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Bijnor News: सिंथेटिक कंबल ने छीन ली कपास के रजाई कारोबार की गर्माहट

Wed, 04 Jan 2023 06:00 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 04 Jan 2023 06:00 AM IST
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Synthetic blanket snatched away the heat of cotton quilt business
बिजनौर के ग्राम शादीपुर में लिहाफ में धागे डालती महिला। - फोटो : BIJNOR
सिंथेटिक कंबल ने छीन ली कपास के रजाई कारोबार की गर्माहट
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बिजनौर। सर्दी के मौसम में रजाई को सबसे बड़ा मित्र कहा जाता है। वर्तमान समय में रजाई के विकल्प के रूप में कंबल और सिंथेटिक रजाइयां आ गई हैं। इससे लिहाफ और रजाई का कारोबार बेहद प्रभावित हुआ है। कुछ वर्ष पूर्व तक सर्दी का मौसम शुरू होते ही रजाई की मांग बढ़ने लगती थी। इससे ग्रामीण स्तर पर रुई का कारोबार करने वाले जुलाहे कारोबार से जुड़े रहते थे।
ग्राम शादीपुर निवासी वसीम अहमद बताते हैं कि उनका पूरा परिवार रजाई के कारोबार से जुड़ा रहा है। अभी भी कुछ लोग पुरानी रजाई की रुई द्वारा भी दोबारा तैयार कराकर रजाई तैयार करवाते हैं। कंबल तथा सिंथेटिक रजाई के बाजार में आने के बाद से इनकी मांग में कमी आई है। सुगरा खातून बताती हैं कि एक समय उनके पास दिनभर में 20 से 25 रजाई तैयार कराने के लिए लोग आते थे। अब मात्र चार-पांच लोग ही दिन में रजाई तैयार कराने के लिए आ रहे हैं। यह 3 महीने का सीजन है।
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फरीदा बताती हैं कि कुछ वर्ष पहले तक जनपद में काफी लोग कपास की खेती करते थे, लेकिन अब जिले में कपास की खेती नहीं हो रही है। यदि वह भी हो रही है तो बेहद कम। वह बिजनौर की मंडी से रूई खरीदते हैं। लिहाफ के विकल्प के तौर पर भले ही कंबल आ गए हो, लेकिन बिस्तर पर बिछाने के लिए आज भी रुई के बने गद्दे ही पहली पसंद है।
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बहुत कम रह गया काम : हफीजुद्दीन
ग्राम कृतो नंगली निवासी हफीजुद्दीन बताते हैं कि पहले पेरूवाला, खुर्रमपुर, सदरूद्दीन नगर में काफी मात्रा में रूई के लिहाफ बनाने का काम होता था, लेकिन रूई महंगी हो जाने तथा बाहर से ऑर्डर न मिलने के कारण लोगों का इससे मोहभंग हुआ है। अब चंद ही मशीनें बची हैं जो लिहाफ और गद्दे बनाने का काम करती हैं। कासिम बताते हैं कि वह मशीन से रूई को धुनकर लिहाफ में भरकर लिहाफ को तैयार कराने के 30 रुपये प्रति किलो लेते हैं। एक लिहाफ औसतन 4 किलो रुई में तैयार हो जाता है। वहीं गद्दे में 3 किलो रुई भरी जाती है।
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