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रक्षाबंधन: बदायूं के 14 गांवों में एक दिन पहले ही बांधी गई राखी, आल्हा-ऊदल के जमाने से चली आ रही परंपरा

Thu, 27 Aug 2026 07:39 PM IST
Mukesh Kumar संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं Published by: Mukesh Kumar Updated Thu, 27 Aug 2026 07:39 PM IST
सार

बदायूं जिले के 14 गांवों में रक्षाबंधन का पर्व एक दिन पहले ही मनाया गया। इन गांवों में यह अनोखी परंपरा आल्हा-ऊदल के जमाने से ही चली आ रही है। जानिए क्या है कहानी... 

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festival of Raksha Bandhan was celebrated a day early in 14 villages of Budaun
रक्षाबंधन का पर्व मनाते भाई-बहन व परिजन - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

पूरे देश में रक्षाबंधन 28 अगस्त (शुक्रवार) को मनाया जाएगा, लेकिन बदायूं के कादरचौक क्षेत्र के 14 गांवों में बृहस्पतिवार को ही राखी का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। यहां सदियों पुरानी भुजरियन परंपरा आज भी पूरी शिद्दत से निभाई जा रही है।

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यह है मान्यता 
कादरचौक क्षेत्र के यह चौदह गांव भंटेली कहलाते हैं। बुजुर्गों के अनुसार यहां पहले जमींदारी प्रथा थी। स्थानीय जमींदार ठाकुर सोरन सिंह, वीरेंद्र सिंह, लाखन सिंह यादव महोबा के चंदेल शासक परमाल के अधीन थे। ग्रामीण बताते हैं कि दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण किया था। उस समय रानी चंद्रबली ने मुंहबोले भाई आल्हा से राज्य की रक्षा की गुहार लगाई। युद्ध रक्षाबंधन वाले दिन तय था। 
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ऐसे में आल्हा ने अपने अधीन 14 गांवों में एक दिन पहले ही राखी बंधवाने की घोषणा कर दी और अगले दिन युद्ध के लिए रवाना हो गए थे। कुछ लोग इसे जमींदार के अत्याचार के विरुद्ध युद्ध से भी जोड़ते हैं। इसी परंपरा के चलते आज भी कादरचौक, लभारी, चौडेरा, मामूरगंज, गढिया, भोजपुर, कचौरा, देवी नगला, सिसौरा, गनेश नगला, कलुआ नगला, कैथोला, राजीव नगर, नारायण नगला में एक दिन पहले रक्षाबंधन मनाया जाता है। गंगा पार के 12 गांवों में भी यही परंपरा है।

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वर्षों से चली आ रही है परंपरा 
कैथोला के सेवाराम कश्यप ने बताया कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस बहाने अपने पूर्वजों की गाथा को भी याद कर लिया जाता है। चंदेल वंश, आल्हा और पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी रस्म है।

कचौरा के मुन्नालाल यादव ने बताया कि महोबा शासन में यहां के जमींदार आल्हा पक्ष के साथ थे। उसी युद्ध में जाने की वजह से एक दिन पहले त्योहार मनाया था जो अब तक चल रहा है। आल्हा-ऊदल के इतिहास से संबंधित पुस्तक में इसका प्रसंग छपा हुआ है।

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