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खूब पनपी पिछड़ों की सियासत, दूसरों को कम मिला मौका
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रिंकू पांडेय
बदायूं। जिले की राजनीतिक जमीन पर पिछड़ों की सियासत खूब फली फूली। पिछड़ों के मुकाबले अगड़ों को जिले की जनता ने ज्यादा मौका नहीं दिया। बदायूं लोकसभा सीट के साथ आंवला और संभल लोकसभा सीट की बात करें तो आजादी के बाद से बदायूं के मतदाताओं ने पिछड़ों को लोकसभा भेजने में दिलचस्पी दिखाई। विधानसभा चुनावों की बात करें तो शहर और दातागंज सीट पर सबसे ज्यादा अगड़ों का कब्जा रहा। सहसवान, बिल्सी, बिसौली सीट से कम ही अगड़े विधानसभा पहुंच सके।
बदायूं लोकसभा सीट पर 1977 में दातागंज के गांव बेलाड़ाडी के निवासी ठाकुर ओमकार सिंह सांसद चुने गए थे। इसके बाद अगड़ी जाति के सलीम शेरवानी 1964, 1996, 1998, 1999 और 2004 में बदायूं से लोकसभा पहुंचे। 1991 में भाजपा से क्षत्रिय बिरादरी के स्वामी चिन्मयानंद लोकसभा पहुंचे। 1971 में करन सिंह यादव, 1980 में असरार अहमद, 1989 में शरद यादव, 2009 और 2014 में धर्मेंद्र यादव और 2019 में डॉ. संघमित्रा मौर्य बदायूं से लोकसभा पहुंचीं। यह सभी लोग पिछड़ी जाति से रहे। 2014 में मोदी लहर के दौरान भी ब्राह्मण बिरादरी के वागीश पाठक लोकसभा नहीं पहुंच सके। 2009 में भाजपा-जनता दल यूनाईटेड के संयुक्त प्रत्याशी डीके भारद्वाज का भी लोकसभा पहुंचने का सपना पूरा नहीं हुआ। इस बार डीके सहसवान सीट से भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं।
बिनावर विधानसभा सीट 2007 तक वजूद में थी। इस सीट से कभी अगड़ी जाति के लोग विधानसभा नहीं पहुंच सके। इस सीट पर सबसे ज्यादा कब्जा कुर्मी बिरादरी का रहा। हालांकि यहां से 1974 में मोहम्मद असरार अहमद, 1977 में अली असगर हुसैन, 1980 में अबरार अहमद, 1985 अकबर अहमद विधानसभा पहुंचे। इसके बाद इस सीट से कोई मुस्लिम नेता विधानसभा नहीं पहुंच सका। 1989, 91, 93, 96 में रामसेवक सिंह पटेल, 2002 में भूपेंद्र सिंह कुर्मी और 2007 में फिर से रामसेवक सिंह पटेल बिनावर सीट से विधानसभा पहुंचे। इसके बाद परिसीमन में बिनावर सीट खत्म हो गई। सहसवान सीट से अगड़ों को विधानसभा पहुंचने का काफी कम मौका मिला। 1980 में मीर मजहर अली उर्फ नन्हें मियां व उनके परिवार के लोग 1989 और 1983 में विधानसभा पहुंचे। इस सीट पर इसके अलावा कोई अगड़ी जाति का विधायक नहीं चुना जा सका। दातागंज सीट पर अगड़ों का कब्जा ज्यादा रहा, लेकिन 1996 का चुनाव आते-आते इस सीट पर भी पिछड़ों का दबदबा हो गया। 1957 के चुनाव से 1993 तक यहां पंडित त्रिवेणी सहाय, ठाकुर हरीश चंद्र सिंह, संतोष कुमारी पाठक, अवनीश कुमार सिंह का कब्जा रहा। 1996 में पिछड़ी जाति के प्रेमपाल सिंह यादव पहली बार विधायक चुने गए। 2002 में भी प्रेमपाल सिंह यहां से विधानसभा पहुंचे। 2007 ओर 2012 में सिनोद शाक्य यहां से विधानसभा पहुंचे। 2017 में फिर अगड़ी क्षत्रिय बिरादरी के राजीव कुमार सिंह ने दातागंज सीट पर कब्जा कर लिया।
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बदायूं सीट से जरूर अगड़े ही विधानसभा पहुंचते रहे। इस सीट से कभी पिछड़े विधानसभा नहीं पहुंच सके। ब्राह्मण और वैश्य यहां से विधायक चुने जाते रहे। पुरुषोत्तम लाल भदवार, प्रमिता भदवार, जोगेंद्र सिंह अनेजा भी यहां से विधानसभा पहुंचे। 2007 तक सुरक्षित सीट रही बिल्सी से 2017 में पहली बार ब्राह्मण जाति के आरके शर्मा विधानसभा पहुंचे। 2012 के विधानसभा चुनाव में बिसौली सीट सुरक्षित हो गई। बिसौली सीट पर ज्यादातर अगड़ों का कब्जा रहा। 1993 में पहली बार ब्राह्मण बिरादरी के दयाशिंधु शंखधार विधानसभा पहुंचे। इस सीट पर लंबे समय तक वैश्य बिरादरी के बाबू ब्रजबल्लभ, उनके बेटे योगेंद्र कुमार कुन्नू बाबू का कब्जा रहा। पहली बार 2012 में इस सुरक्षित सीट से सपा के आशुतोष मौर्य विधायक चुने गए। उसहैत सीट से अगड़ों की बात करें तो सिर्फ 2007 में मुस्लिम खां विधायक चुने गए। इस सीट से ज्यादातर यादव और शाक्य बिरादरी के लोग विधानसभा पहुंचे। 2012 में उसहैत सीट खत्म हो गई और इसे शेखूपुर नाम दिया गया। 2012 में आशीष यादव, 2017 में धर्मेंद्र शाक्य शेखूपुर से विधानसभा पहुंचे। 2007 तक गुन्नौर सीट बदायूं का हिस्सा थी। इस सीट पर पिछड़े वर्ग के नेता ही विधानसभा पहुंचते रहे। अब गुन्नौर सीट संभल जिले का हिस्सा है पर बदायूं लोकसभा में भी शामिल है। संवाद
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बदायूं। जिले की राजनीतिक जमीन पर पिछड़ों की सियासत खूब फली फूली। पिछड़ों के मुकाबले अगड़ों को जिले की जनता ने ज्यादा मौका नहीं दिया। बदायूं लोकसभा सीट के साथ आंवला और संभल लोकसभा सीट की बात करें तो आजादी के बाद से बदायूं के मतदाताओं ने पिछड़ों को लोकसभा भेजने में दिलचस्पी दिखाई। विधानसभा चुनावों की बात करें तो शहर और दातागंज सीट पर सबसे ज्यादा अगड़ों का कब्जा रहा। सहसवान, बिल्सी, बिसौली सीट से कम ही अगड़े विधानसभा पहुंच सके।
बदायूं लोकसभा सीट पर 1977 में दातागंज के गांव बेलाड़ाडी के निवासी ठाकुर ओमकार सिंह सांसद चुने गए थे। इसके बाद अगड़ी जाति के सलीम शेरवानी 1964, 1996, 1998, 1999 और 2004 में बदायूं से लोकसभा पहुंचे। 1991 में भाजपा से क्षत्रिय बिरादरी के स्वामी चिन्मयानंद लोकसभा पहुंचे। 1971 में करन सिंह यादव, 1980 में असरार अहमद, 1989 में शरद यादव, 2009 और 2014 में धर्मेंद्र यादव और 2019 में डॉ. संघमित्रा मौर्य बदायूं से लोकसभा पहुंचीं। यह सभी लोग पिछड़ी जाति से रहे। 2014 में मोदी लहर के दौरान भी ब्राह्मण बिरादरी के वागीश पाठक लोकसभा नहीं पहुंच सके। 2009 में भाजपा-जनता दल यूनाईटेड के संयुक्त प्रत्याशी डीके भारद्वाज का भी लोकसभा पहुंचने का सपना पूरा नहीं हुआ। इस बार डीके सहसवान सीट से भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं।
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बिनावर विधानसभा सीट 2007 तक वजूद में थी। इस सीट से कभी अगड़ी जाति के लोग विधानसभा नहीं पहुंच सके। इस सीट पर सबसे ज्यादा कब्जा कुर्मी बिरादरी का रहा। हालांकि यहां से 1974 में मोहम्मद असरार अहमद, 1977 में अली असगर हुसैन, 1980 में अबरार अहमद, 1985 अकबर अहमद विधानसभा पहुंचे। इसके बाद इस सीट से कोई मुस्लिम नेता विधानसभा नहीं पहुंच सका। 1989, 91, 93, 96 में रामसेवक सिंह पटेल, 2002 में भूपेंद्र सिंह कुर्मी और 2007 में फिर से रामसेवक सिंह पटेल बिनावर सीट से विधानसभा पहुंचे। इसके बाद परिसीमन में बिनावर सीट खत्म हो गई। सहसवान सीट से अगड़ों को विधानसभा पहुंचने का काफी कम मौका मिला। 1980 में मीर मजहर अली उर्फ नन्हें मियां व उनके परिवार के लोग 1989 और 1983 में विधानसभा पहुंचे। इस सीट पर इसके अलावा कोई अगड़ी जाति का विधायक नहीं चुना जा सका। दातागंज सीट पर अगड़ों का कब्जा ज्यादा रहा, लेकिन 1996 का चुनाव आते-आते इस सीट पर भी पिछड़ों का दबदबा हो गया। 1957 के चुनाव से 1993 तक यहां पंडित त्रिवेणी सहाय, ठाकुर हरीश चंद्र सिंह, संतोष कुमारी पाठक, अवनीश कुमार सिंह का कब्जा रहा। 1996 में पिछड़ी जाति के प्रेमपाल सिंह यादव पहली बार विधायक चुने गए। 2002 में भी प्रेमपाल सिंह यहां से विधानसभा पहुंचे। 2007 ओर 2012 में सिनोद शाक्य यहां से विधानसभा पहुंचे। 2017 में फिर अगड़ी क्षत्रिय बिरादरी के राजीव कुमार सिंह ने दातागंज सीट पर कब्जा कर लिया।
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बदायूं सीट से जरूर अगड़े ही विधानसभा पहुंचते रहे। इस सीट से कभी पिछड़े विधानसभा नहीं पहुंच सके। ब्राह्मण और वैश्य यहां से विधायक चुने जाते रहे। पुरुषोत्तम लाल भदवार, प्रमिता भदवार, जोगेंद्र सिंह अनेजा भी यहां से विधानसभा पहुंचे। 2007 तक सुरक्षित सीट रही बिल्सी से 2017 में पहली बार ब्राह्मण जाति के आरके शर्मा विधानसभा पहुंचे। 2012 के विधानसभा चुनाव में बिसौली सीट सुरक्षित हो गई। बिसौली सीट पर ज्यादातर अगड़ों का कब्जा रहा। 1993 में पहली बार ब्राह्मण बिरादरी के दयाशिंधु शंखधार विधानसभा पहुंचे। इस सीट पर लंबे समय तक वैश्य बिरादरी के बाबू ब्रजबल्लभ, उनके बेटे योगेंद्र कुमार कुन्नू बाबू का कब्जा रहा। पहली बार 2012 में इस सुरक्षित सीट से सपा के आशुतोष मौर्य विधायक चुने गए। उसहैत सीट से अगड़ों की बात करें तो सिर्फ 2007 में मुस्लिम खां विधायक चुने गए। इस सीट से ज्यादातर यादव और शाक्य बिरादरी के लोग विधानसभा पहुंचे। 2012 में उसहैत सीट खत्म हो गई और इसे शेखूपुर नाम दिया गया। 2012 में आशीष यादव, 2017 में धर्मेंद्र शाक्य शेखूपुर से विधानसभा पहुंचे। 2007 तक गुन्नौर सीट बदायूं का हिस्सा थी। इस सीट पर पिछड़े वर्ग के नेता ही विधानसभा पहुंचते रहे। अब गुन्नौर सीट संभल जिले का हिस्सा है पर बदायूं लोकसभा में भी शामिल है। संवाद