फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bijnor News ›   The soldiers of the 1971 war told the story of bravery

1971 के युद्ध के जवानों ने सुनाई शौर्य की कहानी

Fri, 17 Dec 2021 12:15 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 17 Dec 2021 12:15 AM IST
विज्ञापन
The soldiers of the 1971 war told the story of bravery
1971 के युद्ध के जवानों ने सुनाई शौर्य की कहानी
विज्ञापन

बिजनौर। 1971 में हुए युद्ध में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इसी के साथ पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में एक नया देश बन गया था। 1971 में हुए उस युद्ध में जनपद के भी कई सैनिकों ने भाग लिया था और दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। आइए 1971 की जंग में शामिल होने बाले जवानों की जुबानी ही जानते हैं शौर्य की कहानी। संवाद
ढाका केवल सात किलोमीटर दूर था : दयाराम सिंह
गांव नगला निवासी दयाराम सिंह ने उस युद्ध में भाग लिया था। दयाराम सिंह बताते हैं कि उस समय उनकी पोस्टिंग असम में थी। इसके बाद उनकी रेजीमेंट को त्रिपुरा राज्य में धनपुर में भेजा गया था। वहां से भारतीय सेना ने लाल बाग में हमला किया था और निया बाजारी, लक्सम, दाऊद कंडी, चांदपुर, बंदर स्टेशन से होते हुए सेना नारायणगंज तक पहुंच गई थी। नारायणगंज ढाका से मात्र सात किलोमीटर दूर है। दयाराम सिंह बताते हैं कि उनके कमांडिंग ऑफिसर एल एम सब्बरवाल थे। उस युद्ध में बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी भी भारतीय सेना का सहयोग कर रही थी। युद्ध के बाद उन्हें सेना का मेडल भी प्राप्त हुआ था।
विज्ञापन

ट्रेनिंग के तुरंत बाद लड़ी थी लड़ाई : आनंद स्वरूप
गांव जलालपुर निवासी आनंद स्वरूप ने भी 1971 का युद्ध लड़ा था। वह 1971 में ही सेना में भर्ती हुए थे और ट्रेनिंग के तुरंत बाद वह लड़ाई के लिए चले गए थे। उनकी पोस्टिंग पंजाब के फिरोजपुर जनपद के फाजिल्का कस्बे में थी। लड़ाई शुरू होने के बाद उनकी रेजीमेंट ने गुरुमुखी खेड़ा गांव में दुश्मनों से दो हाथ किए। वह बताते हैं कि पाकिस्तान ने उनकी टुकड़ी पर हवाई हमला किया था। उनकी रेजीमेंट का नेतृत्व कर्नल आरके सूरी कर रहे थे। उनके साथ थर्ड असम, 15 राजपूत और चार जाट रेजीमेंट भी लड़ रही थी। उस युद्ध में उनके कई साथियों को वीरगति प्राप्त हुई थी, लेकिन भारतीय सेना की आग उगलती एलएमजी के आगे पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए थे।
विज्ञापन
विज्ञापन

छुट्टी निरस्त हो गई, संभाल लिया था मोर्चा : सविंदर सिंह
ब्लॉक जलीलपुर के ग्राम बड़िया नंगली निवासी सविंदर सिंह उस युद्ध के दौरान पटियाला में तैनात थे। ट्रेनिंग के तुरंत बाद वह दो माह की छुट्टी पर थे, लेकिन उनकी छुट्टियां निरस्त कर दी गईं और सांबा के पास रैया गांव में उन्होंने मोर्चा संभाला। वहां पाकिस्तान की सेना द्वारा बारूदी सुरंग लगाई गई थी तथा टैंक खड़े थे। भारतीय सेना ने जांबाजी से पाकिस्तानी सेना का मुकाबला किया और उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया। वह जीत आज भी रोमांचित करती है।

जीत का जमकर मनाया था जश्न : महेंद्र सिंह
हल्दौर थाना क्षेत्र के खैराबाद निवासी महेंद्र सिंह लड़ाई के दौरान बरेली मिलिट्री हॉस्पिटल में तैनात थे। उनका नाम भी उन वालंटियर में आया था, जिन्हें युद्ध पर लड़ने के लिए जाना था। बरेली से वह ढाका के निकट खुलना सेक्टर पर गए। उसी दौरान जनरल नियाजी के आत्म समर्पण का समाचार मिला। महेंद्र सिंह बताते हैं कि उस जीत पर जमकर जश्न मनाया था। पाकिस्तान की बलूच रेजीमेंट पर पेट्रोलिंग के दौरान एक भारतीय सैनिक ने ग्रेनेड फेंक दिया था जिसमें दर्जनों पाकिस्तानी सैनिक घायल हो गए थे। जिनका उपचार बरेली में हुआ था। पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सेना को सबसे शक्तिशाली सेना बताते थे।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed