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गंगाघाट पर आस्था की डुबकी लगाकर की पूजा, पितर विदा किए देवलोक
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कछला गंगाघाट पर पितरों को जलदान करते श्रद्धालु।
- फोटो : BADAUN
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उझानी (बदायूं)। पितृ विसर्जन अमावस्या पर बृहस्पतिवार को कछला गंगाघाट आस्था से सराबोर हो उठा। दो सितंबर से शुरू पितृपक्ष के अंतिम दिन इसलिए भी खास रहा कि भगवान विष्णु को प्रिय दिन बृहस्पतिवार को ही पितरों की विदाई के लिए उनके अपनों ने पहले आस्था की डुबकी लगाई फिर जलदान किया। पूजा-अर्चना के बाद पितरों के सम्मान में ब्राह्मणों और संत-महात्माओं को भोजन कराया गया। इसके लिए गंगाघाट पर शाम तक धार्मिक कार्यक्रम चलते रहे।
पितृपक्ष पूर्णिमा के दिन से श्राद्ध करने की धार्मिक मान्यता है। अधिकतर लोग इसकी शुरुआत पूर्णिमा वाले दिन आस्था की डुबकी लगाने के बाद जलदान से करते हैं। इसके बाद पितरों की निश्चित तिथि पर श्राद्ध किए जाते हैं। पितृ विसर्जन अमावस्या पर बृहस्पतिवार सुबह से कछला गंगाघाट पर श्रद्धालुओं के पहुंचने को जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अपराह्न तक चला। बदायूं जिला ही नहीं बल्कि आसपास के जिले कासगंज, बरेली, हाथरस, एटा और राजस्थान से भी पितरों के लिए जलदान करने को लोग पहुंचे। घाट पर हर-हर गंगे की गूंज के साथ ही पितरों को जलदान किया गया। धार्मिक रीति रिवाज के जानकारों में कछला के बाबा हरीओम दास शास्त्री कहते हैं कि अमावस्या पर पितरों को जलदान और ब्राह्मणों को भोजन कराना खास महत्व रखता है। अपने के सम्मान और उनके प्रति आस्था से खुश पितर जब अमावस्या वाले दिन देवलोक विदा होते हैं। उनके अपनों को फल-फूलने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। खासकर बृहस्पतिवार के दिन अमावस्या पड़े तो वह विशेष पुण्य अर्जित करने वाला होता। इसके बाद पूरे साल पितरों की आत्मा तृप्त रहती है।
आश्रम और धर्मशालाओं में भी जुटे श्रद्धालु, हवन में गूंजे मंत्र
उझानी पितृ अमावस्या पर कछला गंगाघाट पर पहुंचे श्रद्धालुओं ने घाट के आसपास के आश्रमों और धर्मशालाओं में धार्मिक अनुष्ठान कराए। पितरों को तृप्त करने के लिए हवन-पूजन भी किया गया। आश्रमों में संतों को भोज कराने के बाद उन्हें दक्षिणा तो किसी ने अंगवस्त्र भेंट किए। घाट के पास स्थित वृद्धा आश्रम में बुजुर्ग महिला और पुरुषों को भोजन कराया गया। श्रद्धालु कुष्ठ आश्रम भी पहुंचे। कुष्ठ आश्रम में मौजूद लोगों को खाद्य सामग्री भेंट की गई।
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पितृपक्ष पूर्णिमा के दिन से श्राद्ध करने की धार्मिक मान्यता है। अधिकतर लोग इसकी शुरुआत पूर्णिमा वाले दिन आस्था की डुबकी लगाने के बाद जलदान से करते हैं। इसके बाद पितरों की निश्चित तिथि पर श्राद्ध किए जाते हैं। पितृ विसर्जन अमावस्या पर बृहस्पतिवार सुबह से कछला गंगाघाट पर श्रद्धालुओं के पहुंचने को जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अपराह्न तक चला। बदायूं जिला ही नहीं बल्कि आसपास के जिले कासगंज, बरेली, हाथरस, एटा और राजस्थान से भी पितरों के लिए जलदान करने को लोग पहुंचे। घाट पर हर-हर गंगे की गूंज के साथ ही पितरों को जलदान किया गया। धार्मिक रीति रिवाज के जानकारों में कछला के बाबा हरीओम दास शास्त्री कहते हैं कि अमावस्या पर पितरों को जलदान और ब्राह्मणों को भोजन कराना खास महत्व रखता है। अपने के सम्मान और उनके प्रति आस्था से खुश पितर जब अमावस्या वाले दिन देवलोक विदा होते हैं। उनके अपनों को फल-फूलने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। खासकर बृहस्पतिवार के दिन अमावस्या पड़े तो वह विशेष पुण्य अर्जित करने वाला होता। इसके बाद पूरे साल पितरों की आत्मा तृप्त रहती है।
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आश्रम और धर्मशालाओं में भी जुटे श्रद्धालु, हवन में गूंजे मंत्र
उझानी पितृ अमावस्या पर कछला गंगाघाट पर पहुंचे श्रद्धालुओं ने घाट के आसपास के आश्रमों और धर्मशालाओं में धार्मिक अनुष्ठान कराए। पितरों को तृप्त करने के लिए हवन-पूजन भी किया गया। आश्रमों में संतों को भोज कराने के बाद उन्हें दक्षिणा तो किसी ने अंगवस्त्र भेंट किए। घाट के पास स्थित वृद्धा आश्रम में बुजुर्ग महिला और पुरुषों को भोजन कराया गया। श्रद्धालु कुष्ठ आश्रम भी पहुंचे। कुष्ठ आश्रम में मौजूद लोगों को खाद्य सामग्री भेंट की गई।
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