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Budaun News: आधुनिक तकनीकों से 500 क्विंटल प्रति एकड़ किया गन्ना उत्पादन
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गन्ना के खेते में लाल टीशर्ट में किसान प्रदीप सिहं। स्त्रोत सूचना
- फोटो : बहराइच में नानपारा बस स्टैंड पर खड़ी बस में लगी आग।
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बदायूं। बदायूं के गठौना गांव के किसान प्रदीप सिंह ने आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर गन्ने की खेती में सफलता की नई मिसाल कायम की है। उनका उत्पादन प्रति एकड़ 500-600 क्विंटल तक पहुंच गया है, जबकि सामान्य किसानों का उत्पादन 250-300 क्विंटल रहता है। एमएससी एग्रीकल्चर के छात्र प्रदीप क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए हैं।
उन्होंने गन्ना खेती में ट्रेंच विधि अपनाई, जिसमें गहरी नालियों में गन्ने की बोवाई की जाती है। इससे पौधों की जड़ें गहराई तक फैलती हैं और गन्ना अधिक मजबूत होता है। उन्होंने ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगाकर पानी की खपत में 50-60% तक कमी की और सह-फसली खेती से अतिरिक्त आय भी अर्जित की।
आलू, सरसों, धनिया, मटर और सौंफ जैसी फसलें उगाकर उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की। प्रदीप ने जैविक खेती पर भी जोर दिया। जीवामृत, घनजीवामृत और वर्मी कम्पोस्ट के इस्तेमाल से उन्होंने रासायनिक उर्वरकों से मुक्ति पाई और गन्ने की गुणवत्ता बढ़ाई। उनका उत्पादन प्रति एकड़ 500-600 क्विंटल तक पहुंच गया, जबकि सामान्य किसानों का उत्पादन 250-300 क्विंटल रहता है। अब वह अन्य किसानों को भी आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका कहना है कि खेती में ज्ञान ही सबसे बड़ी पूंजी है। विज्ञान को हल के साथ जोड़ने पर किसान कभी कर्जदार नहीं रहेगा।
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उन्होंने गन्ना खेती में ट्रेंच विधि अपनाई, जिसमें गहरी नालियों में गन्ने की बोवाई की जाती है। इससे पौधों की जड़ें गहराई तक फैलती हैं और गन्ना अधिक मजबूत होता है। उन्होंने ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगाकर पानी की खपत में 50-60% तक कमी की और सह-फसली खेती से अतिरिक्त आय भी अर्जित की।
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आलू, सरसों, धनिया, मटर और सौंफ जैसी फसलें उगाकर उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की। प्रदीप ने जैविक खेती पर भी जोर दिया। जीवामृत, घनजीवामृत और वर्मी कम्पोस्ट के इस्तेमाल से उन्होंने रासायनिक उर्वरकों से मुक्ति पाई और गन्ने की गुणवत्ता बढ़ाई। उनका उत्पादन प्रति एकड़ 500-600 क्विंटल तक पहुंच गया, जबकि सामान्य किसानों का उत्पादन 250-300 क्विंटल रहता है। अब वह अन्य किसानों को भी आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका कहना है कि खेती में ज्ञान ही सबसे बड़ी पूंजी है। विज्ञान को हल के साथ जोड़ने पर किसान कभी कर्जदार नहीं रहेगा।
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