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सदन में अब दमदारी से नहीं गूंजती बिनावर की आवाज

Thu, 20 Jan 2022 01:42 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 20 Jan 2022 01:42 AM IST
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Binawar's voice no longer resonates strongly in the housebadaun 145 vidhan sabha 2022, bisauli 142 vidhan sabha 2022, sahaswan 143 vidhan sabha 2022, bilsi 144 vidhan sabha 2022, shekhupur 146 vidhan sabha 2022, dataganj 147 vidhan sabha 2022
बिनावर थाना। संवाद - फोटो : BADAUN
बदायूं। बिनावर विधानसभा सीट खत्म होने के बाद जिले के कई असरदार नेताओं की राजनीतिक जमीन ही खिसक गई। इनको इलाके और पार्टियां बदलनी पड़ीं, लेकिन विधानसभा नहीं पहुंच सके। बिनावर विधानसभा क्षेत्र खत्म होने के बाद अब सदन में सीधे तौर पर यहां से चुने जनप्रतिनिधि की आवाज भी नहीं गूंजती।
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बिनावर विधानसभा सीट पर पहला चुनाव 1952 में हुआ था। यहां से गुलड़िया निवासी मुंशी टीकाराम पहले विधायक चुने गए। 1989 तक कांग्रेस का कब्जा रहा। 1985 में कांग्रेस के अकबर अहमद आखिरी बार चुनाव जीते। वर्ष 1989 में पहली बार भाजपा के टिकट पर रामसेवक सिंह पटेल यहां से विधायक चुुने गए। कुर्मी बाहुल्य बिनावर विधानसभा सीट पर वह लगातार चार बार भाजपा से ही चुनाव जीतते रहे। इस बीच 2002 में बसपा के भूपेंद्र सिंह कुर्मी उर्फ भूपेंद्र दद्दा ने चुनाव जीता। वर्ष 2007 में एक बार फिर रामसेवक बिनावर के विधायक बने। वर्ष 2012 का चुनाव आते-आते बिनावर विधानसभा क्षेत्र समाप्त कर दिया गया और इसका शहर विधानसभा क्षेत्र में विलय हो गया।
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रामसेवक सिंह के रहते कई बार स्थानीय मुद्दे विधानसभा में गूंजे और उन पर काम हुआ। भूपेंद्र सिंह कुर्मी भी पहली बार जब यहां से विधायक बने तो प्रदेश की मायावती सरकार में उनको राज्यमंत्री भी बनाया गया। तब उन्होंने भी बिनावर की आवाज सदन में बुलंद की। बिनावर विधानसभा क्षेत्र का अस्तित्व खत्म होने पर यहां की आवाज भी सदन में दब सी गई। साथ ही इस इलाके के दूसरे असरदार नेताओं की भी राजनीतिक जमीन खिसकती रही। स्थानीय राजनीति के बड़े नेताओं में शुमार उमेश राठौर को पार्टियां बदलनी पड़ीं। हालांकि अब वह काफी समय से भाजपा में हैं और जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन हैं। इसी तरह इलाके के सक्रिय नेताओं में शुमार हरप्रसाद सिंह पटेल, सुरेश चौहान व खालिद परवेज की राजनीति पर भी व्यापक असर पड़ा।
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यह बोले बिनावर के बुजुर्ग
बिनावर विधानसभा क्षेत्र रहते ही यहां सीएचसी बनी, थाने की स्थापना हुई। काफी विकास कार्य हुए। बिनावर को ब्लॉक का दर्जा मिलना शेष था। बिनावर विधानसभा सीट ही खत्म हो गई है। ऐसे में अब ज्यादा विकास की उम्मीद नहीं की जा सकती।
-हरचरण शर्मा
बिनावर विधानसभा से जुड़ा बड़ा इलाका देहाती परिवेश से जुड़ा था। विधानसभा क्षेत्र रहते यहां काफी विकास भी हुआ, लेकिन लोगों की कई मांगें अब भी अधूरी हैं। अब बिनावर विधानसभा ही अस्तित्व में नहीं है। ऐसे में विधानसभा में यहां की बात भी दमदार ढंग से नहीं पहुंच पा रहीं।
-हरीश चंद्र सक्सेना
2007 के विधानसभा चुनाव तक बिनावर राजनीति का केंद्र रहता था। बिनावर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता शहर और दातागंज विधानसभा सीट को भी प्रभावित करते थे। बिनावर विधानसभा सीट पर कुर्मी बिरादरी का एक मुश्त वोट बैंक था। विधानसभा खत्म होने के बाद यह वोट बैंक शहर, दातागंज, बिल्सी क्षेत्र में बंट गया।
-मुंशी लाल शर्मा
बिनावर विधानसभा सीट रहने तक राजनीति में कुर्मी बिरादरी का दबदबा रहा। 2012 में नया परिसीमन लागू होने के बाद बिनावर विधानसभा सीट खत्म हो गई। इसके साथ ही कुर्मी बिरादरी का जिले की राजनीति में दबदबा भी पहले से कम हुआ। हालांकि जातीय आधार की राजनीति समाज का नुकसान ही करती है। आज सभी दल जातिवाद की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं जो गलत है।

-रविंद्र सिंह चौहान
हम करा रहे हैं बिनावर में काम
बिनावर विधानसभा क्षेत्र भले ही खत्म हो गया है पर सदर विधायक के तौर पर हम वहां पर्याप्त काम कराते रहते हैं। राजा वैन के किले के अवशेष का जीर्णोद्धार मुख्यमंत्री की विशेष योजना से 47 लाख रुपये से कराया गया है। साथ ही 12 करोड़ से अन्य विकास कार्य कराए हैं।
- महेश चंद्र गुप्ता, नगर विकास राज्यमंत्री
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