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विजय दिवस : सिर्फ 13 दिन में चटा दी थी पाकिस्तान को धूल
Thu, 16 Dec 2021 01:38 AM IST
बरेली ब्यूरो
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Published by: बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 16 Dec 2021 01:38 AM IST
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बदायूं। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में लड़ा गया युद्ध इतिहास में दर्ज है। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के 93 हजार सशस्त्र सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बाद इतिहास में सैनिकों के यह सबसे बड़े आत्मसमर्पण के रूप में दर्ज है।
विश्व इतिहास में दो देशों के बीच युद्ध में दुश्मन के 93 हजार सैनिकों का समर्पण और बांग्लादेश के नाम से एक नए देश के उदय को 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। शहर के सिविल लाइंस में रहने वाले लेफ्टिनेंट (रिटायर्ड) आरपी शर्मा ने पूर्वी और ककराला के वार्ड नंबर 23 में रहने वाले कैप्टन (रिटायर्ड) सफदर अली खां ने पश्चिमी मोर्चे पर दुश्मन से लोहा लिया था। 1971 के युद्ध के 50 वर्ष पूरे होने पर देश विजय दिवस मना रहा है। अमर उजाला ने युद्ध में हिस्सा ले चुके आरपी शर्मा और सफदर अली खां से बात की तो उन्होंने अपने अनुभव व संस्मरण साझा किए।
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फोटो-17
1971 में मेरी तैनाती पश्चिमी बंगाल में थी। तीन दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने भारतीय वायु सेना के ठिकानों को निशाना बनाते हुए हवाई हमले कर दिए। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में उन दिनों मुक्ति संग्राम चल रहा था। भारत का उसको समर्थन था। तीन दिसंबर को जब भारतीय वायु सेना के ठिकानों पर पाकिस्तान ने हमला किया, उसके बाद ही साफ हो गया था कि अब आर-पार की जंग होगी। मैं आर्मी सर्विस कोर में सेवाएं दे रहा था। युद्ध के अंतिम मोर्चे तक भारतीय जवानों को रसद, गोला-बारूद समेत अन्य जरूरी सामानों की सप्लाई की जिम्मेदारी हमारी कोर पर थी। अंतिम मोर्चे तक रसद पहुंचाने के लिए दुश्मन की गोलाबारी का सामना करना होता था। कुछ साथियों ने देश के लिए शहादत भी दी। पाकिस्तान को नहीं पता था कि भारत पर हमला कर उसने गलती कर दी है। सिर्फ 13 दिन की जंग में पाकिस्तानी सेना ने हथियार डाल दिए थे। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के 93 हजार सशस्त्र सैनिकों के सरेंडर के साथ युद्ध खत्म हो गया और नए देश के रूप में बांग्लादेश का उदय हुआ।
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- लेफ्टिनेंट (रिटायर्ड) आरपी शर्मा
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फोटो-18
1971 के युद्ध में मेरी तैनाती पश्चिमी मोर्चे पर राजस्थान-पंजाब के बीच श्रीगंगानगर के फाजल सेक्टर में थी। कई बार दुश्मन से सीधा मुकाबला हुआ। शुरू में यहां पाकिस्तान की पैदल सेना ने कुछ बढ़त बना ली थी, लेकिन बाद में हमने पाकिस्तान को खदेड़ दिया। पश्चिमी मोर्चे पर सिर्फ दस दिन की लड़ाई में हमारी सेना पाकिस्तानी सीमा में घुस गई थी। वह पल अब भी याद है कि हमारी बी कंपनी का टी-72 टैंक पाकिस्तानी सीमा में आगे तक पहुंच गया था। इसमें हवलदार अब्दुल गफ्फार, निसार और नसीर समेत चार जवान थे। टैंक पाकिस्तानी सेना की आरसीएल गन के निशाने पर आ गया। इसमें चारों जवान शहीद हो गए। इसके बाद हमारी टैंक यूनिट ने बड़े स्तर पर जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया। कई बार पाकिस्तानी सेना से सीधा मुकाबला हुआ। भारतीय सेना ने सिर्फ 13 दिन की जंग में विश्व की सबसे बड़ी जीत दर्ज की। इतिहास में अब तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि किसी देश की सेना के 93 हजार जवानों ने सरेंडर किया हो।
- कैप्टन (रिटायर्ड) सफदर अली खां
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विश्व इतिहास में दो देशों के बीच युद्ध में दुश्मन के 93 हजार सैनिकों का समर्पण और बांग्लादेश के नाम से एक नए देश के उदय को 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। शहर के सिविल लाइंस में रहने वाले लेफ्टिनेंट (रिटायर्ड) आरपी शर्मा ने पूर्वी और ककराला के वार्ड नंबर 23 में रहने वाले कैप्टन (रिटायर्ड) सफदर अली खां ने पश्चिमी मोर्चे पर दुश्मन से लोहा लिया था। 1971 के युद्ध के 50 वर्ष पूरे होने पर देश विजय दिवस मना रहा है। अमर उजाला ने युद्ध में हिस्सा ले चुके आरपी शर्मा और सफदर अली खां से बात की तो उन्होंने अपने अनुभव व संस्मरण साझा किए।
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1971 में मेरी तैनाती पश्चिमी बंगाल में थी। तीन दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने भारतीय वायु सेना के ठिकानों को निशाना बनाते हुए हवाई हमले कर दिए। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में उन दिनों मुक्ति संग्राम चल रहा था। भारत का उसको समर्थन था। तीन दिसंबर को जब भारतीय वायु सेना के ठिकानों पर पाकिस्तान ने हमला किया, उसके बाद ही साफ हो गया था कि अब आर-पार की जंग होगी। मैं आर्मी सर्विस कोर में सेवाएं दे रहा था। युद्ध के अंतिम मोर्चे तक भारतीय जवानों को रसद, गोला-बारूद समेत अन्य जरूरी सामानों की सप्लाई की जिम्मेदारी हमारी कोर पर थी। अंतिम मोर्चे तक रसद पहुंचाने के लिए दुश्मन की गोलाबारी का सामना करना होता था। कुछ साथियों ने देश के लिए शहादत भी दी। पाकिस्तान को नहीं पता था कि भारत पर हमला कर उसने गलती कर दी है। सिर्फ 13 दिन की जंग में पाकिस्तानी सेना ने हथियार डाल दिए थे। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के 93 हजार सशस्त्र सैनिकों के सरेंडर के साथ युद्ध खत्म हो गया और नए देश के रूप में बांग्लादेश का उदय हुआ।
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- लेफ्टिनेंट (रिटायर्ड) आरपी शर्मा
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1971 के युद्ध में मेरी तैनाती पश्चिमी मोर्चे पर राजस्थान-पंजाब के बीच श्रीगंगानगर के फाजल सेक्टर में थी। कई बार दुश्मन से सीधा मुकाबला हुआ। शुरू में यहां पाकिस्तान की पैदल सेना ने कुछ बढ़त बना ली थी, लेकिन बाद में हमने पाकिस्तान को खदेड़ दिया। पश्चिमी मोर्चे पर सिर्फ दस दिन की लड़ाई में हमारी सेना पाकिस्तानी सीमा में घुस गई थी। वह पल अब भी याद है कि हमारी बी कंपनी का टी-72 टैंक पाकिस्तानी सीमा में आगे तक पहुंच गया था। इसमें हवलदार अब्दुल गफ्फार, निसार और नसीर समेत चार जवान थे। टैंक पाकिस्तानी सेना की आरसीएल गन के निशाने पर आ गया। इसमें चारों जवान शहीद हो गए। इसके बाद हमारी टैंक यूनिट ने बड़े स्तर पर जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया। कई बार पाकिस्तानी सेना से सीधा मुकाबला हुआ। भारतीय सेना ने सिर्फ 13 दिन की जंग में विश्व की सबसे बड़ी जीत दर्ज की। इतिहास में अब तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि किसी देश की सेना के 93 हजार जवानों ने सरेंडर किया हो।
- कैप्टन (रिटायर्ड) सफदर अली खां