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जिले के किसान पहले से ही जुड़े हैं अनुबंध खेती से, कमा रहे मुनाफा

Sun, 20 Sep 2020 12:09 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 20 Sep 2020 12:09 AM IST
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Potato, wheat are still being cultivated on contract basis
सरदार हरजिंदर सिंह। - फोटो : BIJNOR
अब भी अनुबंध के आधार पर आलू, गेहूं की हो रही है खेती
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बिजनौर। केंद्र सरकार ने खेती से जुड़े तीन अध्यादेश पारित किए हैं। इन अध्यादेशों में अनुबंध खेती शुरू कराने की बात कही जा रही है। किसान अनुबंध खेती का विरोध भी कर रहे हैं। लेकिन जिले के कुछ किसान बीते कुछ सालों से अनुबंध खेती कर रहे हैं। अनुबंध खेती से इन किसानों ने मुनाफा भी कमाया है। किसानों को खाद, बीज कंपनी से उपलब्ध कराया गया और समय से फसल भी खरीदी।
कृषि अध्यादेशों के खिलाफ देश के कई हिस्सों के किसान आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन जिले में अनुबंध खेती की परंपरा अध्यादेश आने से पहले ही शुरू हो चुकी है। किसान पहले से ही अनुबंध खेती कर रहे हैं। अनुबंध खेती में वे अपनी फसल बाजार के रेट के बराबर कीमत पर बेचते हैं। फसल के अधिकतम मूल्य निर्धारित नहीं होते लेकिन अधिकतम मूल्य निर्धारित रहते हैं। गांव सिकंदरी निवासी सरदार हरजिंदर सिंह चिप्स वाले आलू की अनुबंध खेती करते हैं। सरदार हरविंदर सिंह करीब चार एकड़ जमीन में चिप्स वाला आलू बोते हैं। उनका अनुबंध वेव ग्रुप के साथ है। इस बार भी वे अनुबंध पर आलू बोने के लिए बात कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल भी उन्होंने अनुबंध पर आलू बोया था। तब बाजार में सब्जी के आलू के दाम 14 से 15 रुपये प्रति किग्रा तक थे। उन्होंने आलू 13 रुपये प्रति किग्रा के भाव बेचा था। कहा कि कभी कभी बंपर उत्पादन से आलू के रेट धड़ाम हो जाते हैं। किसान अपनी फसल फेंक देते हैं। उनका कहना है कि पिछले साल उन्होंने कंपनी से अनुबंध किया था कि कंपनी भाव कम होने पर भी उनसे आलू छह रुपये प्रति किग्रा से कम कीमत पर नहीं खरीद सकती है। आलू का बीज कंपनी नि:शुल्क देती है और फसल खरीदने से पहले अपने बीज के बराबर आलू बिना कीमत के लेती है।
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नगीना के गांव हरगनपुर निवासी कुंवर शरद कुमार करीब दस साल से एक कंपनी से अनुबंध पर गेहूं की खेती करते हैं। कंपनी उनकी जमीन पर ही गेहूं की खेती कराती है। कंपनी उन्हें गेहूं की नई फसल का बीज बेचती है। वे खेत में गेहूं बोते हैं तो कंपनी प्रतिनिधि तीन बार गेहूं के खेत का निरीक्षण करते हैं। किसी और प्रजाति का बीज खेत में बोया जाता है तो कंपनी उसे अपने स्तर से उखड़वाती है। समय समय पर गेहूं में डाले जाने वाले खाद आदि के बारे में बताती है। हर साल नया गेहूं बोने से उत्पादन बढ़ता है। कंपनी सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खेत से ही गेहूं उठाकर ले जाती है। आमतौर पर किसान पहले गेहूं को घर पर और फिर क्रय केंद्र या बाजार में ले जाते हैं। इसमे मेहनत, किराया और समय तीनों बर्बाद होते हैं। खेत से ही गेहूं सरकार मूल्य पर बेचने पर किराये आदि के 40 से 50 क्विंटल प्रति क्विंटल बचते हैं।
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गन्ना विभाग भी कराता है अनुबंध खेती
एक तरह से गन्ना विभाग भी किसानों से अनुबंध खेती कराता है। गन्ना विभाग किसानों को नई प्रजाति के बीज सब्सिडी पर देता है। अगले साल किसानों से उस बीज तैयार गन्ने का बीज दूसरे किसानों को बिकवाया जाता है। दूसरे किसानों को बीज बेचने वाले किसानों को गन्ना विभाग 50 रुपये प्रति क्विंटल का अनुदान भी देता है। जिले में काफी किसान ऐसे गन्ना बोते हैं।
न्यूनतम समर्थन मूल्य हो तो फायदा
किसान हरविंदर सिंह का कहना है कि अनुबंध खेती करने में कोई समस्या नहीं है लेकिन यह पूरी तरह बाजार के जोखिम पर है। फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तो घोषित होने ही चाहिए। समर्थन मूल्य घोषित होने के बाद खेत से फसल बिकने पर फायदा होता है।

अनुबंध खेती से खेत ही बन जाता है बाजार
कुंवर शरद कुमार का कहना है कि गेहूं की फसल अनुबंध खेती के तहत बोने में उन्हें फायदा हुआ है। जिन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य होते हैं उनकी अनुबंध खेती करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इससे किसानों को खेत में ही बाजार मिल जाता है।

कुंवर शरद कुमार।

कुंवर शरद कुमार।- फोटो : BIJNOR

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