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Bijnor News: राशिद की दुकान में हवा का झोंका खींच लाती है रस्सी
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सौ साल से राशिद की दुकान की छत पर लटका हुआ है कपड़े वाला पंखा
ऐसा पंखा कभी राजा महाराजा और अंग्रेज अफसरों की शान हुआ करता था
लव अग्रवाल
झालू (बिजनौर)। जमाना बदल गया, मगर नहीं बदल सका राशिद की दुकान का पंखा। रस्सी हवा के झोंका आज भी खींच कर ले आती है। दरअसल, करीब सौ साल से दुकान की छत पर कपड़े वाला पंखा लटका हुआ है। ऐसा पंखा कभी राजा महाराजा और अंग्रेज अफसरों की शान हुआ करता था। राशिद आज भी सालों पुरानी परंपरा को सहेज कर रखे हुए हैं।
झालू में राशिद का पार्लर है। इसमें उसने कपड़े का पंखा लगा रखा है। यह पंखा रस्सी खींचने पर चलता है और दो व्यक्तियों को बेहतरीन हवा देता है। राशिद बताते हैं कि उनकी दुकान तीन पीढ़ियों से है। तभी से यह पंखा लगा है। इस पंखे में कपड़े की चादर को लगाया गया है। पंखा एक डोरी से चलता है। डोरी खींचने की जिम्मेदारी भी बाल कटवाने या सेविंग कराने वाले ग्राहक की ही होती है। इसके लिए कोई अतिरिक्त श्रम नहीं करना पड़ता और यह दो व्यक्तियों को अच्छी हवा देता है।
राशिद बताते हैं कि उनके दादा महबुल्ला ने यह पंखा लगाया था, जो आज भी चल रहा है। यह पंखा इको फ्रेंडली है। बिना बिजली, शोर और प्रदूषण के भरपूर हवा देता है। पुराने समय में लोग इसी प्रकार के पंखों का प्रयोग करते थे। कई लोग तो इस प्रकार के पंखे का प्रयोग अपने घर में भी कर चुके हैं।
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कभी महलों और अंग्रेज अफसरों की कोठी में होता था यह पंखा
राशिद की दुकान में जो पंखा टंगा हुआ है, ऐसा पंखा कभी महलों और अंग्रेज अफसरों की कोठी में हुआ करता था। क्योंकि तब आम लोग इसे इस्तेमाल नहीं कर पाते थे। अंग्रेज अफसर और राजा महाराजा पंखा चलाने को रस्सी खींचने के लिए नौकर रखा करते थे, जिन्हें पंखावाला कहा जाता था।
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ऐसा पंखा कभी राजा महाराजा और अंग्रेज अफसरों की शान हुआ करता था
लव अग्रवाल
झालू (बिजनौर)। जमाना बदल गया, मगर नहीं बदल सका राशिद की दुकान का पंखा। रस्सी हवा के झोंका आज भी खींच कर ले आती है। दरअसल, करीब सौ साल से दुकान की छत पर कपड़े वाला पंखा लटका हुआ है। ऐसा पंखा कभी राजा महाराजा और अंग्रेज अफसरों की शान हुआ करता था। राशिद आज भी सालों पुरानी परंपरा को सहेज कर रखे हुए हैं।
झालू में राशिद का पार्लर है। इसमें उसने कपड़े का पंखा लगा रखा है। यह पंखा रस्सी खींचने पर चलता है और दो व्यक्तियों को बेहतरीन हवा देता है। राशिद बताते हैं कि उनकी दुकान तीन पीढ़ियों से है। तभी से यह पंखा लगा है। इस पंखे में कपड़े की चादर को लगाया गया है। पंखा एक डोरी से चलता है। डोरी खींचने की जिम्मेदारी भी बाल कटवाने या सेविंग कराने वाले ग्राहक की ही होती है। इसके लिए कोई अतिरिक्त श्रम नहीं करना पड़ता और यह दो व्यक्तियों को अच्छी हवा देता है।
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राशिद बताते हैं कि उनके दादा महबुल्ला ने यह पंखा लगाया था, जो आज भी चल रहा है। यह पंखा इको फ्रेंडली है। बिना बिजली, शोर और प्रदूषण के भरपूर हवा देता है। पुराने समय में लोग इसी प्रकार के पंखों का प्रयोग करते थे। कई लोग तो इस प्रकार के पंखे का प्रयोग अपने घर में भी कर चुके हैं।
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कभी महलों और अंग्रेज अफसरों की कोठी में होता था यह पंखा
राशिद की दुकान में जो पंखा टंगा हुआ है, ऐसा पंखा कभी महलों और अंग्रेज अफसरों की कोठी में हुआ करता था। क्योंकि तब आम लोग इसे इस्तेमाल नहीं कर पाते थे। अंग्रेज अफसर और राजा महाराजा पंखा चलाने को रस्सी खींचने के लिए नौकर रखा करते थे, जिन्हें पंखावाला कहा जाता था।