{"_id":"5c20fe27bdec2256fc739574","slug":"11545666087-budaun-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"म्याऊ के पूर्व ब्लॉक प्रमुख की फांसी उम्रकैद में बदली","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
म्याऊ के पूर्व ब्लॉक प्रमुख की फांसी उम्रकैद में बदली
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बदायूं। म्याऊ ब्लॉक परिसर में 13 साल पहले दिनदहाड़े हुए डबल मर्डर के आरोपी पूर्व ब्लॉक प्रमुख पातांजलि भारद्वाज और उनके भाई को सेशन कोर्ट बदायूं से सुनाए गए फांसी की सजा के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उम्रकैद में तब्दील कर दिया है। पूर्व ब्लॉक प्रमुख के भाई की सजा के दौरान जिला कारागार में मौत हो चुकी है।
आठ जनवरी 2005 को सहकारी समिति के चुनाव के नामांकन के दौरान ब्लॉक परिसर में विवाद हो गया था। इसमें पूर्व ब्लॉक प्रमुख रहे पातांजलि भारद्वाज ने दबंगई के बल पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं थीं और अरवेंद्र पुत्र माधवराम व अशोक पुत्र पुत्तूलाल की गोली मारकर हत्या कर दी थी। मृतक आपस में चचेरे-तहेरे भाई थे। वादी माधवराम ने डबल मर्डर में पातांजलि भारद्वाज और उनके भाई वशिष्ठ भारद्वाज पुत्रगण श्यामसुंदर के अलावा पातांजलि के पुत्र राहुल उर्फ मोनू, वरुण उर्फ चीनू और विकास भारद्वाज के खिलाफ हत्या, एससीएसटी एक्ट, बलवा आदि में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
यहां तैनात रहे स्पेशल जज एससीएसटी एक्ट एसएन सिंह ने नौ दिसंबर 2014 को पातांजलि भारद्वाज, वशिष्ठ भारद्वाज, वरुण उर्फ चीनू, राहुल उर्फ मोनू को मुजरिम करार दिया था। पातांजलि और उनके भाई वरिष्ठ को फांसी और बाकी दो को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस चर्चित मामले की पैरवी एडीजीसी रईस अहमद ने की थी। सेशन कोर्ट से फांसी की सजा सुनाए जाने के खिलाफ पातांजलि ने हाईकोर्ट इलाहाबाद में अपील की थी। वादी के अधिवक्ता मुख्तार आलम ने हाईकोर्ट में पैरवी की। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पातांजलि की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया, साथ ही उम्रकैद की सजा पर अपनी मुहर लगा दी। बता दें कि दूसरे मुजरिम वशिष्ठ भारद्वाज की जिला कारागार में सजा के दौरान मौत हो चुकी है।
विज्ञापन
----------
विकास चल रहा था फरार-
दोहरे हत्याकांड के मुजरिम व पूर्व ब्लॉक प्रमुख के बेटे विकास भारद्वाज को कोर्ट ने भगोड़ा घोषित किया था। पत्रावली अलग कर दी थी। बाद में उसके हाजिर होने पर उसे भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
--------
कोर्ट के फैसले से हैं संतुष्ट
वादी माधवराम का कहना है कि हाईकोर्ट ने जो फैसला दिया है उससे वह संतुष्ट हैं। हत्यारे कम से कम पूरी जिंदगी सलाखों के पीछे तो रहेंगे। हां, फांसी की सजा होती तो उन्हें और सुकून मिलता। बोले-दूसरे मुजरिम वशिष्ठ भारद्वाज को तो ऊपर वाले ने ही मौत की सजा दे दी।
विज्ञापन
आठ जनवरी 2005 को सहकारी समिति के चुनाव के नामांकन के दौरान ब्लॉक परिसर में विवाद हो गया था। इसमें पूर्व ब्लॉक प्रमुख रहे पातांजलि भारद्वाज ने दबंगई के बल पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं थीं और अरवेंद्र पुत्र माधवराम व अशोक पुत्र पुत्तूलाल की गोली मारकर हत्या कर दी थी। मृतक आपस में चचेरे-तहेरे भाई थे। वादी माधवराम ने डबल मर्डर में पातांजलि भारद्वाज और उनके भाई वशिष्ठ भारद्वाज पुत्रगण श्यामसुंदर के अलावा पातांजलि के पुत्र राहुल उर्फ मोनू, वरुण उर्फ चीनू और विकास भारद्वाज के खिलाफ हत्या, एससीएसटी एक्ट, बलवा आदि में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
विज्ञापन
यहां तैनात रहे स्पेशल जज एससीएसटी एक्ट एसएन सिंह ने नौ दिसंबर 2014 को पातांजलि भारद्वाज, वशिष्ठ भारद्वाज, वरुण उर्फ चीनू, राहुल उर्फ मोनू को मुजरिम करार दिया था। पातांजलि और उनके भाई वरिष्ठ को फांसी और बाकी दो को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस चर्चित मामले की पैरवी एडीजीसी रईस अहमद ने की थी। सेशन कोर्ट से फांसी की सजा सुनाए जाने के खिलाफ पातांजलि ने हाईकोर्ट इलाहाबाद में अपील की थी। वादी के अधिवक्ता मुख्तार आलम ने हाईकोर्ट में पैरवी की। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पातांजलि की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया, साथ ही उम्रकैद की सजा पर अपनी मुहर लगा दी। बता दें कि दूसरे मुजरिम वशिष्ठ भारद्वाज की जिला कारागार में सजा के दौरान मौत हो चुकी है।
विज्ञापन
----------
विकास चल रहा था फरार-
दोहरे हत्याकांड के मुजरिम व पूर्व ब्लॉक प्रमुख के बेटे विकास भारद्वाज को कोर्ट ने भगोड़ा घोषित किया था। पत्रावली अलग कर दी थी। बाद में उसके हाजिर होने पर उसे भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
--------
कोर्ट के फैसले से हैं संतुष्ट
वादी माधवराम का कहना है कि हाईकोर्ट ने जो फैसला दिया है उससे वह संतुष्ट हैं। हत्यारे कम से कम पूरी जिंदगी सलाखों के पीछे तो रहेंगे। हां, फांसी की सजा होती तो उन्हें और सुकून मिलता। बोले-दूसरे मुजरिम वशिष्ठ भारद्वाज को तो ऊपर वाले ने ही मौत की सजा दे दी।