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भूदान आंदोलन तक जुटे रहे निरंजन लाल
बदायूं/दातागंज।
Updated Tue, 15 Aug 2017 12:10 AM IST
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जमींदार पंडित निरंजन लाल को बार-बार जेल भेजते रहे अंग्रेज
1941 में सत्याग्रह में कूदे तो बंदूक का लाइसेंस निरस्त कर दिया
तहसील दातागंज के गांव गंडहा के रहने वाले पंडित निरंजन लाल बड़े जमींदार थे। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आचार्य विनोबा भावे के भूदान में भी उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 1941 में जब वह अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी के सत्याग्रह अंदोलन में कूदे तो अंग्रेज हुकूमत ने उनके पिता की बंदूक का लाइसेंस निरस्त कर दिया। पंडित निरंजन लाल को कई बार गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। उनको यातनाएं दी गईं, लेकिन वह नहीं डिगे।
अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए हर वर्ग, धर्म और जातियों के लोग जुटे रहे। पंडित निरंजन लाल भी महात्मा गांधी से प्रभावित थे। सत्याग्रह आंदोलन के दौरान अंग्रेज हुकूमत ने पंडित निरंजन को लाल को 1941 में पहली बार गिरफ्तार कर जेल भेजा। उन पर 800 रुपये जो उस समय का सबसे बड़ा जुर्माना था डाला गया। इसके बाद भी वह पीछे नहीं हटे। चूंकि निरंजन लाल संपन्न परिवार के थे। इसलिए वह क्रांतिकारियों की कई जरूरतों को भी पूरा करते थे। उनको रसद, धन आदि उपलब्ध कराते थे। 1947 में देश की आजादी के बाद 14 अप्रैल 1951 में भूदान आंदोलन शुरू किया। पंडित निरंजन लाल ने इसमें भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। उन्होंने अपनी काफी जमीन दान कर दी। पंडित निरंजन लाल का बसाया हुआ निरंजन नगला गांव आज भी दातागंज तहसील में है। स्वतंत्रता के बाद पंडित निरंजन लाल ने अपने गांव गंडहा में अपनी जमीन पर और अपने ही धन से प्राथमिक विद्यालय, जूनियर हाई स्कूल, अस्पताल का भी निर्माण कराया। यह भवन आज भी गंडहा में हैं। 1964 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी निरंजन लाल का निधन हो गया।
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मुुंसिफ पद से इस्तीफा देकर आंदोलन में कूदे रुकुम सिंह
बदायूं। नगला शर्की के केहरी सिंह जमींदार थे। उनके बेटे कुंवर रुकुम सिंह 1920 में आनरेरी मुंसिफ पद से इस्तीफा देकर महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। 1921 में उनको पहली बार जेल भेजा गया। 1930 में नमक आंदोलन में भी उनका अहम सहयोग रहा। 1942 में अंग्रेजों ने उनको नजरबंद कर दिया।
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1941 में सत्याग्रह में कूदे तो बंदूक का लाइसेंस निरस्त कर दिया
तहसील दातागंज के गांव गंडहा के रहने वाले पंडित निरंजन लाल बड़े जमींदार थे। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आचार्य विनोबा भावे के भूदान में भी उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 1941 में जब वह अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी के सत्याग्रह अंदोलन में कूदे तो अंग्रेज हुकूमत ने उनके पिता की बंदूक का लाइसेंस निरस्त कर दिया। पंडित निरंजन लाल को कई बार गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। उनको यातनाएं दी गईं, लेकिन वह नहीं डिगे।
अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए हर वर्ग, धर्म और जातियों के लोग जुटे रहे। पंडित निरंजन लाल भी महात्मा गांधी से प्रभावित थे। सत्याग्रह आंदोलन के दौरान अंग्रेज हुकूमत ने पंडित निरंजन को लाल को 1941 में पहली बार गिरफ्तार कर जेल भेजा। उन पर 800 रुपये जो उस समय का सबसे बड़ा जुर्माना था डाला गया। इसके बाद भी वह पीछे नहीं हटे। चूंकि निरंजन लाल संपन्न परिवार के थे। इसलिए वह क्रांतिकारियों की कई जरूरतों को भी पूरा करते थे। उनको रसद, धन आदि उपलब्ध कराते थे। 1947 में देश की आजादी के बाद 14 अप्रैल 1951 में भूदान आंदोलन शुरू किया। पंडित निरंजन लाल ने इसमें भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। उन्होंने अपनी काफी जमीन दान कर दी। पंडित निरंजन लाल का बसाया हुआ निरंजन नगला गांव आज भी दातागंज तहसील में है। स्वतंत्रता के बाद पंडित निरंजन लाल ने अपने गांव गंडहा में अपनी जमीन पर और अपने ही धन से प्राथमिक विद्यालय, जूनियर हाई स्कूल, अस्पताल का भी निर्माण कराया। यह भवन आज भी गंडहा में हैं। 1964 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी निरंजन लाल का निधन हो गया।
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मुुंसिफ पद से इस्तीफा देकर आंदोलन में कूदे रुकुम सिंह
बदायूं। नगला शर्की के केहरी सिंह जमींदार थे। उनके बेटे कुंवर रुकुम सिंह 1920 में आनरेरी मुंसिफ पद से इस्तीफा देकर महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। 1921 में उनको पहली बार जेल भेजा गया। 1930 में नमक आंदोलन में भी उनका अहम सहयोग रहा। 1942 में अंग्रेजों ने उनको नजरबंद कर दिया।
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