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स्वास्थ्य नहीं %रेफर केंद्र% कहिए जनाब....मरीजों को धकेला जा रहा जिला अस्पताल
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बदायूं। कहने को सरकार ने जिले के प्रत्येक इलाके में प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खोले हैं। उन पर डॉक्टर से लेकर स्टाफ भी तैनात है। दवाओं और मरीजों के इलाज का भी दावा किया जा रहा है। इसके बावजूद स्वास्थ्य केंद्रों से लगातार मरीज जिला अस्पताल रेफर हो रहे हैं। इतना ही नहीं स्वास्थ्य केंद्रों के चिकित्सक घायलों और पुलिस के मामलों में मेडिकल परीक्षण तक नहीं कर रहे हैं। उन्हें भी जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।
जिले के उझानी, सहसवान, दहगवां, बिसौली समेत 14 स्थानों पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बने हैं। इनके अलावा जिले में तीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 43 नवीन स्वास्थ्य केंद्र हैं। जिस समय इनके निर्माण हुए होंगे, उस समय सरकार और जिला प्रशासन की मंशा रही होगी कि कम से कम इन इलाकों के मरीजों को जिला अस्पताल भागना नहीं पड़ेगा। उन्हें स्थानीय स्तर पर दवा उपलब्ध हो जाएगी, जिससे उनको उपचार भी तुरंत मिल सकेगा लेकिन आज के हालात बिल्कुल विपरीत हो चुके हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था के लिहाज से बदायूं जिला स्वास्थ्य केंद्रों के निर्माण से पहले की स्थिति में पहुंच गया है। न तो किसी स्वास्थ्य केंद्र पर भरपूर दवाईयां हैं और न ही चिकित्सक समय से बैठ रहे हैं। स्टाफ भी मरीजों को कम परेशान नहीं कर रहा है।
वैसे भी जिले के स्वास्थ्य केंद्रों से करीब 90 प्रतिशत मरीज रेफर होकर जिला अस्पताल पहुंच रहे हैं। इनमें सिर्फ घायल ही नहीं, बल्कि ऐसे-ऐसे मरीज शामिल होते हैं, जो स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों पर सही दवा और सही देखभाल से ठीक हो सकते हैं।
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बुखार ने दी दस्तक, तैयारियां शून्य
-वर्ष 2018 में फैले बुखार की वजह सिर्फ स्वास्थ्य केंद्रों की बदइंतजामी थी। दातागंज, समरेर, जगत, बिनावर, कुुंवरगांव आदि स्वास्थ्य केंद्रों पर दवाएं तक उपलब्ध नहीं थीं। किसी भी स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी ने बुखार से निपटने की कोशिश नहीं की थी। इससे करीब 275 लोगों की जान चली गई थी। अब फिर बरसात का मौसम आ चुका है। बुखार भी पनपना शुरू हो गया है। व्यवस्थाएं दुरुस्त कराने की बात तो बहुत दूर, स्वास्थ्य विभाग ने पिछले आंकड़ों तक पर गौर तक नहीं किया है।
दवाएं खत्म, लूटखसोट में लगा स्टाफ
उसहैत। नगर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की हालत वास्तव में बहुत खराब है। चिकित्सक बरेली से आते-जाते हैं। सुबह आठ से दो बजे तक रहे और दो बजे के बाद चले गए तो अगले दिन ही मरीज का उपचार होगा। तब तक चाहे मरीज के साथ कुछ हो। अगर मरीज को दवाई लिख भी दी तो स्वास्थ्य केंद्र में मिलना मुश्किल है। मरीज को पहले से ही मेडिकल स्टोर का पता बता दिया जाता है। रही बात महिलाओं की डिलीवरी की तो सबसे ज्यादा दिक्कत यहीं पर आ रही है। पहले महिलाओं को उल्टा बच्चा, ऑपरेशन आदि के नाम पर डराया जाता है। मरीज परेशानी बताता है तो स्टाफ का उल्लू सीधा हो जाता है। प्रत्येक डिलीवरी पर मिठाई पक्की है।
गंदगी से बुरा हाल, कैसे दूर हो बीमारी
म्याऊं। स्वास्थ्य केंद्र म्याऊं के भी हालात अच्छे नहीं हैं। यहां जहां-तहां गंदगी फैली पड़ी है। दीवारों से कूड़े के ढेर लगे हैं। प्रसव कक्ष के पीछे गंदगी फैली पड़ी है। शौचालय से लेकर बाथरूम, वार्ड, स्वास्थ्य केंद्र परिसर में गंदगी ही गंदगी है। किसी भी वार्ड में बेड पर चादर नहीं लगाई जाती। मरीजों को उन पर ऐसे ही लिटा दिया जाता है। ऐसे में मरीजों की बीमारी घटने के नहीं बढ़ने के ज्यादा आसार नजर आते हैं।
- इस समय संचारी रोग सप्ताह चल रहा है। इसका उद्देश्य ही है बीमारियों की रोकथाम और उपचार करना। रही बात मरीजों को रेफर करने की तो हम सभी स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारियों को पत्र दे चुके हैं कि मरीजों का सुविधाओं के अनुसार इलाज जरूर करें। अनावश्यक रूप से किसी मरीज को रेफर नहीं करें।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सीएमओ
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जिले के उझानी, सहसवान, दहगवां, बिसौली समेत 14 स्थानों पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बने हैं। इनके अलावा जिले में तीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 43 नवीन स्वास्थ्य केंद्र हैं। जिस समय इनके निर्माण हुए होंगे, उस समय सरकार और जिला प्रशासन की मंशा रही होगी कि कम से कम इन इलाकों के मरीजों को जिला अस्पताल भागना नहीं पड़ेगा। उन्हें स्थानीय स्तर पर दवा उपलब्ध हो जाएगी, जिससे उनको उपचार भी तुरंत मिल सकेगा लेकिन आज के हालात बिल्कुल विपरीत हो चुके हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था के लिहाज से बदायूं जिला स्वास्थ्य केंद्रों के निर्माण से पहले की स्थिति में पहुंच गया है। न तो किसी स्वास्थ्य केंद्र पर भरपूर दवाईयां हैं और न ही चिकित्सक समय से बैठ रहे हैं। स्टाफ भी मरीजों को कम परेशान नहीं कर रहा है।
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वैसे भी जिले के स्वास्थ्य केंद्रों से करीब 90 प्रतिशत मरीज रेफर होकर जिला अस्पताल पहुंच रहे हैं। इनमें सिर्फ घायल ही नहीं, बल्कि ऐसे-ऐसे मरीज शामिल होते हैं, जो स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों पर सही दवा और सही देखभाल से ठीक हो सकते हैं।
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बुखार ने दी दस्तक, तैयारियां शून्य
-वर्ष 2018 में फैले बुखार की वजह सिर्फ स्वास्थ्य केंद्रों की बदइंतजामी थी। दातागंज, समरेर, जगत, बिनावर, कुुंवरगांव आदि स्वास्थ्य केंद्रों पर दवाएं तक उपलब्ध नहीं थीं। किसी भी स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी ने बुखार से निपटने की कोशिश नहीं की थी। इससे करीब 275 लोगों की जान चली गई थी। अब फिर बरसात का मौसम आ चुका है। बुखार भी पनपना शुरू हो गया है। व्यवस्थाएं दुरुस्त कराने की बात तो बहुत दूर, स्वास्थ्य विभाग ने पिछले आंकड़ों तक पर गौर तक नहीं किया है।
दवाएं खत्म, लूटखसोट में लगा स्टाफ
उसहैत। नगर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की हालत वास्तव में बहुत खराब है। चिकित्सक बरेली से आते-जाते हैं। सुबह आठ से दो बजे तक रहे और दो बजे के बाद चले गए तो अगले दिन ही मरीज का उपचार होगा। तब तक चाहे मरीज के साथ कुछ हो। अगर मरीज को दवाई लिख भी दी तो स्वास्थ्य केंद्र में मिलना मुश्किल है। मरीज को पहले से ही मेडिकल स्टोर का पता बता दिया जाता है। रही बात महिलाओं की डिलीवरी की तो सबसे ज्यादा दिक्कत यहीं पर आ रही है। पहले महिलाओं को उल्टा बच्चा, ऑपरेशन आदि के नाम पर डराया जाता है। मरीज परेशानी बताता है तो स्टाफ का उल्लू सीधा हो जाता है। प्रत्येक डिलीवरी पर मिठाई पक्की है।
गंदगी से बुरा हाल, कैसे दूर हो बीमारी
म्याऊं। स्वास्थ्य केंद्र म्याऊं के भी हालात अच्छे नहीं हैं। यहां जहां-तहां गंदगी फैली पड़ी है। दीवारों से कूड़े के ढेर लगे हैं। प्रसव कक्ष के पीछे गंदगी फैली पड़ी है। शौचालय से लेकर बाथरूम, वार्ड, स्वास्थ्य केंद्र परिसर में गंदगी ही गंदगी है। किसी भी वार्ड में बेड पर चादर नहीं लगाई जाती। मरीजों को उन पर ऐसे ही लिटा दिया जाता है। ऐसे में मरीजों की बीमारी घटने के नहीं बढ़ने के ज्यादा आसार नजर आते हैं।
- इस समय संचारी रोग सप्ताह चल रहा है। इसका उद्देश्य ही है बीमारियों की रोकथाम और उपचार करना। रही बात मरीजों को रेफर करने की तो हम सभी स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारियों को पत्र दे चुके हैं कि मरीजों का सुविधाओं के अनुसार इलाज जरूर करें। अनावश्यक रूप से किसी मरीज को रेफर नहीं करें।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सीएमओ