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राहत के नाम पर व्यवस्था ‘लॉक’... गरीब बस्तियों में ‘बिलबिला’ रही भूख

Wed, 29 Apr 2020 06:26 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Wed, 29 Apr 2020 06:26 PM IST
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Lockdown effect
बदायूं। यहां अमीरी दिन में चार बार कपड़े बदलती है तो गरीबी को तन ढकने तक को नहीं मिलता। कोई आलीशान कोठियों के वातानुकूलित कमरों में सोता है तो कोई फुटपाथ किनारे पड़ा रात गुजार देता है। किसी को इतना मिलता है कि खाकर उसका पेट खराब हो जाता है तो किसी को एक वक्त की रोटी के लिए भी दूसरों के सामने हाथ फैलाने पड़ते हैं। भले ही हमारी आंखें अमीरों की खिड़कियों के भीतर न झांक पाएं, लेकिन गरीबी का दर्द तो हर चौराहे और हर गली में रोजाना दिखाई दे जाता है। आजकल ऐसा हो रहा है। लॉकडाउन में समर्थ लोग जहां घरों में पकवानों का आनंद ले रहे हैं वहीं गरीबों की बस्तियों में दो वक्त की रोटी के लिए मशक्कत हो रही है। इन लोगों की आंखें टकटकी लगाकर इस बात का इंतजार करती हैं कि शायद कहीं से कोई थोड़ी ‘राहत’ लेकर आ जाए। बच्चे जब भूख से बिलबिलाने लगते हैं तो घर में रखे चावल में पानी और नमक डालकर यूं ही उनके पेट की आग शांत कर दी जाती है।
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शहर में दातागंज रोड, नवादा, लालपुल समेत न जाने कितने इलाकों में ऐसे सैकड़ों लोग हैं जिनकी रोजी रोटी इस लॉकडाउन ने छीन ली। ऐसे में दो वक्त की रोटी के लिए या तो उन्हें प्रशासन की मदद का इंतजार रहता है या फिर किसी कथित समाजसेवी की मदद का, लेकिन उनके आशियानों तक ये मदद पहुंच नहीं पा रही है।
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कोई खाना दे गया तो खा लिया, वरना भूखे ही सो जाते हैं
दातागंज रोड पर भाजपा कार्यालय के सामने राजस्थान के राजसमंद जिले के खानाबदोश छह सात परिवार पिछले दो महीने से यहां पड़े हैं। पीओपी की मूर्तियां बनाकर बेचने से दो वक्त की रोटी की जुगाड़ हो जाती थी, लेकिन लॉकडाउन से वह सहारा भी छिन गया है। इन परिवारों में 25-30 लोग हैं, महिलाएं और छोटे बच्चे भी हैं। कोई खाना दे गया तो खा लिया वरना कभी-कभी भूखा भी सोना पड़ जाता है। सुरेश कुमार, मोहनलाल, पन्नालाल आदि बताते हैं गांव में दूसरे की जमीन पर गेहूं बोया है, लेकिन वहां न जाने पाने के कारण वह भी खराब हो रहा है। कहते हैं कि कई परिवार तो पैदल ही चलकर राजस्थान चले गए, लेकिन प्रशासन ने उन्हें रोक लिया है। अब दो वक्त की रोटी के लिए दूसरों के रहमो करम पर निर्भर हैं।
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सूप बेचकर करते थे गुजारा, काम बंद तो रोटी के पड़ गए लाले-
लालपुल के नजदीक नाहर खां सराय के सड़क किनारे लगभग पड़ी झुग्गी झोपड़ियों में एक दर्जन परिवार रहते हैं। सूप बेचकर दाल-रोटी चल जाती थी, लेकिन जब से लॉकडाउन हुआ है, तब से रोटी के लाले पड़ गए हैं। नैनसिंह बताते हैं कि 25 दिन पहले प्रशासन की तरफ से कुछ सामान बांटा गया था, लेकिन उसके बाद से कोई नहीं आया। जैसे तैसे रोटी का इंतजाम करते हैं। पहले बच्चों को खिलाते हैं, फिर खुद खाते हैं। यही हाली फूलो, कृष्णा, बबिता, सूरजपाल आदि के परिवारों का है। कहते हैं कि किसी की तरफ से कोई मदद नहीं मिली। बोले- वोट भी देते हैं। जब वोट की बारी आती है तो नेता दरवाजे पर आ जाते हैं, लेकिन अब कोई देखने तक नहीं आ रहा।
सूखी रोटी पर प्याज रखकर भर लिया पेट
खेड़ा बुजुर्ग गांव की तंग गलियों में कई परिवार हैं जो मेहनत मजदूरी करके पेट पालते हैं। कोई पल्लेदारी करता है तो कोई मिस्त्री का काम करता है। कोई ठेला लगाता है तो कोई टंकी नल सही करता है। इस समय किसी के पास कोई काम नहीं है। कुछ के पास राशन कार्ड हैं लेकिन उनसे मिलने वाला राशन बड़े परिवार के लिए पर्याप्त नहीं होता। नल सही करने वाले सुमन के परिवार में पांच छोटी लड़किया तथा दो लड़के हैं। भूख लगती है तो सूखी रोटी पर प्याज रखकर खा लेते हैं। राजकुमार फल का ठेला लगाकर दो वक्त की रोटी की जुगाड़ करता है लेकिन इन दिनों बिक्री बंद है। कहते हैं कि कुछ दिन तो खाना बांटने वाले आए लेकिन उसके बाद उनका आना भी नहीं हुआ। लगभग 70 साल के बुजुर्ग ओमप्रकाश कहते हैं कि परिवार भाई भतीजे मिलाकर 18 लोग हैं। चाट का ठेला लगाकर भतीजे कमाते थे, लेकिन अब काम बंद है। राहत के नाम पर कोई नहीं आता।
मजदूरों के सामने भी आ रही रोजगार की समस्या
केवल झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले लोग ही नहीं मजदूरों के सामने भी रोजगार की समस्या आने लगी है। प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार जिले में दो लाख 22 हजार मजदूर हैं जिनमें सक्रिय मजदूरों की संख्या 94 हजार 500 तथा निष्क्रिय मजदूरों की संख्या एक लाख 27 हजार पांच सौ है। इसके अलावा 53576 मजदूर श्रम विभाग में पंजीकृत हैं।
ये हैं आवंटित धनराशि के आंकड़े
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार पिछले दिनों जिला प्रशासन ने पांच तहसीलों को कुल 15 लाख रुपये मिले थे, जिसमें बदायूं तहसील के लिए पांच लाख रुपये, बिल्सी और दातागंज को तीन-तीन लाख और बिसौली व सहसवान को दो-दो लाख रुपये दिये गए थे। दो दिन पहले सभी को कुल 25 लाख रुपये दिया गया है, जिसमें प्रत्येक तहसील को पांच-पांच लाख रुपये दिए गए हैं ताकि खाद्य सामग्री खरीदकर गरीब लोगों को मुहैया कराई जा सके, लेकिन फिर भी गली और झुग्गी झोपड़ियों तक मदद न पहुंचना अपने आप में एक सवाल पैदा कर रहा है।
प्रशासन कर रहा पूरी व्यवस्था, डीएम बोले- हेल्पलाइन नंबर है ना
किसी को भी भूखा न सोना पड़े इसके लिए प्रशासन लगा है। दावा है कि लोगों तक मदद पहुंचाई जा रही है लेकिन फिर भी झुग्गी बस्तियों वाले लोग परेशान हैं। डीएम कुमार प्रशांत ने बताया कि प्रशासन का पूरा प्रयास है कि कोई भी भूखा न रहे। जिन लोगों का रोजगार छिना है उनके लिए राशन सामग्री की व्यवस्था की जा रही है। इसके अलावा जिस किसी भी व्यक्ति को राशन किट की आवश्यकता हो तो वह आपूर्ति के हेल्पलाइन नंबर 266979 पर फोन करके सहायता ले सकता है। उनको राशन किट पहुंच जाएगी। यदि पात्र हैं तो उनके राशनकार्ड भी बनाए जाएंगे। अभी 1700 के लगभग राशन कार्ड बनवाए भी गए हैं। जिन लोगों को किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है ऐसे लोगों को सरकार द्वारा एक हजार रुपये दिया जा रहा है। इन लोगों को तहसील स्तर पर अपने नाम दर्ज कराने होगें। इसके अलावा बाहर से आकर रहने वाले खानाबदोश जैसे लोग हैं उन्हें राशन उपलब्ध कराया जा रहा है। आगे भी उन्हें 15 दिन या एक महीने के लिए राशन किट उपलब्ध कराई जाएगी। उसके बाद उन्हें भेजा जाएगा

प्रशासन द्वारा एक सप्ताह द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा खाद्यान्न का पैकेट
-पांच किलो आटा
-पांच किलो चावल
-एक किलो अरहर की दाल
-तीन किलो आलू
-एक लीटर रिफाइंड
-एक किलो नमक
-200 ग्राम हल्दी
-200 ग्राम धनिया
-200 ग्राम लाल मिर्च
कुछ निस्वार्थ तो कुछ धर्म देखकर कर रहे सेवा
जरूरतमंदों की मदद का जहां तक सवाल है तो तमाम लोग निस्वार्थ भाव से इनकी सेवा कर रहे हैं। ये लोग बिना किसी से कुछ कहे रोजाना गरीबों की बस्तियों तक जाते हैं और उनको यथासंभव खाना या राहत सामग्री देकर मदद करते हैं लेकिन कुछ लोगों ने इसे केवल प्रचार का ही साधन बना लिया है। सामग्री बरांटकर इसे सोशल मीडिया पर पोस्ट किया जाता है। सड़क किनारे पड़ी झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोग जनहित की दुहाई देने वाले नेताओं से भी आहत हैं। उनका कहना है कि नेता तो यहां झांकने तक नहीं आते। कुछ का तो यहां तक कहना था कि कुछ लोग सफेद कुर्ता पायजामा पहनकर आते भी हैं तो धर्म देखकर सामान देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि मानवता का भी क्या कोई धर्म होता है। ऐसे लोगों के लिए बस दो लाइनें और बात खत्म- ‘मस्जिद की बात कर, न शिवालों की बात कर, खाली सिकम (पेट) पड़े हैं, बस निवालों की बात कर’।
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