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Bijnor News: कारगिल युद्ध में बिजनौर के योद्धाओं ने भी लहराई थी विजय पताका

Wed, 26 Jul 2023 12:05 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर Updated Wed, 26 Jul 2023 12:05 AM IST
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The warriors of Bijnor also hoisted the victory flag in the Kargil war
कारगिल युद्घ्र में शामिल अफजलगढ़ के पूर्व सैनिक कर्नल आरएस सिरोही।
-बिना खाना खाए कई दिनों तक लड़ी थी दुश्मनों से जंग
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-100 से ज्यादा बिजनौर के रहने वाले सैनिकों ने युद्ध में लिया था हिस्सा
फोटो..
संवाद न्यूज एजेंसी
अफजलगढ़। कारगिल युद्ध के नायकों के सम्मान में 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। कारगिल विजय दिवस पर बिजनौर के योद्धाओं का नाम लेना जरूरी है, क्योंकि बिना कुछ खाए-पीए दुश्मनों को इन्होंने भी धूल चटाई। साथ ही कारगिल युद्ध में भारत को विजय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पाकिस्तान सेना और कश्मीरी उग्रवादियों ने नियंत्रण रेखा पार कर भारत की जमीन कब्जाने की कोशिश की थी। करीब पांच हजार घुसपैठिए भारत की सीमा में घुस आए थे, जिन्हें खदेड़ने के लिए करीब 30 हजार भारतीय सैनिकों ने युद्ध में हिस्सा लिया। इसमें बिजनौर के सैकड़ों सैनिक भी शामिल थे। भूतपूर्व सैनिक बताते हैं कि कैसे उन्होंने बिना खाना खाए दुश्मनों से जंग लड़ी।
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-11 दिनों तक बिना खाना खाए दुश्मनों से लड़े : कैप्टन रघुवीर सिंह



पत्थरवाला फार्म निवासी भूतपूर्व कैप्टन रघुवीर सिंह बिष्ठ ने बताया कि उस समय वह गुरेज में कमांडर थे। उनकी टुकड़ी में 20 लोग थे, जिनमें से 12 सैनिक उनके साथ थे। बाकी इधर-उधर हो गए। उन्होंने घुसपैठियों को आगे नहीं बढ़ने दिया। गुरेज सेक्टर में टीम को चौकन्ना रख 11 दिनों तक बिना खाना खाए लड़ते रहे। वह और उनकी टीम बिना थके लड़े और ऑपरेशन विजय में सहयोगी बने।
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-युद्ध संचार व्यवस्था बनाए रखी : सूबेदार पूरन सिंह



विजयनगर निवासी भूतपूर्व सूबेदार पूरन सिंह असवाल ने बताया कि वह उस समय आठ पर्वतीय खंड सिगनल रेजीमेंट में तैनात थे। उन्होंने कारगिल युद्ध में सैन्य मुख्यालय श्रीनगर कारगिल, बटालिक सेक्टर, ट्रास सेक्टर तक अपने सैन्य टुकड़ियों व कमांडरों के साथ युद्ध संचार व्यवस्था बनाए रखने का काम किया। दुर्गम पहाड़ियों में रेडियो व लाइन संचार व्यवस्था बनाए रखना एक चुनौती भरा काम था।

बेटे ने कारगिल सेक्टर के कई क्षेत्रों में लड़ा युद्ध : गणेशी देवी



विजयनगर निवासी मृतक कैप्टन भारत सिंह रावत की 88 वर्षीय माता गणेशी देवी का कहना है कि उनका बेटे ने कारगिल युद्ध में दो राष्ट्रीय राइफल्स में रहते हुए कारगिल सेक्टर के विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध में भाग लिया। टेढ़ी-मेढ़ी ऊंची दुर्गम पहाड़ियों में लड़ाई लड़ना काफी कठिन था, क्योंकि दुश्मन ऊंची चोटियों पर बैठकर भारतीय सैनिकों की टुकड़ियों पर हमला कर रहा था।


-चोटियों पर लहराया था झंडा: कर्नल आरएस सिरोही



मुरलीवाला निवासी भूतपूर्व कर्नल आरएस सिरोही ने बताया कि कारगिल युद्ध के समय वह 21 पैरा एसएस के साथ थे। आठ अप्रैल से युद्ध के अंत तक वह बंकर व पत्थरों से बने सेंजरों में रहे। उस समय घुसपैठियों को मारने की धुन थी। उनकी बटालियन में 1760 जवान थे। ऑपरेशन विजय की जीत के बाद चोटियों पर झंडा लहराया।

कारगिल युद्घ्र में शामिल अफजलगढ़ के पूर्व सैनिक कर्नल आरएस सिरोही।

कारगिल युद्घ्र में शामिल अफजलगढ़ के पूर्व सैनिक कर्नल आरएस सिरोही।

कारगिल युद्घ्र में शामिल अफजलगढ़ के पूर्व सैनिक कर्नल आरएस सिरोही।

कारगिल युद्घ्र में शामिल अफजलगढ़ के पूर्व सैनिक कर्नल आरएस सिरोही।

कारगिल युद्घ्र में शामिल अफजलगढ़ के पूर्व सैनिक कर्नल आरएस सिरोही।

कारगिल युद्घ्र में शामिल अफजलगढ़ के पूर्व सैनिक कर्नल आरएस सिरोही।

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