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उत्पादन में आधे से ज्यादा की गिरावट

badaun Updated Mon, 06 Apr 2015 07:56 PM IST
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Production by half Much of the decline

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कृषि वैज्ञानिकों के एक सर्वे पर गौर करें तो दो-तीन दिन पहले तक हुई बरसात ने गेहूं की गुणवत्ता और पौष्टिकता भी प्रभावित कर दी है। 50 फीसदी तक गेहूं खेत में ही नष्ट हो गया।
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कृषि विज्ञान केंद्र ने मार्च महीना के शुरू में हुई बारिश से जिले में 30 फीसदी तक नुकसान का आकलन कर मेरठ मुख्यालय को रिपोर्ट को भेजी गई थी, लेकिन मार्च के लास्ट वीक और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में फिर बरसे मेघ ने नुकसान ज्यादा कर दिया। शस्य वैज्ञानिक (गेहूं) डॉ. अर्जुन सिंह की माने तो गेहूं को अब तक हुए नुकसान का सर्वे उन्होंने सोमवार को भी किया। 50 फीसदी से ज्यादा फसल तबाह हो चुकी है। दानों की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। बरसात के शिकार गेहूं से इस बार आटा कम भूसी ज्यादा निकलेगी। उत्पादन इस कदर प्रभावित हुआ है कि प्रति बीघा डेढ़ से पौने दो क्विंटल से अधिक पैदावार नहीं हो सकती।

भाग्य को कोस रहे किसान
उझानी। गांव ढढूनगला गेहूं के खेत में बेचैन दिखे अन्नदाता दाताराम मौर्य ने बताया कि छह बीघा जमीन है। दो बीघा में तीन क्विंटल गेहूं निकला और किसानों की तरह बुर्रा का मुन्नालाल भी कुदरत के कहर का शिकार बन चुका है। बेटी के ब्याह की बात चल रही है, लेकिन दहेज का सामान और घरेलू जरूरतों को कैसे पूरा करेगा, यही सोचकर मुन्नालाल का सुखचैन उड़ गया है। सकरीजंगल का अनीस तो अजीब उलझन में है। पांच रुपया प्रति सैकड़ा पर उसने रकम लेकर गेहूं की लागत में लगा दी थी। गेहूं घर आने पर ब्याज समेत मूल कर्जा चुकाने की आस भी टूट गई है।

उझानी। क्षेत्र के गांव पीरभट्टू का चंपत पाली फसल की बर्बादी से इस कदर टूट चुके हैं कि अब उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा। यूं तो उनके नाम कृषि योग्य भूमि 20 बीघा है, लेकिन उम्मीद कम है कि 30-35 क्विंटल गेहूं से वह घरवालों की जरूरतों को पूरा कर पाएगा। पत्नी फूलवती पिछले दिनों बीमार पड़ीं, तो 20 हजार रुपया इलाज पर खर्च हो गया। तीन बेटों में सबसे बड़ा मुन्ना और मझला संजीव खेती में उनका हाथ बंटाता रहा है। छोटा बेटा शुशेंद्र दिल्ली में मजदूरी करता है। तीनों में से किसी की भी शादी भी नहीं हुई है। चंपत ने गेहूं की फसल में लागत भी दिल खोलकर लगाई थी। फसल खेत में बिछी देख उसके होश फाख्ता हो गए। बोले, तीन दिन पहले लेखपाल पहुंचा। सर्वे की बात कहते हुए उसने नुकसान का मुआवजा मुहैया कराने का भरोसा भी दिलाया, लेकिन कौन जाने कब ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ जैसा मुआवजा मिल पाएगा।

...जितनी सांसें चल रही हैं चलने दो भाई
क्षेत्र के गांव निजामाबाद के 55 वर्षीय चेतराम की सांसे तेज चलती हैं। सांस की बीमारी है। स्थानीय नीम-हकीमों से लेकर जिला स्तर तक चिकित्सकों से इलाज करा चुके हैं। कोई आस-औलाद है नहीं, भाई नेत्रपाल और भतीजे सेवा करते हैं। इस बार खेत में मेहनत की और चेतराम को ढांढस बधाया कि उनका इलाज दिल्ली या आगरा ले जाकर कराएंगे। गेहूं की फसल उठने का इंतजार कर रहे थे। सारी योजना धरी रह गई। भाई का इलाज न हो पाने का नेत्रपाल को अफसोस है तो चेतराम भी अपने भाई की परेशानी समझ रहे हैं। कह देते हैं अब रहने दो। जबतक सांसे चल रहीं हैं, चलने दें। भगवान पर भरोसा करो। प्रशासन से तो मुआवजे की कोई आस नहीं है।

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