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Budaun News: भवन के निर्माण में खर्च कर दिए चार करोड़, आईसीयू में वेंटिलेटर तक नहीं
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बदायूं। जिला अस्पताल में एक साल में करीब चार करोड़ रुपये की लागत से नए दो वार्ड, पैथोलॉजी का भवन, ब्लड सेपरेशन यूनिट, डायलिसिस का भवन बनाया गया, लेकिन आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए। इसका प्रमाण है बिना वेंटिलेटर का आईसीयू। ऐसे में मरीज की हालत जब बिगड़ती है तो उसे मेडिकल कॉलेज ले जाना पड़ता है। मरीज कई बार तो रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
समस्या झेल चुके मरीजों व तीमारदारों का कहना है कि जिस तरह से बिल्डिंग बनाने पर रुपया पानी की तरह खर्च किया, वैसे ही अगर संसाधनों को भी अस्पताल में लगवाने की कवायद की जाती तो व्यवस्था काफी सुधर जाती। डॉक्टर दवा के सहारे ही गंभीर मरीज का इलाज नहीं कर सकता, इसके लिए बहुत सारे अन्य संसाधनों की भी जरूरत होती है। डॉक्टर गंभीर व्यक्ति को अगर आईसीयू में भर्ती कर भी लें तो हालत बिगड़ने पर उनके पास मरीज को रेफर करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं होता। मरीजों का सवाल है कि करोड़ों रुपये से बिल्डिंग बनाई तो फिर संसाधन देने में कंजूसी क्यों की जा रही है।
आईसीयू में वेंटिलेटर न होने की वजह से पिता ने गवां दी थी जान
वजीरगंज विकास क्षेत्र के गांव बरीपुरा निवासी अमित ने बताया कि 4 अप्रैल को सांस की दिक्कत होने पर उन्होंने पिताजी को जिला अस्पताल के आईसीयू वार्ड में भर्ती कराया था। हालत अचानक बिगड़ गई थी। वेंटिलेटर नहीं मिल सका। डॉक्टर ने कहा कि मरीज को तत्काल मेडिकल काॅलेज ले जाएं। मेडिकल कॉलेज ले जाते समय उनकी मौत हो गई थी। अमित का कहना है कि पड़ताल की जाए तो ऐसे कई और मामले सामने आएंगे।
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वेंटिलेटर नहीं है, 60 किलोमीटर दूर लेकर जाएं मरीज
कस्बा सैदपुर से सतरूपा देवी (65) को 1 मई को अस्पताल में लाया गया। पैर में फ्रैक्चर था। हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. रियाज अहमद ने मरीज के तीमारदार से कहा कि इलाज करने के लिए वह तैयार हैं, वेंटिलेटर न होने से जान का जोखिम है। पैर का ऑपरेशन होना है। ऑपरेशन के दौरान एक घंटे का समय काफी संवेदनशील होता है। अगर जान का जोखिम पड़ा तो वेंटिलेटर की मदद चाहिए जो यहां नहीं है। डॉक्टर की बात सुनकर परिजन मरीज को फिर निजी अस्पताल लेकर गए।
संसाधनों की पूर्ति के लिए लगातार पत्राचार कर रहे हैं। प्रयास रहता है कि उपलब्ध संसाधनों से बेहतर इलाज हो। इसमें कोई कोताही नहीं होने देते। संसाधन मिलें तो व्यवस्था में और सुधार हो जाएगा। - डॉ. कप्तान सिंह, सीएमएस, जिला अस्पताल बदायूं
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समस्या झेल चुके मरीजों व तीमारदारों का कहना है कि जिस तरह से बिल्डिंग बनाने पर रुपया पानी की तरह खर्च किया, वैसे ही अगर संसाधनों को भी अस्पताल में लगवाने की कवायद की जाती तो व्यवस्था काफी सुधर जाती। डॉक्टर दवा के सहारे ही गंभीर मरीज का इलाज नहीं कर सकता, इसके लिए बहुत सारे अन्य संसाधनों की भी जरूरत होती है। डॉक्टर गंभीर व्यक्ति को अगर आईसीयू में भर्ती कर भी लें तो हालत बिगड़ने पर उनके पास मरीज को रेफर करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं होता। मरीजों का सवाल है कि करोड़ों रुपये से बिल्डिंग बनाई तो फिर संसाधन देने में कंजूसी क्यों की जा रही है।
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आईसीयू में वेंटिलेटर न होने की वजह से पिता ने गवां दी थी जान
वजीरगंज विकास क्षेत्र के गांव बरीपुरा निवासी अमित ने बताया कि 4 अप्रैल को सांस की दिक्कत होने पर उन्होंने पिताजी को जिला अस्पताल के आईसीयू वार्ड में भर्ती कराया था। हालत अचानक बिगड़ गई थी। वेंटिलेटर नहीं मिल सका। डॉक्टर ने कहा कि मरीज को तत्काल मेडिकल काॅलेज ले जाएं। मेडिकल कॉलेज ले जाते समय उनकी मौत हो गई थी। अमित का कहना है कि पड़ताल की जाए तो ऐसे कई और मामले सामने आएंगे।
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वेंटिलेटर नहीं है, 60 किलोमीटर दूर लेकर जाएं मरीज
कस्बा सैदपुर से सतरूपा देवी (65) को 1 मई को अस्पताल में लाया गया। पैर में फ्रैक्चर था। हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. रियाज अहमद ने मरीज के तीमारदार से कहा कि इलाज करने के लिए वह तैयार हैं, वेंटिलेटर न होने से जान का जोखिम है। पैर का ऑपरेशन होना है। ऑपरेशन के दौरान एक घंटे का समय काफी संवेदनशील होता है। अगर जान का जोखिम पड़ा तो वेंटिलेटर की मदद चाहिए जो यहां नहीं है। डॉक्टर की बात सुनकर परिजन मरीज को फिर निजी अस्पताल लेकर गए।
संसाधनों की पूर्ति के लिए लगातार पत्राचार कर रहे हैं। प्रयास रहता है कि उपलब्ध संसाधनों से बेहतर इलाज हो। इसमें कोई कोताही नहीं होने देते। संसाधन मिलें तो व्यवस्था में और सुधार हो जाएगा। - डॉ. कप्तान सिंह, सीएमएस, जिला अस्पताल बदायूं