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ककोड़ा मेला: मोहम्मद अब्दुल्ला ने शुरू किया था ककोड़ देवी का मेला, अंग्रेजों ने दी भव्यता; जानिए इतिहास

Sun, 19 Nov 2023 02:54 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं Published by: मुकेश कुमार Updated Sun, 19 Nov 2023 02:54 PM IST
सार

बदायूं के कादरचौक इलाके में गंगा किनारे प्रसिद्ध ककोड़ा मेला सोमवार से शुरू हो रहा है। इस मेले का इतिहास बहुत पुराना है। करीब ढाई सौ साल पहले यहां के नवाब मोहम्मद अब्दुल्ला को कुष्ठ रोग हो गया था। एक संत के कहने पर उन्होंने गंगा में स्नान करने नियमित रूप से ककोड़ देवी के दर्शन दिए। उनके चमत्कार से वह स्वस्थ हो गए। इसके बाद अब्दुल्ला ने मंदिर पर मेला लगवाना शुरू किया था।  

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Mohammad Abdullah had started Kakoda Mela on Ganga bank in Badaun
गंगा किनारे स्थित ककोड़ देवी मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रुहेलखंड का मिनी कुंभ कहे जाने वाले बदायूं के ककोड़ा मेले का इतिहास पांच सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। कहा जाता है कि इस इलाके पर वर्चस्व के लिए रुहेलाओं ने आक्रमण किया तो ककोड़ देवी ने यहां के जनमानस की रक्षा की। इस युद्ध में देवी का सिर धड़ से अलग हो गया था। उनके कबंध (धड़) ने युद्ध कर रुहेलाओं को परास्त किया। मंदिर में देवी की प्रतिमा भी इसी स्थिति में स्थापित है। सिर और धड़ अलग-अलग रखा है।

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अफगानिस्तान के रूह इलाके से 18वीं सदी के प्रारंभ में दाऊद खां नामक व्यक्ति अपने साथियों के साथ यहां घोड़ों का व्यापार करने आया था। व्यापार में सफल न होने पर इन लोगों ने स्थानीय जमींदारों की सेना में नौकरी कर ली। जब इनकी संख्या तीन-चार सौ हो गई तो दाऊद खां के बेटे अली मोहम्मद खां ने छोटे जमीदारों को परास्त कर अपने अधीन कर लिया। उसी वक्त दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह ने अली मोहम्मद खां को नवाब का दर्जा दे दिया।
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वर्ष 1749 में अली मोहम्मद खां के इंतकाल के बाद रुहेलखंड के सभी जिलों को उनके छह बेटों और अन्य सरदारों में बांट दिया गया। उझानी और उसके आसपास का इलाका नवाब के बड़े बेटे मोहम्मद अब्दुल्ला के हिस्से में आया। वह वहीं पर गढ़ी बनाकर रहने लगे। सर्प पालने व शिकार करने के शौकीन नवाब अब्दुल्ला कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए। बताते हैं उन दिनों गंगा ककोड़ देवी मंदिर के पास से होकर बहती थीं। वहीं पर उनकी मुलाकात ध्यान मुनि नाम के संत से हुई।

मुनि के आदेश पर अब्दुल्ला ने गंगा में स्नान और ककोड़ देवी का नियमित दर्शन शुरू किया। थोड़े ही दिन में नवाब का कुष्ठ रोग ठीक हो गया। गंगा एवं ककोड़ देवी के इस चमत्कार से प्रभावित होकर नवाब ने वहां मेला लगवाना शुरू किया। इसमें पूरे रुहेलखंड से लोग मेले में आकर गंगा किनारे प्रवास करने लगे। कालांतर में यही मेला ककोड़ा के नाम से विख्यात हुआ।

Mohammad Abdullah had started Kakoda Mela on Ganga bank in Badaun
ककोड़ा मेला परिसर में लगी लाइट - फोटो : अमर उजाला

मुगलों के बाद अंग्रेजों ने लगवाया मेला
मुगल शासन के बाद अंग्रेजों ने मेला ककोड़ा को और भव्यता के साथ लगवाना शुरू किया। इसके लिए अंग्रेजों ने 1937 में कादरचौक थाने के सामने मेला का सामान रखने के लिए तीन बड़े गोदाम बनवाए थे। इसमें तत्कालीन जिला बोर्ड चेयरमैन चौधरी बदन सिंह के नाम का शिलापट आज भी लगा है। हालांकि अब गोदाम जीर्णशीर्ण अवस्था में है। आजादी के बाद मेला बेसिक शिक्षा विभाग ने लगावाया। उसके बाद जिला प्रशासन की ओर से मेले का आयोजन किया गया। अब जिला पंचायत मेला लगवाती है।  

ककोड़ देवी मंदिर के महंत धर्मगिरि ने बताया कि ककोड़ा मेले के बाद शुरू हुए दूसरे मेले ज्यादा भव्यता के साथ लगने लगे हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण ककोड़ा मेले को आज तक राजकीय मेले का दर्जा नहीं मिल सका है। नेताओं को इस बारे में सोचना चाहिए। 

महंत परमात्मा दास ने कहा कि ककोड़ा मेला अति प्राचीन मेला है जो मिनी कुंभ के नाम से जाना जाता है, लेकिन यहां कुंभ जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। मेले को राजकीय मेला घोषित किया जाना चाहिए, लेकिन इस बारे में नेताओं की ओर से कोई प्रयास नहीं किया जाता।  

सोमवार को हवन-पूजन के साथ होगा उद्घाटन
सोमवार को ककोड़ देवी मंदिर से झंडी मेले में पहुंचेगी। झंडी स्थापना के बाद हवन-पूजन करके मेले का उद्घाटन किया जाएगा। इसके साथ ही मेले में श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो जाएगा। शनिवार को मेले में लाइटिंग का काम तेजी से पूरा किया गया। मेले में पहुंचे युवाओं ने शनिवार को पंतगबाजी का आनंद लिया। 

सोमवार सुबह साढ़े नौ बजे जिला पंचायत अध्यक्ष वर्षा यादव और जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी सुरेंदु कुमार दुबे ककोड़ देवी मंदिर पहुंचेंगे। वहां से झंडी लेकर मेला पहुंचेंगे। शुभ मुहूर्त में झंडी स्थापित की जाएगी। 

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