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Budaun News: इत्तफाक... अदालत में पहली सुनवाई से चार दिन पहले ही जयंती को मां के साथ उतारा मौत के घाट
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बिसौली न्यायालय तहसीलदार के आदेश की प्रतिलिपि के विवरण में जयंती को दर्शाया गया था मृत।
बदायूं। इसे इत्तफाक कहेंगे या दोहरे हत्याकांड की सोची समझी साजिश कि अदालत में पहली सुनवाई होने से चार दिन पहले ही जयंती व उनकी मां शांति की नृशंस हत्या कर दी गई। आरोप पुलिस के दावे के तहत मौसेरे भाई विपिन पर ही है, जबकि जयंती को अपनी जान का खतरा तीन जेठ, भू-माफिया और उसके गुर्गो से था। सवाल उठता है कि अगर जयंती ने अपनी मर्जी से भू-माफिया के समक्ष जमीन का बैनामा किया था तो उसने एक महीने के अंदर ही उस जमीन के दाखिला खारिज नहीं होने के लिए न्यायालय में आपत्ति क्यों दर्ज करा दी थी। इस आपत्ति की पहली सुनवाई बिसौली नायब तहसीलदार न्यायालय में 18 अगस्त नियत थी, लेकिन 14 अगस्त की रात ही जयंती को मां साथ मौत के घाट उतार दिया गया।
14 अगस्त की देर रात दातागंज कोतवाली क्षेत्र के गांव वीरमपुर निवासी जयंती और उनकी मां शांति देवी की हुई नृशंस हत्याकांड के मामले में हर रोज चौकाने वाले नए तथ्य सामने आ रहे हैं। सब तथ्यों का केंद्र बिंदु कीमती जमीन और भू-माफिया से जुड़ा ही निकल रहा है।
जयंती की ससुराल वजीरंगज थानाक्षेत्र के गांव रोटा में थी। उनके पति गजेंद्र की एक हादसे में मौत हो गई थी। इसके बाद से ही जयंती को संपत्ति से बेदखल करने की प्रक्रिया उसके तीनों जेठों ने शुरू कर दी थी। जेठ प्रदीप सिंह ने 26 दिसंबर 2024 को बिसौली न्यायालय में एक वाद दायर किया था, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया था।
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इसमें प्रदीप सिंह ने बताया कि वह वादग्रस्त भूमि पर काबिज व मालिक है। उनकी विपक्षी जयंती का उनके स्व. भाई गजेंद्र से कोई संबंध नहीं है, लेकिन जयंती वादग्रस्त जमीन को बेचने का प्रयास कर रही हैं। इससे वादग्रस्त जमीन उनके नाम अंकित कर दी जाए। इससे जमीन प्रदीप सिंह व उनके भाइयों के नाम दर्ज हो गई। जानकारी होने पर जयंती ने अप्रैल में वाद दायर किया।
उन्होंने न्यायालय में गजेंद्र की पत्नी होने के साक्ष्य दिए। इसके बाद न्यायालय ने वह जमीन जयंती के नाम दर्ज कर दी। इससे जयंती के ससुराल पक्ष के लोग बौखला गए। उन्होंने भू-माफिया व संजीव सिंह नाम के लोगों से संपंर्क किया। भू-माफिया व संजीव सिहं ने अपने गुर्गों के साथ जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया। इससे जयंती परेशान हो गई। उसने पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उसकी सुनवाई नहीं हुई। इसके चलते उसने सात बीघा जमीन का बैनामा संजीव सिंह व सोमवती के नाम कर दिया।
इसका सौदा औने पौने दाम 46.50 लाख रुपये में किया था, जबकि हाईवे पर जमीन होने के चलते उसकी कीमत डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक थी। जयंती को भू-माफिया ने महज 28.50 लाख रुपये दिए थे।
18 लाख नहीं मिलने पर दाखिल-खारिज पर लगाई आपत्ति
जयंती को सात बीघा के तय हुए 46.50 लाख रुपये में से भी पूरे नहीं दिए गए थे। उन्हें महज 28.50 लाख रुपये दिए गए थे। शेष 18 लाख रुपये दस दिन के अंतराल में देना तय हुआ था, लेकिन भू-माफिया और संजीव सिंह शेष रुपये नहीं दे रहे थे। तब जयंती ने अगस्त में जमीन के दाखिल-खारिज पर आपत्ति जताते हुए बिसौली नायब तहसीलदार न्यायालय में वाद दायर किया था।
जयंती ने 15 जुलाई 2025 को दो प्रार्थनापत्र बिसौली नायब तहसीलदार न्यायालय में को सौंपे थे। उन्होंने पहले प्रार्थना पत्र में सोमवती के नाम पर बैनामा के दाखिल-खारिज पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने तर्क दिया था कि 17 जून 2025 को हुए बैनामे गलत हुए हैं, क्योंकि पत्रावली का अवलोकन नहीं किया गया है।
इससे बैनामे का दाखिल-खारिज नहीं किया जाए। दूसरे प्रार्थना पत्र में संजीव कुमार के नाम हुए बैनामे पर भी आपत्ति लगाई गई थी। इसमें भी दाखिल-खारिज नहीं होने की गुहार लगाई थी। न्यायालय ने दोनों प्रार्थना पत्र स्वीकार किए थे। 26 जुलाई को न्यायालय ने पत्रावली का अवलोकन किया था। इसके बाद न्यायालय में सुनवाई की 18 अगस्त की पहली तारीख नियत की गई थी, लेकिन सुनवाई से चार दिन पहले ही जयंती और उसकी मां की नृशंस हत्या ने पुलिस के खुलासे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस नृशंस हत्याकांड में कई अनसुलझे सवाल हैं, जिनके जवाब फिलहाल पुलिस के पास नहीं है।
अभिलेखों में पहले मृत फिर काल्पनिक दर्शाकर हड़प ली थी जमीन
जयंती की जमीन हड़पने के लिए भू-माफिया व मुकदमे में नामजद संजीव सिंह, पिंकूू सिंह और उसके तीनों जेठ प्रदीप सिंह, सुरेंद्र सिंह व कव्वाली किसी भी हद तक सकते थे। अगर पुलिस ठीक से जांच करे तो दोहरे हत्याकांड की परतें खुल सकती हैं या इनकी संलिप्ता तय हो सकती है। प्रदीप सिंह ने संपत्ति हड़पने के लिए जो दस्तावेज न्यायालय में दिए थे उसके आधार पर जयंती को मृत दर्शाया गया था। जब जयंती ने खुद को जिंदा दिखाया तो फिर अभियुक्तों ने उसे काल्पनिक दर्शा दिया। आखिरकार वही हुआ जो अभियुक्त चाहते थे। जयंती को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
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14 अगस्त की देर रात दातागंज कोतवाली क्षेत्र के गांव वीरमपुर निवासी जयंती और उनकी मां शांति देवी की हुई नृशंस हत्याकांड के मामले में हर रोज चौकाने वाले नए तथ्य सामने आ रहे हैं। सब तथ्यों का केंद्र बिंदु कीमती जमीन और भू-माफिया से जुड़ा ही निकल रहा है।
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जयंती की ससुराल वजीरंगज थानाक्षेत्र के गांव रोटा में थी। उनके पति गजेंद्र की एक हादसे में मौत हो गई थी। इसके बाद से ही जयंती को संपत्ति से बेदखल करने की प्रक्रिया उसके तीनों जेठों ने शुरू कर दी थी। जेठ प्रदीप सिंह ने 26 दिसंबर 2024 को बिसौली न्यायालय में एक वाद दायर किया था, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया था।
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इसमें प्रदीप सिंह ने बताया कि वह वादग्रस्त भूमि पर काबिज व मालिक है। उनकी विपक्षी जयंती का उनके स्व. भाई गजेंद्र से कोई संबंध नहीं है, लेकिन जयंती वादग्रस्त जमीन को बेचने का प्रयास कर रही हैं। इससे वादग्रस्त जमीन उनके नाम अंकित कर दी जाए। इससे जमीन प्रदीप सिंह व उनके भाइयों के नाम दर्ज हो गई। जानकारी होने पर जयंती ने अप्रैल में वाद दायर किया।
उन्होंने न्यायालय में गजेंद्र की पत्नी होने के साक्ष्य दिए। इसके बाद न्यायालय ने वह जमीन जयंती के नाम दर्ज कर दी। इससे जयंती के ससुराल पक्ष के लोग बौखला गए। उन्होंने भू-माफिया व संजीव सिंह नाम के लोगों से संपंर्क किया। भू-माफिया व संजीव सिहं ने अपने गुर्गों के साथ जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया। इससे जयंती परेशान हो गई। उसने पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उसकी सुनवाई नहीं हुई। इसके चलते उसने सात बीघा जमीन का बैनामा संजीव सिंह व सोमवती के नाम कर दिया।
इसका सौदा औने पौने दाम 46.50 लाख रुपये में किया था, जबकि हाईवे पर जमीन होने के चलते उसकी कीमत डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक थी। जयंती को भू-माफिया ने महज 28.50 लाख रुपये दिए थे।
18 लाख नहीं मिलने पर दाखिल-खारिज पर लगाई आपत्ति
जयंती को सात बीघा के तय हुए 46.50 लाख रुपये में से भी पूरे नहीं दिए गए थे। उन्हें महज 28.50 लाख रुपये दिए गए थे। शेष 18 लाख रुपये दस दिन के अंतराल में देना तय हुआ था, लेकिन भू-माफिया और संजीव सिंह शेष रुपये नहीं दे रहे थे। तब जयंती ने अगस्त में जमीन के दाखिल-खारिज पर आपत्ति जताते हुए बिसौली नायब तहसीलदार न्यायालय में वाद दायर किया था।
जयंती ने 15 जुलाई 2025 को दो प्रार्थनापत्र बिसौली नायब तहसीलदार न्यायालय में को सौंपे थे। उन्होंने पहले प्रार्थना पत्र में सोमवती के नाम पर बैनामा के दाखिल-खारिज पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने तर्क दिया था कि 17 जून 2025 को हुए बैनामे गलत हुए हैं, क्योंकि पत्रावली का अवलोकन नहीं किया गया है।
इससे बैनामे का दाखिल-खारिज नहीं किया जाए। दूसरे प्रार्थना पत्र में संजीव कुमार के नाम हुए बैनामे पर भी आपत्ति लगाई गई थी। इसमें भी दाखिल-खारिज नहीं होने की गुहार लगाई थी। न्यायालय ने दोनों प्रार्थना पत्र स्वीकार किए थे। 26 जुलाई को न्यायालय ने पत्रावली का अवलोकन किया था। इसके बाद न्यायालय में सुनवाई की 18 अगस्त की पहली तारीख नियत की गई थी, लेकिन सुनवाई से चार दिन पहले ही जयंती और उसकी मां की नृशंस हत्या ने पुलिस के खुलासे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस नृशंस हत्याकांड में कई अनसुलझे सवाल हैं, जिनके जवाब फिलहाल पुलिस के पास नहीं है।
अभिलेखों में पहले मृत फिर काल्पनिक दर्शाकर हड़प ली थी जमीन
जयंती की जमीन हड़पने के लिए भू-माफिया व मुकदमे में नामजद संजीव सिंह, पिंकूू सिंह और उसके तीनों जेठ प्रदीप सिंह, सुरेंद्र सिंह व कव्वाली किसी भी हद तक सकते थे। अगर पुलिस ठीक से जांच करे तो दोहरे हत्याकांड की परतें खुल सकती हैं या इनकी संलिप्ता तय हो सकती है। प्रदीप सिंह ने संपत्ति हड़पने के लिए जो दस्तावेज न्यायालय में दिए थे उसके आधार पर जयंती को मृत दर्शाया गया था। जब जयंती ने खुद को जिंदा दिखाया तो फिर अभियुक्तों ने उसे काल्पनिक दर्शा दिया। आखिरकार वही हुआ जो अभियुक्त चाहते थे। जयंती को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।