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पूस की रातों में ठिठुर रहे मरीज
Updated Mon, 25 Dec 2017 10:39 PM IST
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ठंड के मौसम में खुले में लेटे लोग।
- फोटो : अमर उजाला
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बदायूं। मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ से भी जिला अस्पताल वालों ने कोई सबक नहीं लिया। जिला अस्पताल में भर्ती मरीज कोहरे और शीतलहर के बीच पूस की रातें एक कंबल में गुजार रहे हैं। उनके तीमारदारों के रुकने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। जिला अस्पताल में बने रैन बसेरा पर ताला पड़ा है।
जिला अस्पताल में इमरजेंसी, मेल-फीमेल मेडिसिन, बर्न वार्ड समेत कई वार्डों में इन दिनों भर्ती मरीज ठंड से बेहाल हैं, यहां पर ठंड से बचने के लिए मात्र एक कंबल दिया गया है, लेकिन इस हाड़ कंपाती सर्दी में यह कंबल कितना कारगर है वह तो खुद मरीज व तीमारदार ही बता सकते हैं। ऐसी स्थिति में कुछ मरीज तो घर से कंबल मंगाकर काम चला रहे हैं, लेकिन जो मरीज और तीमारदार रंजाई, कंबल नहीं मंगा सके। वह ऐसी ठंड में ठिठुरने को मजबूर हैं।
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रैन बसेरा में नहीं है बसेरा
जिला अस्पताल में मरीजों के तीमारदारों के रात में ठहरने के लिए कैंपस में रैन बसेरा तो है, लेकिन न तो वहां सोने की व्यवस्था है और न ही किसी स्थिति में तीमारदार रात गुजार सकते हैं। रैन बसेरा का प्रयोग केवल अस्पताल का सामान रखने के लिए होता है।
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घर से लाने पड़ती है रजाई
डीएम रोड निवासी राजीव ने बताया कि उनके पिता रामचंद्र को सांस की दिक्कत है। इस वजह से इन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन यहां पर ठंड से बचाव के लिए नाममात्र को एक कंबल दिया गया है। इससे ठंड नहीं बच पा रही है। ऐसे में घर से रजाई लानी पड़ रही है।
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अपना कंबल ओढ़कर चलाया काम
मूसाझाग निवासी अजीत ने बताया कि उनकी दो साल की बहन की तबीयत खराब है। इस वजह से उसे यहां पर भर्ती कराया गया है। यहां पर एक लाल रंग का कंबल मिला है। जो बेहद ही महीन है। इससे ठंड से बचाव नहीं हो पा रहा है। इस वजह से अपना कंबल ओढ़ना पड़ रहा है।
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जिला अस्पताल में इमरजेंसी, मेल-फीमेल मेडिसिन, बर्न वार्ड समेत कई वार्डों में इन दिनों भर्ती मरीज ठंड से बेहाल हैं, यहां पर ठंड से बचने के लिए मात्र एक कंबल दिया गया है, लेकिन इस हाड़ कंपाती सर्दी में यह कंबल कितना कारगर है वह तो खुद मरीज व तीमारदार ही बता सकते हैं। ऐसी स्थिति में कुछ मरीज तो घर से कंबल मंगाकर काम चला रहे हैं, लेकिन जो मरीज और तीमारदार रंजाई, कंबल नहीं मंगा सके। वह ऐसी ठंड में ठिठुरने को मजबूर हैं।
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रैन बसेरा में नहीं है बसेरा
जिला अस्पताल में मरीजों के तीमारदारों के रात में ठहरने के लिए कैंपस में रैन बसेरा तो है, लेकिन न तो वहां सोने की व्यवस्था है और न ही किसी स्थिति में तीमारदार रात गुजार सकते हैं। रैन बसेरा का प्रयोग केवल अस्पताल का सामान रखने के लिए होता है।
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घर से लाने पड़ती है रजाई
डीएम रोड निवासी राजीव ने बताया कि उनके पिता रामचंद्र को सांस की दिक्कत है। इस वजह से इन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन यहां पर ठंड से बचाव के लिए नाममात्र को एक कंबल दिया गया है। इससे ठंड नहीं बच पा रही है। ऐसे में घर से रजाई लानी पड़ रही है।
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अपना कंबल ओढ़कर चलाया काम
मूसाझाग निवासी अजीत ने बताया कि उनकी दो साल की बहन की तबीयत खराब है। इस वजह से उसे यहां पर भर्ती कराया गया है। यहां पर एक लाल रंग का कंबल मिला है। जो बेहद ही महीन है। इससे ठंड से बचाव नहीं हो पा रहा है। इस वजह से अपना कंबल ओढ़ना पड़ रहा है।