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आखिर कैसे संजोए किसान भविष्य के सपने!

Wed, 13 May 2015 07:50 PM IST
Bisuli
Bisuli Updated Wed, 13 May 2015 07:50 PM IST
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तहसील का वही परिसर और वही पीड़ित किसान। मुआवजा राशि न मिलने की वही मांग। हर दिन एक ही सीन होता है। बस, बदलती है तो किसानों की सूरत, नाम और गांव। तहसील में दस बजते-बजते सैकड़ों किसान पहुंच जाते हैं। हाथ में ज्ञापन तो दिल में कुछ पाने की चाह। सैकड़ों किसानों ने मुआवजा राशि दिलाने की फरियाद की। सक्षम अधिकारी ने आश्वासन भी दिया लेकिन तसवीर का दूसरा पहलू भी है। प्रशासन के पास जब धन ही नहीं है तो फिर किसानों के आंसू कैसे पोछें जाएंगे। कोरे आश्वासन के लेकर भले ही किसान मुस्कराता हुआ घर चला जाए, लेकिन सब कुछ खो जाने की कसक उसके दिल में दबी ही रहती है। यह दबी चिंगारी कभी उग्र रूप ले सकती है। दूसरा पहलू भी यह है कि नुकसान हुआ हजारों का और हाथ में आए चेक की धनराशि हजार पार भी नहीं कर पा रही है। आखिर कब तक प्रशासन के कोरे आश्वासन के बल पर किसान अपने भविष्य के सपने संजोते रहेगे। 

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