{"_id":"63680afc067b08522e7a3834","slug":"fakkad-style-engrossed-in-the-tune-and-then-for-ganga-maiya-badaun-news-bly5030219105","type":"story","status":"publish","title_hn":"फक्कड़ अंदाज, धुन में मगन...चिलम सुलगाई और फिर हो लिए ‘गंगा मैया’ के","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
फक्कड़ अंदाज, धुन में मगन...चिलम सुलगाई और फिर हो लिए ‘गंगा मैया’ के
विज्ञापन
Fakkad style, engrossed in the tune...and then for 'Ganga Maiya'
- फोटो : BADAUN
सौरभ सक्सेना
बदायूं। फक्कड़ अंदाज, अपनी ही धुन में मगन। कभी मेला के इतिहास पर चर्चा तो कभी सभ्यता और संस्कृति पर गंभीर चिंतन। यही है गंगा घाट पर पहुंचे तमाम साधुओं की दिनचर्या। तड़के गंगा में डुबकी लगाकर भजन-कीर्तन और फिर लोगों को संदेश देना कि संस्कृति का पतन कैसे रुके, समाज सभ्य हो और कुरीतियों पर विराम लगे। कल्पवास पर आए साधु-संत इसी में अपना पूरा दिन बिता देते हैं। कुछ साधु बीच में चिलम सुलगाते हुए अपने में ही मगन नजर आते हैं।
ककोड़ा मेला में कुछ लोग अपने परिवारों के साथ धार्मिक आस्था लेकर आए हैं तो कुछ को ये शहरी भागदौड़ से हटकर सुकून के कुछ दिन जीने का माध्यम भी है। इनसे हटकर साधुओं की अपनी अलग दुनिया है। यहां लगभग एक से डेढ़ हजार साधु-संत अब तक आ चुके हैं। जगत के श्रीपाल बाबा हों या फिर सतेती के बाबा खेमकरन दास, अथैया (एटा) के चौड़ेसुर आश्रम के सूरज गिरी हों या फिर सिवाया हामिदपुर के लालगिरी महाराज, सभी ने छोटे-छोटे डेरे बनाए हैं।
कुरुक्षेत्र के तंगौर से आए प्रमोद गिरी महाराज का डेरा ही नहीं, अंदाज भी अलग है। वह बेफिक्र अंदाज में चिलम सुलगाते हैं और फिर चर्चा होती है धर्म और संस्कृति पर। लगभग 70 साल के प्रमोद गिरी कहते हैं कि गंगा किनारे आकर लगता है कि जैसे मां की गोद में आ गए हों। बचपन लौट आता है तो खुद में खो जाते हैं। चिलम का लंबा सा कश लेकर धुआं छोड़ते हुए कहते हैं कि यहां आकर तो गंगा मैया के ही हो जाते हैं।
विज्ञापन
अन्य साधुओं के बीच भी सभ्यता और संस्कृति मुख्य मुद्दा रहता है। बाबा खेमकरन दास कहते हैं कि आज सनातन धर्म में भी कुरीतियां फैल रही हैं। यहां लोगों को बताते हैं कि अपनी संस्कृति से बढ़कर कुछ नहीं है। श्रीपाल बाबा कहते हैं कि संस्कृति का पतन होगा तो मानव का भी पतन निश्चित है। यहां जो लोग सामूहिक यज्ञ और भजन-कीर्तन में आते हैं, उन्हें यही समझाने का प्रयास रहता है।
टेंट में ही होता है भंडारा
साधुओं की दिनचर्या की बात करें तो सुबह चार बजे उठने और नित्यकर्म के बाद गंगा किनारे शुरू होता है भजन-कीर्तन का सिलसिला। चार घंटे मगन रहने के बाद दोपहर में स्वयं भोजन बनाते हैं। टेंट में ही सैकड़ों साधुओं का भंडारा होता है। कुछ देर विश्राम के बाद फिर भजनों का सिलसिला फिर शुरू हो जाता है। शाम को गंगा आरती करते हैं और फिर विश्राम करने चले जाते हैं।
अंडा, मांस मदिरा बिक्री के खिलाफ उठाई थी आवाज
मेला ककोड़ा में आने वाले संत समाज की ही ताकत थी, जो साल 2010 में मेले में बिकने वाले अंडा, मांस-मछली और शराब के खिलाफ आवाज उठाई और ऐसे लोगों को वहां से भगा दिया। साल-दर साल होने वाले विरोध के बाद प्रशासन भी सख्त हुआ और इन चीजों की बिक्री पर लगाम लग गई। आज खुले में इन चीजों की बिक्री नहीं हो पाती।
मधुसूदनाचार्य के आश्रम में रुकते हैं सैकड़ों साधु-संत
देवचरी वाले मधुसूदनाचार्य महाराज का टेंट लगभग 10-12 साल से लग रहा है। लगभग सौ वर्ष के महाराज के आश्रम में सैकड़ों साधु-संत रुकते हैं और अलग-अलग टेंट लगाकर रहते हैं। महाराज बताते हैं कि रविवार से भंडारा शुरू हो गया है जो 10 नवंबर तक चलेगा। इस दौरान लगभग एक लाख आदमी यहां आकर प्रसाद ग्रहण करता है। अनाज आदि की व्यवस्था उनके शिष्यों और भक्तों द्वारा की जाती है।
विज्ञापन
बदायूं। फक्कड़ अंदाज, अपनी ही धुन में मगन। कभी मेला के इतिहास पर चर्चा तो कभी सभ्यता और संस्कृति पर गंभीर चिंतन। यही है गंगा घाट पर पहुंचे तमाम साधुओं की दिनचर्या। तड़के गंगा में डुबकी लगाकर भजन-कीर्तन और फिर लोगों को संदेश देना कि संस्कृति का पतन कैसे रुके, समाज सभ्य हो और कुरीतियों पर विराम लगे। कल्पवास पर आए साधु-संत इसी में अपना पूरा दिन बिता देते हैं। कुछ साधु बीच में चिलम सुलगाते हुए अपने में ही मगन नजर आते हैं।
ककोड़ा मेला में कुछ लोग अपने परिवारों के साथ धार्मिक आस्था लेकर आए हैं तो कुछ को ये शहरी भागदौड़ से हटकर सुकून के कुछ दिन जीने का माध्यम भी है। इनसे हटकर साधुओं की अपनी अलग दुनिया है। यहां लगभग एक से डेढ़ हजार साधु-संत अब तक आ चुके हैं। जगत के श्रीपाल बाबा हों या फिर सतेती के बाबा खेमकरन दास, अथैया (एटा) के चौड़ेसुर आश्रम के सूरज गिरी हों या फिर सिवाया हामिदपुर के लालगिरी महाराज, सभी ने छोटे-छोटे डेरे बनाए हैं।
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र के तंगौर से आए प्रमोद गिरी महाराज का डेरा ही नहीं, अंदाज भी अलग है। वह बेफिक्र अंदाज में चिलम सुलगाते हैं और फिर चर्चा होती है धर्म और संस्कृति पर। लगभग 70 साल के प्रमोद गिरी कहते हैं कि गंगा किनारे आकर लगता है कि जैसे मां की गोद में आ गए हों। बचपन लौट आता है तो खुद में खो जाते हैं। चिलम का लंबा सा कश लेकर धुआं छोड़ते हुए कहते हैं कि यहां आकर तो गंगा मैया के ही हो जाते हैं।
विज्ञापन
अन्य साधुओं के बीच भी सभ्यता और संस्कृति मुख्य मुद्दा रहता है। बाबा खेमकरन दास कहते हैं कि आज सनातन धर्म में भी कुरीतियां फैल रही हैं। यहां लोगों को बताते हैं कि अपनी संस्कृति से बढ़कर कुछ नहीं है। श्रीपाल बाबा कहते हैं कि संस्कृति का पतन होगा तो मानव का भी पतन निश्चित है। यहां जो लोग सामूहिक यज्ञ और भजन-कीर्तन में आते हैं, उन्हें यही समझाने का प्रयास रहता है।
टेंट में ही होता है भंडारा
साधुओं की दिनचर्या की बात करें तो सुबह चार बजे उठने और नित्यकर्म के बाद गंगा किनारे शुरू होता है भजन-कीर्तन का सिलसिला। चार घंटे मगन रहने के बाद दोपहर में स्वयं भोजन बनाते हैं। टेंट में ही सैकड़ों साधुओं का भंडारा होता है। कुछ देर विश्राम के बाद फिर भजनों का सिलसिला फिर शुरू हो जाता है। शाम को गंगा आरती करते हैं और फिर विश्राम करने चले जाते हैं।
अंडा, मांस मदिरा बिक्री के खिलाफ उठाई थी आवाज
मेला ककोड़ा में आने वाले संत समाज की ही ताकत थी, जो साल 2010 में मेले में बिकने वाले अंडा, मांस-मछली और शराब के खिलाफ आवाज उठाई और ऐसे लोगों को वहां से भगा दिया। साल-दर साल होने वाले विरोध के बाद प्रशासन भी सख्त हुआ और इन चीजों की बिक्री पर लगाम लग गई। आज खुले में इन चीजों की बिक्री नहीं हो पाती।
मधुसूदनाचार्य के आश्रम में रुकते हैं सैकड़ों साधु-संत
देवचरी वाले मधुसूदनाचार्य महाराज का टेंट लगभग 10-12 साल से लग रहा है। लगभग सौ वर्ष के महाराज के आश्रम में सैकड़ों साधु-संत रुकते हैं और अलग-अलग टेंट लगाकर रहते हैं। महाराज बताते हैं कि रविवार से भंडारा शुरू हो गया है जो 10 नवंबर तक चलेगा। इस दौरान लगभग एक लाख आदमी यहां आकर प्रसाद ग्रहण करता है। अनाज आदि की व्यवस्था उनके शिष्यों और भक्तों द्वारा की जाती है।

अपने टेंट में चिलम फूंकते तंगौर (हरियाणा) से आए प्रमोद गिरी महाराज। संवाद- फोटो : BADAUN