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दुश्मन बड़े लोग थे तो पीड़ित को इंसाफ दिलाने को आगे आए वकील
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बदायूं। सत्तापक्ष से जुड़े प्रभावशाली लोगों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने के लिए पीड़ित परिवार के पास सिर्फ हौसला ही था। आर्थिक तंगी के चलते कानूनी पैरवी प्रभावित हो रही थी तो शहर के प्रतिष्ठित वकीलों ने आगे आकर मोर्चा संभाल लिया। इनमें से अधिकांश ने निशुल्क रूप से तो कई ने नाममात्र के मेहनताने में ही परिवार की कानूनी लड़ाई को जारी रखा। यहां तक कि आम जनता के साथ ही कई बार धरना, प्रदर्शन व आंदोलन में सहभागिता की।
पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए लड़ाई लड़ने वालों में रोहताश सक्सेना, अरविंद शर्मा, दिवंगत उमाशंकर शर्मा, दिवंगत रविंद्रनाथ दुबे, योगेंद्रपाल शर्मा, अरविंद पाराशरी, राकेश जौहरी, अरुण सक्सेना व प्रदीप शर्मा आदि शामिल रहे। इन्होंने समय-समय पर पीड़ित पक्ष के समर्थन में कोर्ट के सामने साक्ष्य और गवाहों को पेश किया। इनमें सबसे ज्यादा संघर्ष करने वाले उमाशंकर शर्मा और रविंद्रनाथ दुबे रहे।
नारी निकेतन में जाकर छात्रा को धमकाया गया
मामले के पहले वकील जिला बार के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व डीजीसी रोहताश सक्सेना ने ही योगेंद्र सागर समेत उसके - गुर्गों की सजा की पटकथा लिख दी थी। रोहताश सक्सेना ने बताया कि जब छात्रा की बरामदगी हुई तब वह बुरी हालत में बदहवास और अवसाद में थी। ऐसे में उनकी पैरवी पर उसको नारी निकेतन भेजा गया। नारी निकेतन में भी छात्रा तो धमकाया गया। पुलिस और सागर के गुर्गे उसको धमकाते थे। छात्रा के 164 के बयान भी दबाव में हुए थे।
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पुलिस की कहानी में झोल ही झोल थे, हमने उधेड़ दिए
पीड़ित का केस लड़ने वाले अधिवक्ता अरविंद शर्मा का कहना था कि केस में फंसने का रास्ता खुद सागर के प्रभावशाली व्यक्तित्व की वजह से बन गया। सागर के दबाव में पुलिस बिना सोचे समझे कुछ भी निर्णय ले जाती थी और अपनी कारगुजारी में झोल छोड़ती आगे बढ़ जाती थी। अधकचरी विवेचना का लाभ पीड़ित पक्ष को मिला। हम लोगों ने पुलिस की बिंदुवार खामी को आधार बनाकर सागर की सजा का रास्ता साफ कराया।
वरिष्ठ अधिवक्ता योगेंद्र पाल शर्मा का कहना है कि वह वकील के लिहाज से तो इस केस से सीधे नहीं जुड़े पर पीड़िता को न्याय दिलाने की लड़ाई में जरूर भागीदारी निभाई। आरोपी पक्ष प्रभावशाली था तो पीड़ित पक्ष को धरना प्रदर्शन करके भी हक मांगना पड़ा। उनके साथ कई अन्य वकीलों ने इसमें परिवार की मदद की। कोर्ट के फैसला निश्चित रूप से ही पीड़ित परिवार के हक में आया है।
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पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए लड़ाई लड़ने वालों में रोहताश सक्सेना, अरविंद शर्मा, दिवंगत उमाशंकर शर्मा, दिवंगत रविंद्रनाथ दुबे, योगेंद्रपाल शर्मा, अरविंद पाराशरी, राकेश जौहरी, अरुण सक्सेना व प्रदीप शर्मा आदि शामिल रहे। इन्होंने समय-समय पर पीड़ित पक्ष के समर्थन में कोर्ट के सामने साक्ष्य और गवाहों को पेश किया। इनमें सबसे ज्यादा संघर्ष करने वाले उमाशंकर शर्मा और रविंद्रनाथ दुबे रहे।
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नारी निकेतन में जाकर छात्रा को धमकाया गया
मामले के पहले वकील जिला बार के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व डीजीसी रोहताश सक्सेना ने ही योगेंद्र सागर समेत उसके - गुर्गों की सजा की पटकथा लिख दी थी। रोहताश सक्सेना ने बताया कि जब छात्रा की बरामदगी हुई तब वह बुरी हालत में बदहवास और अवसाद में थी। ऐसे में उनकी पैरवी पर उसको नारी निकेतन भेजा गया। नारी निकेतन में भी छात्रा तो धमकाया गया। पुलिस और सागर के गुर्गे उसको धमकाते थे। छात्रा के 164 के बयान भी दबाव में हुए थे।
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पुलिस की कहानी में झोल ही झोल थे, हमने उधेड़ दिए
पीड़ित का केस लड़ने वाले अधिवक्ता अरविंद शर्मा का कहना था कि केस में फंसने का रास्ता खुद सागर के प्रभावशाली व्यक्तित्व की वजह से बन गया। सागर के दबाव में पुलिस बिना सोचे समझे कुछ भी निर्णय ले जाती थी और अपनी कारगुजारी में झोल छोड़ती आगे बढ़ जाती थी। अधकचरी विवेचना का लाभ पीड़ित पक्ष को मिला। हम लोगों ने पुलिस की बिंदुवार खामी को आधार बनाकर सागर की सजा का रास्ता साफ कराया।
वरिष्ठ अधिवक्ता योगेंद्र पाल शर्मा का कहना है कि वह वकील के लिहाज से तो इस केस से सीधे नहीं जुड़े पर पीड़िता को न्याय दिलाने की लड़ाई में जरूर भागीदारी निभाई। आरोपी पक्ष प्रभावशाली था तो पीड़ित पक्ष को धरना प्रदर्शन करके भी हक मांगना पड़ा। उनके साथ कई अन्य वकीलों ने इसमें परिवार की मदद की। कोर्ट के फैसला निश्चित रूप से ही पीड़ित परिवार के हक में आया है।