{"_id":"61d7327968931e13605bf1c0","slug":"villages-across-the-ganges-broken-roads-and-immense-problems-bijnor-news-mrt572415397","type":"story","status":"publish","title_hn":"गंगा के पार गांव, टूटी हैं सड़कें और समस्याएं अपार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गंगा के पार गांव, टूटी हैं सड़कें और समस्याएं अपार
विज्ञापन
शहर से इलाज कराबर वापस गांव हिम्मतपुर बेला लौटे मां और बेटा जीत सिंह।
- फोटो : BIJNOR
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गंगा के पार गांव, टूटी हैं सड़कें और समस्याएं अपार
आशीष तोमर
मंडावर। जो उलझकर रह गई फाइलों के जाल में, गांव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में...जनकवि अदम गौंडवी की ये लाइनें यदि गंगा की धारा के उस पार बसे हिम्मतपुर बेला गांव के ऊपर कही जाएं तो सटीक साबित होंगी। मंडावर क्षेत्र का यह गांव कहने को बिजनौर जिले का हिस्सा है, लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी सड़क, शिक्षा और बिजली के लिए तरस रहा है। आज भी इस गांव में कच्ची पगडंडियों से होकर जाना पड़ता है। कोई बीमार पड़ जाए तो उसके इलाज के लिए शहर के पास किराये पर मकान लेना पड़ता है। तमाम चुनाव आए और ग्रामीणों से वादे हुए, लेकिन आज तक यह गांव यूपी और उत्तराखंड के दोआब में दबा हुआ है।
थाना मंडावर खादर क्षेत्र की ग्राम पंचायत टीप का एक गांव हिम्मतपुर बेला गंगा के दूसरी ओर उत्तराखंड सीमा पर स्थित है। हिम्मतपुर बेला में करीब 25 मकान हैं और 250 लोग निवास करते हैं। जो देश आजादी के 75 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। गांव निवासी जीत सिंह की 70 वर्षीय मां कपूर कौर तीन माह पूर्व बीमार पड़ र्गइं। जीत सिंह ने उनका इलाज एक प्राइवेट अस्पताल में तो करा लिया, लेकिन चिकित्सकों ने उनको हर हफ्ते परामर्श के लिए बुलाया। गांव से आने के लिए रास्ता नहीं है, ऐसे में जीत सिंह ने गांव बालावाली में 1500 रुपये महीने पर एक कमरा दो माह के लिए किराये पर लिया और मां का इलाज कराया। (संवाद)
छह महीने खुलता है स्कूल, छह महीने बंद
जहां इस दौर में बच्चे अच्छे स्कूल, कॉलेज के चयन के लिए परीक्षा देते हैं, जिससे उनका भविष्य उज्ज्वल बन जाए। वहीं, इस गांव के बच्चों के लिए गांव से तीन किलोमीटर दूर रामसहायवाला में सरकारी स्कूल है, जो छह माह खुलता है। बरसात में पानी आ जाने से रास्ता नहीं रहता है तो स्कूल में न बच्चे पहुंच पाते है और न अध्यापक।
विज्ञापन
गांव में नहीं आते जनप्रतिनिधि
ग्रामीण सुखचैन सिंह, अमर जीत सिंह, महेंद्र सिंह, कुलदीप सिंह, जगदीश सिंह, जीत सिंह, सोमपाल सिंह आदि ने बताया की गांव में आज तक कोई जनप्रतिनिधि आए नहीं हैं, उन्हें पता भी नहीं है कि यह गांव कहां स्थित है। गांव में पांच सालों में केवल वोट मांगने एक दो लोग आ जाते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं, जो आज तक पूरे नहीं हुए। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से गुहार लगाई है या तो उन्हें उत्तराखंड में शामिल करा दिया जाए। अन्यथा गांव में पक्के मकान, बिजली, सड़क आदि मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
तहसील-बिजनौर
विधानसभा-बिजनौर
मुख्यालय से दूरी- 40 किमी
कठिन है गांव तक पहुंचने की डगर
हिम्मतपुर बेला कहने को तो मंडावर खादर में धारा के दूसरी ओर है, लेकिन इस गांव तक पहुंचने की डगर बहुत कठित है। जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर बसे इस गांव के लोगों को पहले गंगा के किनारे बने बंधे और खेतों के बीच से होकर बालावाली पुल तक पहुंचना पड़ता है। इसके बाद पुल पार करके यहां तक किसी तरह पहुंचते हैं। जिनके पास अपने अपनी बाइक है, वो ही शहर तक आते हैं।
इस गांव के लोगों की समस्याओं को देखा जाएगा। प्रयास किया जाएगा कि यहां के लोगों की समस्याओं का समाधान कराया जा सके - उमेश मिश्रा, डीएम बिजनौर
विज्ञापन
आशीष तोमर
मंडावर। जो उलझकर रह गई फाइलों के जाल में, गांव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में...जनकवि अदम गौंडवी की ये लाइनें यदि गंगा की धारा के उस पार बसे हिम्मतपुर बेला गांव के ऊपर कही जाएं तो सटीक साबित होंगी। मंडावर क्षेत्र का यह गांव कहने को बिजनौर जिले का हिस्सा है, लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी सड़क, शिक्षा और बिजली के लिए तरस रहा है। आज भी इस गांव में कच्ची पगडंडियों से होकर जाना पड़ता है। कोई बीमार पड़ जाए तो उसके इलाज के लिए शहर के पास किराये पर मकान लेना पड़ता है। तमाम चुनाव आए और ग्रामीणों से वादे हुए, लेकिन आज तक यह गांव यूपी और उत्तराखंड के दोआब में दबा हुआ है।
थाना मंडावर खादर क्षेत्र की ग्राम पंचायत टीप का एक गांव हिम्मतपुर बेला गंगा के दूसरी ओर उत्तराखंड सीमा पर स्थित है। हिम्मतपुर बेला में करीब 25 मकान हैं और 250 लोग निवास करते हैं। जो देश आजादी के 75 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। गांव निवासी जीत सिंह की 70 वर्षीय मां कपूर कौर तीन माह पूर्व बीमार पड़ र्गइं। जीत सिंह ने उनका इलाज एक प्राइवेट अस्पताल में तो करा लिया, लेकिन चिकित्सकों ने उनको हर हफ्ते परामर्श के लिए बुलाया। गांव से आने के लिए रास्ता नहीं है, ऐसे में जीत सिंह ने गांव बालावाली में 1500 रुपये महीने पर एक कमरा दो माह के लिए किराये पर लिया और मां का इलाज कराया। (संवाद)
विज्ञापन
छह महीने खुलता है स्कूल, छह महीने बंद
जहां इस दौर में बच्चे अच्छे स्कूल, कॉलेज के चयन के लिए परीक्षा देते हैं, जिससे उनका भविष्य उज्ज्वल बन जाए। वहीं, इस गांव के बच्चों के लिए गांव से तीन किलोमीटर दूर रामसहायवाला में सरकारी स्कूल है, जो छह माह खुलता है। बरसात में पानी आ जाने से रास्ता नहीं रहता है तो स्कूल में न बच्चे पहुंच पाते है और न अध्यापक।
विज्ञापन
गांव में नहीं आते जनप्रतिनिधि
ग्रामीण सुखचैन सिंह, अमर जीत सिंह, महेंद्र सिंह, कुलदीप सिंह, जगदीश सिंह, जीत सिंह, सोमपाल सिंह आदि ने बताया की गांव में आज तक कोई जनप्रतिनिधि आए नहीं हैं, उन्हें पता भी नहीं है कि यह गांव कहां स्थित है। गांव में पांच सालों में केवल वोट मांगने एक दो लोग आ जाते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं, जो आज तक पूरे नहीं हुए। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से गुहार लगाई है या तो उन्हें उत्तराखंड में शामिल करा दिया जाए। अन्यथा गांव में पक्के मकान, बिजली, सड़क आदि मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
तहसील-बिजनौर
विधानसभा-बिजनौर
मुख्यालय से दूरी- 40 किमी
कठिन है गांव तक पहुंचने की डगर
हिम्मतपुर बेला कहने को तो मंडावर खादर में धारा के दूसरी ओर है, लेकिन इस गांव तक पहुंचने की डगर बहुत कठित है। जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर बसे इस गांव के लोगों को पहले गंगा के किनारे बने बंधे और खेतों के बीच से होकर बालावाली पुल तक पहुंचना पड़ता है। इसके बाद पुल पार करके यहां तक किसी तरह पहुंचते हैं। जिनके पास अपने अपनी बाइक है, वो ही शहर तक आते हैं।
इस गांव के लोगों की समस्याओं को देखा जाएगा। प्रयास किया जाएगा कि यहां के लोगों की समस्याओं का समाधान कराया जा सके - उमेश मिश्रा, डीएम बिजनौर

मंडावर क्षेत्र के गांव हिम्मतपुर बेला के रास्ते।- फोटो : BIJNOR