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सपूतों ने देश की खातिर दांव पर लगा दी थी जान

Sun, 25 Jul 2021 11:09 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 25 Jul 2021 11:09 PM IST
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Sons had put their lives at stake for the sake of the country
बिजनौर के गढ़वाल रायफल्स में तैनात रहे मोहम्मद असद। - फोटो : BIJNOR
सपूतों ने देश की खातिर दांव पर लगा दी थी जान
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बिजनौर। कारगिल युद्ध में विजय पताका फहराने में जनपद के वीर सैनिकों का बहुत बड़ा योगदान रहा। इस युद्ध में गांव फीना निवासी लांसनायक अशोक कुमार ने सर्वोच्च बलिदान देकर दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे। वहीं, मोहम्मद असद ने युद्ध के दौरान अपने एक हाथ गंवाने के बाद भी कई पाकिस्तानी घुसपैठियों को मौत की नींद सुलाया। सूबेदार मेजर अरविंद वर्मा, वायु सेना में रहे मनोज कुमार और नजीबाबाद निवासी सरदार सिंह ने भी देश की खातिर अपनी जान दांव पर लगा दी थी।
कारगिल विजय दिवस स्वतंत्र भारत के सभी देशवासियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिवस है। भारत में प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को यह दिवस मनाया जाता है। इस दिन भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध छिड़ा था, जो लगभग 60 दिनों तक चला। 26 जुलाई को भारतीय सेना ने युद्ध जीता और दुर्गम पहाड़ों पर तिरंगा झंडा फहराया। इस युद्ध में जिले के सपूतों ने भी अपना योगदान दिया था। लांसनायक फीना निवासी अशोक कुमार देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देते हुए शहीद हो गए। बिजनौर के रहने वाले मोहम्मद असद के अनुसार 13 जून को पाकिस्तानी सेना ने दुर्गम पहाड़ी पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच जंग हुई। गढ़वाल रायफल्स में तैनात रहे असद ने बताया कि इस युद्ध में उनका बायां हाथ उड़ गया था। दुर्गम पहाड़ी और आसपास में उपचार न मिलने की वजह से उनका काफी रक्त बहता रहा, लेकिन उनके साथियों ने उनका हौसला बंधाए रखा, जिससे वे इस आपत्ति से पार पा सके। इस युद्ध की याद कर आज भी उनका सीना चौड़ा हो जाता है कि आखिर उन्होंने अपना हाथ गंवाकर ही सही, लेकिन भारत माता की रक्षा की।
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नगर निवासी सूबेदार मेजर अरविंद वर्मा ने बताया कि वे 1978 में सेना आयुध कोर में भर्ती हुए थे। उनकी आयुध कोर गोला बारूद तथा हथियार आदि युद्ध क्षेत्र तक पहुंचाने का कार्य करती थी। उस समय श्रीनगर के पास सेना का गोला, बारूद और हथियार एकत्रित करने के लिए गुप्त स्थान बनाया गया था। लगभग 700 सैनिकों की उस टुकड़ी में वे भी शामिल थे, जो अग्रिम मोर्चे पर तैनात सेना की टुकड़ी को गोला बारूद और हथियार उपलब्ध कराती थी। कभी रात में हैलिकॉप्टर से दुर्गम स्थानों पर गोला बारूद भेजा जाता था तो कभी दिन में ही सड़क मार्ग से युद्ध शुरु होने पर भारत के विभिन्न आयुध डिपो से सैनिक एकत्रित हुआ करते थे। उनका परिवार भी वहीं पर फंस गया था। एक तरफ देश की रक्षा का संकल्प तो दूसरी ओर परिवार की चिंता ने उन्हें थोड़ा परेशान जरूर किया था। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और स्वयं के साथ-साथ साथ अपने साथियों का भी हौसला बढ़ाया।
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फाइटर प्लेन से बरसाए थे बम
सैनिक मनोज कुमार ने बताया कि वे भारतीय वायु सेना में थे। उस समय उनकी यूनिट गुुजरात के भुज में थी और वहां से ऑपरेट कर रहे थे। उन्होंने बताया कि हमारा काम आर्मी को एयर सपोर्ट देना था, जिससे आर्मी धीरे-धीरे आगे बढ़ सके। दुश्मन ऊपर चोटियों पर बैठा था और आर्मी नीचे थी। हमने फाइटर प्लेन से दुश्मन पर बम बरसाए थे, ताकि आर्मी आगे बढ़ सके। हम बम बरसा रहे थे और आर्मी नीचे से अपना काम कर रही थी। इसके अलावा हैलिकॉप्टर से घायलों की मदद के साथ खाने पीने का सामान भी पहुंचाया जा रहा था। वहीं, नजीबाबाद चीनी मिल के सामने स्थित आंबेडकर कॉलोनी निवासी सरदारा सिंह ने बताया कि उनकी तैनाती बारामूला उरी सेक्टर में थी। वह कारगिल युद्ध में शामिल रहे और उन्होंने से जंग की, जिससे विजय प्राप्त हुई।

बिजनौर के सूबेदार मेजर अरविंद वर्मा।

बिजनौर के सूबेदार मेजर अरविंद वर्मा।- फोटो : BIJNOR

सरदारा सिंह।

सरदारा सिंह।- फोटो : BIJNOR

अफजलगढ़ के कैप्टन भारत सिंह रावत।

अफजलगढ़ के कैप्टन भारत सिंह रावत।- फोटो : BIJNOR

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