सारा बिजनेस और प्रापर्टी ससुराल वालों को दे दी जाए तो वह इस पर भी राजी हो गईं।
बेटे को लेकर 2007 में बदायूं आईं और यहां पर बिजनेस जमाने की कोशिश की, लेकिन संकट ने पीछा नहीं छोड़ा। गम में पिता की दुनिया से चल बसे। रिश्तेदारों ने तलाकशुदा होने के कारण बुलाना बंद कर दिया। पैसा था नहीं तो बिजनेस कहां से होता। लोन के लिए आवेदन किए, लेकिन नहीं मिल सका। कई जगह धोखे भी खाए, लेकिन हिमालय की मानिंद डटी रहीं। सिविल सेवा में दो बार प्री एग्जाम निकालने वाली शालिनी कहती हैं कि बेटे की खातिर सारा पैसा ससुराल वालों को दे दिया था अब खुद के पैरों पर खड़ी होने केे लिए संघर्ष कर रही हैं। 12 मार्च से हैदराबाद में डेकोरेटिव आइटम्स की प्रदर्शनी में शामिल होने जा रही हैं, जिससे उन्हें बहुत उम्मीद है। शालिनी का कहना है कि उनका सपना अपने जैसी महिलाओं की मदद करने का है, लेकिन पैसे के अभाव में वह ऐसा कर नहीं पा रही हैं।
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अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिले का नाम रोशन कर रहीं ऋषिका
बदायूं। गणेश बिहार निवासी प्रमोद कुमार गुप्ता की बेटी ऋषिका गुप्ता जिले का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रोशन कर रही हैं। अमेरिका, इंडोनेशिया, कनाडा में हुई कई अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में वह मेडल झटक चुकी हैं। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी ऋषिका ने काफी नाम कमाया है।
जनवरी 2019 में अमेरिका के फ्लोरिडा में हुई अमेरिकन फुटबॉल प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर ऋषिका ने क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई थी। इस वर्ष मई में अमेरिकन फुटबॉल प्रतियोगिता का आयोजन स्पेन में होना है। ऋषिका इसके लिए तैयारी कर रही हैं। पोस्ट ग्रेजुएट कर चुकीं ऋषिका योगा की पढ़ाई भी कर रही हैं। अमेरिकन फुटबाल के अलावा ऋषिका को इंडोनेशियाई मार्शल आर्ट और ताइक्वांडो में भी महारत हासिल है। ताइक्वांडो में ऋषिका ऑल इंडिया गोल्ड मेडलिस्ट हैं। ऋषिका इन दिनों अमेरिकी फुटबॉल लीग की तैयारी में लगी हुई हैं। इसके साथ ही वह उत्तर प्रदेश पुलिस में सब इंस्पेक्टर की भर्ती के लिए भी तैयारी कर रही हैं। खेलों में मिली सफलता के लिए वह अपने माता-पिता और परिवार वालों को श्रेय देती हैं। ऋषिका का कहना है कि अगर मन में कुछ ठान लिया जाए तो रास्ते खुद बन जाते हैं। ऋषिका के माता-पिता भी बेटी की इस कामयाबी से काफी खुश हैं। हालांकि, सरकार की ओर से कोई मदद न मिलने को लेकर उनको मलाल भी है।
पढ़ाई की लगन ने बना दिया प्रोफेसर
बदायूं। मूलत: पीलीभीत की रहनेे वाली सोनी मौर्य का जीवन कष्टों भरा रहा, लेकिन इन्हीं दुखों को उन्होंने अपनी ताकत बनाया और खेल के क्षेत्र में आगे बढ़कर न केवल मेडल हासिल किए बल्कि आज असिसटेंट प्रोफेसर के रूप में गिंदोदेवी कॉलेज में काम भी कर रही हैं। खेल के दम पर ही दो बार राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल प्रतियोगिता में भी प्रतिभाग कर चुकी हैं।
गिंदो देेवी कॉलेज में शारीरिक शिक्षा पढ़ाने वाली सोनी पीलीभीत के मोहल्ला थान सिंह निवासी हैं। बचपन में ही पिता का देहांत हो गया, जिसके बाद चार बहनों और दो भाइयों के पालन पोषण की जिम्मेदारी मां आरती देवी पर आ गई। पिता की मौत के बाद मां को उपाधि महाविद्यालय में नौकरी तो मिल गई, लेकिन उससे परिवार का खर्च चलाना भी मुश्किल होता था।
पढ़ाई की लगन थी, इसलिए मां ने उन्हें जैसे तैसे पढ़ाया। 2008 में इंटरमीडिएट करने के बाद पीलीभीत से ही स्नातक की पढ़ाई की। सोनी के अनुसार जब कक्षा छह में थी तो एक बार स्कूल स्तर की रेस हुई थी, जिसमें वह खूब तेज दौड़ी और प्रथम स्थान हासिल किया। उन्हें देखकर प्रधानाचार्य सुखबिंदर कौर ने उन्हें प्रोत्साहित किया और खेल में कॅरियर बनाने की सलाह दी। इसके बाद बनारस से बीपीएड और एमपीएड किया। इसी दौरान राष्ट्रीय स्तर की दौड़ प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल भी हासिल किया। दो बार कोल्हापुर और बनारस में हुई राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल प्रतियोगिता में भी प्रतिभाग किया। 2018 में पीएचडी की और अब जून 2020 में गिंदोदेवी कॉलेज में ज्वाइन किया।
सोनी बताती हैं कि पिता की मौत के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। रिश्तेदार कहते थे कि लड़का ढूंढकर शादी कर दो लेकिन मन में पढ़ाई की लगन थी। मां और प्रधानाचार्य सुखबिंदर कौर ने लगाकर प्रोत्साहित किया और उसके बल पर ही यह मुकाम पाया। अभी और भी आगे कुछ खेल के क्षेत्र में करने की तमन्ना है। कहती हैं कि मुश्किलों का सामना किया लेकिन कभी हार नहीं मानी। लड़कियों को भी इसी बात की शिक्षा देती हैं कि जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए।
गांवों में चल रही बदलाव की बयार... महिला शक्ति हर संकट से लड़ने को तैयार
बदायूं। कभी चौके चूल्हे तक सीमित रही आधी आबादी अब न केवल पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है, बल्कि वो काम भी कर रही है जिन्हें अभी तक पुरुष प्रधान ही माना जाता था। खास बात ये है कि बदलाव की ये बयार देहात क्षेत्रों में बह रही है। गांवों की महिलाएं मिठाई की दुकान चला रही हैं तो कोई आटा चक्की, कोल्हू और सेलर चलाकर अपने परिवार को आर्थिक संबल दे रही है। पारंपरिक खेती से हटकर खेती भी उनके द्वारा की जा रही है। गांव में घूमकर वे बिजली बिल भी जमा कर रही हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) द्वारा इस समय जिले में कई समूह चलाए जा रहे हैं, जिनसे महिलाएं जुड़कर न केवल अपना रोजगार कर रही हैं बल्कि पुरुषों का सहारा भी बन रही हैं। बिल्सी तहसील के गांव अकौली निवासी उर्मिला देवी समूह बनाकर खेती कर रही हैं। घर में इतना पैसा नहीं हैं कि मजदूरी पर काम करा लें इस लिए पति के साथ खुद लग जाती हैं। रफियाबाद निवासी छाया ने समूह से जुड़कर स्पेलर लगाया है।
इसी से घर चल रहा है। पति का भी सहयोग लेती हैं। उसावां क्षेत्र की गढ़िया चौरा निवासी रीना तो गांव में घर-घर जाकर बिजली के बिल जमा करती हैं। शुरू में हिचक होती थी, गांव वाले भी कहते थे कि येे काम लड़कियों के नहीं हैं, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। अब इस काम में ही अच्छा लगने लगा है। केवल यही नहीं कादरचौक के सदाठेर निवासी प्रियंका मशरूम की खेती कर रही हैं तो बमनौसी की ज्योति फूलों की खेती करके अपने परिवार की आर्थिक मदद करने में लगी हैं। पुरुषों के साथ मिलकर चल रही इन महिलाओं का कहना है कि मेहनत के बल पर ही कुछ किया जा सकता है। आज महिलाएं भी पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं हैं।
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शहर के श्रीराम नगर कॉलोनी निवासी शालिनी का होम डेकोरेटर्स का अच्छा खासा बिजनेस था। केदारनाथ इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट करने के बाद ही उनका रुझान इस काम की तरफ था, जिसे उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर कर भी दिखाया। फैशन डिजाइनिंग और एक्सपोर्ट मैनेजमेंट का कोर्स किया तो बिजनेस को पंख लग गए। वर्ष 2003 में अनूपशहर से शादी हुई, लेकिन ससुराल वाले पैसों के लिए तंग करने लगे थे। शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जाने लगा। ससुराल में रहना मुश्किल था। इसी बीच बेटे ने जन्म लिया, लेकिन ससुराल वालों के जुल्म कम नहीं हुए। तलाक की भी शर्त थी कि बेटा देना होगा। शालिनी के अनुसार, उन्होंने मना किया तो शर्त रख दी गई कि सारा बिजनेस और प्रापर्टी ससुराल वालों को दे दी जाए तो वह इस पर भी राजी हो गईं।
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बेटे को लेकर 2007 में बदायूं आईं और यहां पर बिजनेस जमाने की कोशिश की, लेकिन संकट ने पीछा नहीं छोड़ा। गम में पिता की दुनिया से चल बसे। रिश्तेदारों ने तलाकशुदा होने के कारण बुलाना बंद कर दिया। पैसा था नहीं तो बिजनेस कहां से होता। लोन के लिए आवेदन किए, लेकिन नहीं मिल सका। कई जगह धोखे भी खाए, लेकिन हिमालय की मानिंद डटी रहीं। सिविल सेवा में दो बार प्री एग्जाम निकालने वाली शालिनी कहती हैं कि बेटे की खातिर सारा पैसा ससुराल वालों को दे दिया था अब खुद के पैरों पर खड़ी होने केे लिए संघर्ष कर रही हैं। 12 मार्च से हैदराबाद में डेकोरेटिव आइटम्स की प्रदर्शनी में शामिल होने जा रही हैं, जिससे उन्हें बहुत उम्मीद है। शालिनी का कहना है कि उनका सपना अपने जैसी महिलाओं की मदद करने का है, लेकिन पैसे के अभाव में वह ऐसा कर नहीं पा रही हैं।
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अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिले का नाम रोशन कर रहीं ऋषिका
बदायूं। गणेश बिहार निवासी प्रमोद कुमार गुप्ता की बेटी ऋषिका गुप्ता जिले का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रोशन कर रही हैं। अमेरिका, इंडोनेशिया, कनाडा में हुई कई अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में वह मेडल झटक चुकी हैं। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी ऋषिका ने काफी नाम कमाया है।
जनवरी 2019 में अमेरिका के फ्लोरिडा में हुई अमेरिकन फुटबॉल प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर ऋषिका ने क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई थी। इस वर्ष मई में अमेरिकन फुटबॉल प्रतियोगिता का आयोजन स्पेन में होना है। ऋषिका इसके लिए तैयारी कर रही हैं। पोस्ट ग्रेजुएट कर चुकीं ऋषिका योगा की पढ़ाई भी कर रही हैं। अमेरिकन फुटबाल के अलावा ऋषिका को इंडोनेशियाई मार्शल आर्ट और ताइक्वांडो में भी महारत हासिल है। ताइक्वांडो में ऋषिका ऑल इंडिया गोल्ड मेडलिस्ट हैं। ऋषिका इन दिनों अमेरिकी फुटबॉल लीग की तैयारी में लगी हुई हैं। इसके साथ ही वह उत्तर प्रदेश पुलिस में सब इंस्पेक्टर की भर्ती के लिए भी तैयारी कर रही हैं। खेलों में मिली सफलता के लिए वह अपने माता-पिता और परिवार वालों को श्रेय देती हैं। ऋषिका का कहना है कि अगर मन में कुछ ठान लिया जाए तो रास्ते खुद बन जाते हैं। ऋषिका के माता-पिता भी बेटी की इस कामयाबी से काफी खुश हैं। हालांकि, सरकार की ओर से कोई मदद न मिलने को लेकर उनको मलाल भी है।
पढ़ाई की लगन ने बना दिया प्रोफेसर
बदायूं। मूलत: पीलीभीत की रहनेे वाली सोनी मौर्य का जीवन कष्टों भरा रहा, लेकिन इन्हीं दुखों को उन्होंने अपनी ताकत बनाया और खेल के क्षेत्र में आगे बढ़कर न केवल मेडल हासिल किए बल्कि आज असिसटेंट प्रोफेसर के रूप में गिंदोदेवी कॉलेज में काम भी कर रही हैं। खेल के दम पर ही दो बार राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल प्रतियोगिता में भी प्रतिभाग कर चुकी हैं।
गिंदो देेवी कॉलेज में शारीरिक शिक्षा पढ़ाने वाली सोनी पीलीभीत के मोहल्ला थान सिंह निवासी हैं। बचपन में ही पिता का देहांत हो गया, जिसके बाद चार बहनों और दो भाइयों के पालन पोषण की जिम्मेदारी मां आरती देवी पर आ गई। पिता की मौत के बाद मां को उपाधि महाविद्यालय में नौकरी तो मिल गई, लेकिन उससे परिवार का खर्च चलाना भी मुश्किल होता था।
पढ़ाई की लगन थी, इसलिए मां ने उन्हें जैसे तैसे पढ़ाया। 2008 में इंटरमीडिएट करने के बाद पीलीभीत से ही स्नातक की पढ़ाई की। सोनी के अनुसार जब कक्षा छह में थी तो एक बार स्कूल स्तर की रेस हुई थी, जिसमें वह खूब तेज दौड़ी और प्रथम स्थान हासिल किया। उन्हें देखकर प्रधानाचार्य सुखबिंदर कौर ने उन्हें प्रोत्साहित किया और खेल में कॅरियर बनाने की सलाह दी। इसके बाद बनारस से बीपीएड और एमपीएड किया। इसी दौरान राष्ट्रीय स्तर की दौड़ प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल भी हासिल किया। दो बार कोल्हापुर और बनारस में हुई राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल प्रतियोगिता में भी प्रतिभाग किया। 2018 में पीएचडी की और अब जून 2020 में गिंदोदेवी कॉलेज में ज्वाइन किया।
सोनी बताती हैं कि पिता की मौत के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। रिश्तेदार कहते थे कि लड़का ढूंढकर शादी कर दो लेकिन मन में पढ़ाई की लगन थी। मां और प्रधानाचार्य सुखबिंदर कौर ने लगाकर प्रोत्साहित किया और उसके बल पर ही यह मुकाम पाया। अभी और भी आगे कुछ खेल के क्षेत्र में करने की तमन्ना है। कहती हैं कि मुश्किलों का सामना किया लेकिन कभी हार नहीं मानी। लड़कियों को भी इसी बात की शिक्षा देती हैं कि जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए।
गांवों में चल रही बदलाव की बयार... महिला शक्ति हर संकट से लड़ने को तैयार
बदायूं। कभी चौके चूल्हे तक सीमित रही आधी आबादी अब न केवल पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है, बल्कि वो काम भी कर रही है जिन्हें अभी तक पुरुष प्रधान ही माना जाता था। खास बात ये है कि बदलाव की ये बयार देहात क्षेत्रों में बह रही है। गांवों की महिलाएं मिठाई की दुकान चला रही हैं तो कोई आटा चक्की, कोल्हू और सेलर चलाकर अपने परिवार को आर्थिक संबल दे रही है। पारंपरिक खेती से हटकर खेती भी उनके द्वारा की जा रही है। गांव में घूमकर वे बिजली बिल भी जमा कर रही हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) द्वारा इस समय जिले में कई समूह चलाए जा रहे हैं, जिनसे महिलाएं जुड़कर न केवल अपना रोजगार कर रही हैं बल्कि पुरुषों का सहारा भी बन रही हैं। बिल्सी तहसील के गांव अकौली निवासी उर्मिला देवी समूह बनाकर खेती कर रही हैं। घर में इतना पैसा नहीं हैं कि मजदूरी पर काम करा लें इस लिए पति के साथ खुद लग जाती हैं। रफियाबाद निवासी छाया ने समूह से जुड़कर स्पेलर लगाया है।
इसी से घर चल रहा है। पति का भी सहयोग लेती हैं। उसावां क्षेत्र की गढ़िया चौरा निवासी रीना तो गांव में घर-घर जाकर बिजली के बिल जमा करती हैं। शुरू में हिचक होती थी, गांव वाले भी कहते थे कि येे काम लड़कियों के नहीं हैं, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। अब इस काम में ही अच्छा लगने लगा है। केवल यही नहीं कादरचौक के सदाठेर निवासी प्रियंका मशरूम की खेती कर रही हैं तो बमनौसी की ज्योति फूलों की खेती करके अपने परिवार की आर्थिक मदद करने में लगी हैं। पुरुषों के साथ मिलकर चल रही इन महिलाओं का कहना है कि मेहनत के बल पर ही कुछ किया जा सकता है। आज महिलाएं भी पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं हैं।