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जिला कारागार में बंदी रक्षकों का टोटा, नहीं होगी खेती
Updated Sun, 29 Jul 2018 12:00 AM IST
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बंदी रक्षकों का टोटा, नहीं होगी खेती
जेल प्रशासन ने खेती के लिए लिखा था पत्र, बंदियों को दिया गया था प्रशिक्षण
अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। जेल प्रशासन ने अपने खेतों में फसल उगाने के लिए सारे प्रयत्न कर लिए। यहां तक की उच्चाधिकारियों से अनुमति को एक पत्र भी लिखा। कई बार बंदियों को खेती के संबंध में प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें खेती करने के नए-नए तरीके बताए गए। परंतु मामला बंदी रक्षकों की संख्या पर अटक गया। बंदी रक्षकों की इतनी संख्या नहीं है, जिससे जेल की खेती हो सके और वह बंदियों की रखवाली कर सकें।
करीब आठ-दस साल पहले जिला जेल प्रशासन के पास खेती करने के सभी साधन थे। एक जोड़ी ताकतवर बैल थे। बंदी सूती कपड़े पहने खुरपी, फावड़ा लेकर खेत में करते दिखाई देते थे। वहीं बंदी रक्षक सुरक्षा में खेत की मेड़ पर खड़े दिखाई देते थे। खेत की जुताई, निराई, गुड़ाई के सभी साधन थे। सिंचाई के लिए सिविल लाइंस थाना के सामने एक ट्यूबवेल बना हुआ है। जो आजकल खराब पड़ा है। यहां से हर खेत में पानी जाने के लिए पक्की गूज बनी थीं, जो टूटकर बिखर चुकी हैं। कई जगह तो पक्की गूल का नामोनिशान तक मिट गया है। पोस्टमार्टम हाउस के बराबर में करीब 10-12 बीघा जेल का खेत है। आज इन खेतों की स्थिति ही कुछ और है। कहीं बड़ी-बड़ी घास उग आई है तो कहीं नगर पालिका प्रशासन ने खेत को डलावघर बना दिया है। कॉलोनी का पूरा गंदा पानी जेल के खेत में जाता है, जिससे खेत में बड़ा गड्ढा हो गया है। यहां पूरे दिन जंगली जानवर लोटते रहते हैं।
इन खेतों को दोबारा उपजाऊ बनाने के लिए जेल प्रशासन ने कुछ दिन पहले योजना बनाई थी। खेती कराने के लिए जेल प्रशासन ने उच्चाधिकारियों से अनुमति भी मांगी थी। दो बार लगातार बंदियों को खेती करने के तरीके सिखाए गए। उन्हें सब्जी उगाने से लेकर गेहूं, धान की पैदावार बढ़ाने के संबंध में बताया गया परंतु जेल में तैनात बंदी रक्षकों की संख्या कम होने से खेती कराने की योजना विफल हो गई। जेल में करीब एक दर्जन बंदी रक्षक तैनात हैं। ऐसे में वह अंदर ड्यूटी करें या खेती कराएं।
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बरेली जेल से आती है सब्जी
जिला कारागार में कुछ खाली जगह पड़ी है। फूल, मूली और पालक उगाए जा रहे हैं। परंतु इससे बंदियों का भोजन पर्याप्त नहीं होता। बाकी इंतजाम बरेली जेल से होता है। वहीं गाड़ी से सब्जी मंगाई जाती है।
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जो बंदी जेल में काम कर रहे हैं। उन्हें पैसा भी मिल रहा है। खेती कराने के लिए हमने कुछ दिन पहले उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा था। बंदियों को खेती का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। अब बंदी रक्षकों की संख्या बढ़े, तो खेती कराई जाए। पहले तो इनकी संख्या बढ़ना ही मुश्किल लग रहा है।
-कैलाशपति त्रिपाठी, जेल अधीक्षक
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डिप्टी जेलर ने संभाला चार्ज
बदायूं। जिला कारागार से 12 मई को बंदी सुमित के फरार होने के बाद शासन ने यहां के अधिकारियों में फेरबदल किया था। इनमें जेलर पीएस शुक्ला गोरखपुर ट्रांसफर हुए थे। जबकि डिप्टी जेलर सुनील कुुमार बस्ती ट्रांसफर हुए। करीब 20 दिन बाद यहां ट्रांसफर हुए जेलर ने जिला कारागार का चार्ज संभाला और उनके बाद पीएस शुक्ला रिलीव हो सके। डिप्टी जेलर को ट्रांसफर हुए करीब दो माह हो चुके हैं लेकिन अब तक वह रिलीव नहीं हो सके। उनके स्थान पर मेरठ से ट्रांसफर होकर आए रतन कुमार ने चार्ज संभाल लिया है। बिजनौर से ट्रांसफर हुए डिप्टी जेलर वेदप्रकाश ने अभी चार्ज नहीं संभाला है।
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बंदी रक्षकों का टोटा, नहीं होगी खेती
जेल प्रशासन ने खेती के लिए लिखा था पत्र, बंदियों को दिया गया था प्रशिक्षण
अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। जेल प्रशासन ने अपने खेतों में फसल उगाने के लिए सारे प्रयत्न कर लिए। यहां तक की उच्चाधिकारियों से अनुमति को एक पत्र भी लिखा। कई बार बंदियों को खेती के संबंध में प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें खेती करने के नए-नए तरीके बताए गए। परंतु मामला बंदी रक्षकों की संख्या पर अटक गया। बंदी रक्षकों की इतनी संख्या नहीं है, जिससे जेल की खेती हो सके और वह बंदियों की रखवाली कर सकें।
करीब आठ-दस साल पहले जिला जेल प्रशासन के पास खेती करने के सभी साधन थे। एक जोड़ी ताकतवर बैल थे। बंदी सूती कपड़े पहने खुरपी, फावड़ा लेकर खेत में करते दिखाई देते थे। वहीं बंदी रक्षक सुरक्षा में खेत की मेड़ पर खड़े दिखाई देते थे। खेत की जुताई, निराई, गुड़ाई के सभी साधन थे। सिंचाई के लिए सिविल लाइंस थाना के सामने एक ट्यूबवेल बना हुआ है। जो आजकल खराब पड़ा है। यहां से हर खेत में पानी जाने के लिए पक्की गूज बनी थीं, जो टूटकर बिखर चुकी हैं। कई जगह तो पक्की गूल का नामोनिशान तक मिट गया है। पोस्टमार्टम हाउस के बराबर में करीब 10-12 बीघा जेल का खेत है। आज इन खेतों की स्थिति ही कुछ और है। कहीं बड़ी-बड़ी घास उग आई है तो कहीं नगर पालिका प्रशासन ने खेत को डलावघर बना दिया है। कॉलोनी का पूरा गंदा पानी जेल के खेत में जाता है, जिससे खेत में बड़ा गड्ढा हो गया है। यहां पूरे दिन जंगली जानवर लोटते रहते हैं।
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इन खेतों को दोबारा उपजाऊ बनाने के लिए जेल प्रशासन ने कुछ दिन पहले योजना बनाई थी। खेती कराने के लिए जेल प्रशासन ने उच्चाधिकारियों से अनुमति भी मांगी थी। दो बार लगातार बंदियों को खेती करने के तरीके सिखाए गए। उन्हें सब्जी उगाने से लेकर गेहूं, धान की पैदावार बढ़ाने के संबंध में बताया गया परंतु जेल में तैनात बंदी रक्षकों की संख्या कम होने से खेती कराने की योजना विफल हो गई। जेल में करीब एक दर्जन बंदी रक्षक तैनात हैं। ऐसे में वह अंदर ड्यूटी करें या खेती कराएं।
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बरेली जेल से आती है सब्जी
जिला कारागार में कुछ खाली जगह पड़ी है। फूल, मूली और पालक उगाए जा रहे हैं। परंतु इससे बंदियों का भोजन पर्याप्त नहीं होता। बाकी इंतजाम बरेली जेल से होता है। वहीं गाड़ी से सब्जी मंगाई जाती है।
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जो बंदी जेल में काम कर रहे हैं। उन्हें पैसा भी मिल रहा है। खेती कराने के लिए हमने कुछ दिन पहले उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा था। बंदियों को खेती का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। अब बंदी रक्षकों की संख्या बढ़े, तो खेती कराई जाए। पहले तो इनकी संख्या बढ़ना ही मुश्किल लग रहा है।
-कैलाशपति त्रिपाठी, जेल अधीक्षक
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डिप्टी जेलर ने संभाला चार्ज
बदायूं। जिला कारागार से 12 मई को बंदी सुमित के फरार होने के बाद शासन ने यहां के अधिकारियों में फेरबदल किया था। इनमें जेलर पीएस शुक्ला गोरखपुर ट्रांसफर हुए थे। जबकि डिप्टी जेलर सुनील कुुमार बस्ती ट्रांसफर हुए। करीब 20 दिन बाद यहां ट्रांसफर हुए जेलर ने जिला कारागार का चार्ज संभाला और उनके बाद पीएस शुक्ला रिलीव हो सके। डिप्टी जेलर को ट्रांसफर हुए करीब दो माह हो चुके हैं लेकिन अब तक वह रिलीव नहीं हो सके। उनके स्थान पर मेरठ से ट्रांसफर होकर आए रतन कुमार ने चार्ज संभाल लिया है। बिजनौर से ट्रांसफर हुए डिप्टी जेलर वेदप्रकाश ने अभी चार्ज नहीं संभाला है।