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Budaun News: अमरूद में लगे उखटा के कारण उचट रहा बागवानों का मन
Wed, 29 Jan 2025 01:42 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
Updated Wed, 29 Jan 2025 01:42 AM IST
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अब्दुल हलीम।
अलापुर। अमरूद में उखटा रोग लगने के कारण इनके बागों की संख्या काफी कम हो गई है। इसका मुख्य कारण बागवानों को दवा और मुआवजा न मिलना बताया जा रहा है। पहले जहां छह हजार बीघा में अमरूद के बाग फैले थे, वहीं अब महज छह से सात सौ बीघा में बाग रह गए हैं।
ककराला में लगभग 90 प्रतिशत लोग अमरूद की बागवानी करते थे। पिछले दस वर्षों से लगातार अमरूद के बाग अचानक कम होते चले गए। पहले एक दिन में एक से सवा करोड़ रुपये का कारोबार होता था। आज यह कारोबार दस लाख रुपये से भी कम का रह गया है।
ककराला कस्बे में तकरीबन छह-सात हजार बीघा जमीन पर अमरूद के बाग थे। अमरूद की पैदावार एक साल में दो बार होती है। एक फसल बरसात में तो दूसरी फसल सर्दियों में। पिछले कुछ सालों में पैदावार कम होने के साथ ही उखटा रोग लगने से अमरूद के पेड़ सूखने लगे। पैदावार इतनी कम होने लगी कि लागत भी नहीं निकल रही।
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गत वर्ष अमरूद का थोक रेट 1700 रुपये क्विंटल था। इसमें मजदूरी, खाद, पानी, दवाई, पैकिंग की लागत निकालकर मुनाफा न के बराबर रह गया। पहले यहां का अमरूद पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, मुंबई, गुजरात जाता था। यहां से जूस तैयार कर विदेशों में भेजा जाता था। उस समय दस हजार रुपये बीघा की पैदावार थी। आढ़ती भूरे ने बताया कि यहां से रोजाना छोटी बड़ी दो सौ गाड़ियों से अमरूद बाहर जाता था। अब इस समय दस गाड़ियां भी नहीं जाती हैं। हाल यह है कि पहले छह-सात हजार बीघा में बाग होते थे, जो अब घटकर छह-सात सौ बीघा में रह गए। करीब 12 हजार अमरूद के बागवान थे जो अब घटकर बमुश्किल 1000-1200 रह गए हैं। अब हाल यह है कि उत्तराखंड से अमरूद यहां आ रहा है।
क्या बोले किसान
फोटो-10
-पहले हमारे पास अस्सी बीघा अमरूद का बाग था। उखटा रोग लगने से पेड़ सूख गए, जिसके चलते बाग काटना पड़ा। अब सात आठ बीघा बाग बचा है। पहले यहां का अमरूद बाहर जाता था , अब बाहर से यहां आता है। अब्दुल हलीम, ककराला
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फोटो-09
-बागों में उखटा रोग लगा तो फसल नष्ट होने लगी। तमाम तरह की दवाओं का उपयोग किया लेकिन रोग पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका। अब तो नाम मात्र को ही बाग दिखाई पड़ते हैं। 60 बीघा में से 10 बीघा का महज एक ही बाग बचा है।- नदीम खान,ककराला
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ककराला में लगभग 90 प्रतिशत लोग अमरूद की बागवानी करते थे। पिछले दस वर्षों से लगातार अमरूद के बाग अचानक कम होते चले गए। पहले एक दिन में एक से सवा करोड़ रुपये का कारोबार होता था। आज यह कारोबार दस लाख रुपये से भी कम का रह गया है।
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ककराला कस्बे में तकरीबन छह-सात हजार बीघा जमीन पर अमरूद के बाग थे। अमरूद की पैदावार एक साल में दो बार होती है। एक फसल बरसात में तो दूसरी फसल सर्दियों में। पिछले कुछ सालों में पैदावार कम होने के साथ ही उखटा रोग लगने से अमरूद के पेड़ सूखने लगे। पैदावार इतनी कम होने लगी कि लागत भी नहीं निकल रही।
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गत वर्ष अमरूद का थोक रेट 1700 रुपये क्विंटल था। इसमें मजदूरी, खाद, पानी, दवाई, पैकिंग की लागत निकालकर मुनाफा न के बराबर रह गया। पहले यहां का अमरूद पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, मुंबई, गुजरात जाता था। यहां से जूस तैयार कर विदेशों में भेजा जाता था। उस समय दस हजार रुपये बीघा की पैदावार थी। आढ़ती भूरे ने बताया कि यहां से रोजाना छोटी बड़ी दो सौ गाड़ियों से अमरूद बाहर जाता था। अब इस समय दस गाड़ियां भी नहीं जाती हैं। हाल यह है कि पहले छह-सात हजार बीघा में बाग होते थे, जो अब घटकर छह-सात सौ बीघा में रह गए। करीब 12 हजार अमरूद के बागवान थे जो अब घटकर बमुश्किल 1000-1200 रह गए हैं। अब हाल यह है कि उत्तराखंड से अमरूद यहां आ रहा है।
क्या बोले किसान
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-पहले हमारे पास अस्सी बीघा अमरूद का बाग था। उखटा रोग लगने से पेड़ सूख गए, जिसके चलते बाग काटना पड़ा। अब सात आठ बीघा बाग बचा है। पहले यहां का अमरूद बाहर जाता था , अब बाहर से यहां आता है। अब्दुल हलीम, ककराला
फोटो-09
-बागों में उखटा रोग लगा तो फसल नष्ट होने लगी। तमाम तरह की दवाओं का उपयोग किया लेकिन रोग पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका। अब तो नाम मात्र को ही बाग दिखाई पड़ते हैं। 60 बीघा में से 10 बीघा का महज एक ही बाग बचा है।- नदीम खान,ककराला

अब्दुल हलीम।

अब्दुल हलीम।