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पासवान की मृदुभाषा के कायल हो गए थे लोग
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चांदपुर में डा.सतेंद्र कुमार शर्मा के आवास पर रामविलास पासवान।
- फोटो : BIJNOR
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पासवान की मृदुभाषा के कायल हो गए थे लोग
बिजनौर। पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान 1985 में जिले की सियासत में ध्रुव की तरह चमके थे। जिले के लोग उनकी मृदुभाषा के कायल हो गए थे। उन्होंने जिले की सियासत में अपना खूब लोहा मनवाया था। पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार से भले ही वे लोकसभा का उपचुनाव हार गए थे। लेकिन जिले के लोग उन्हें ही सांसद मानकर रात भर उनकी जीत का जश्न मनाते रहे थे। जिले के लोग रामविलास पासवान के मुरीद हो गए थे। कई साल तक उनके पास दिल्ली आते-जाते रहे। कई लोगों से पासवान का गहरा नाता रहा है।
1985 के उपचुनाव में बिजनौर लोकसभा सुरक्षित सीट थी, कांग्रेस के सांसद गिरधारी लाल के निधन के बाद इस सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को चुनाव मैदान में उतारा तो लोकदल के टिकट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने ताल ठोंक दी। बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी अपने राजनीति सफर की शुरूआत इस चुनाव से ही की थी। वे भी बसपा के टिकट पर चुनाव में उतर गईं। देश भर की निगाह इस चुनाव पर रही। रामविलास पासवान का जिले का हर कोई व्यक्ति मुरीद होता गया। लोगों को गले लगाने के साथ पासवान की मृदुभाषा लोगों को खूब पसंद आई। राम विलास पासवान के चुनाव में देश के कई दिग्गज नेताओं ने बिजनौर में डेरा डाल दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के अलावा शरद यादव, बीजू पटनायक, पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल समेत तमाम नेता पासवान का चुनाव लड़ाने बिजनौर पहुंचे थे।
कई दिग्गज नेता जिले की गली कूचों में घूमकर पासवान के लिए वोट मांग रहे थे। इन नेताओं को अपने साथ घूमता देख जिले के लोग भी हैरान थे। हालांकि राम विलास पासवान यह चुनाव हार गए। मीरा कुमार पहली बार सांसद बनी थीं, उन्हें 1,29,086 और राम विलास पासवान को 1,22,747 वोट मिले थे। मायावती तीसरे नंबर पर रही थीं। मायावती को 61,504 वोट मिले थे। इस चुनाव के बाद भी रामविलास पासवान का रुतबा कम नहीं हुआ। बिजनौर के लोग कई साल तक उनके पास दिल्ली आते-जाते रहे। कई लोगों से रामविलास पासवान के घर जैसे रिश्ते बन गए थे। जिले के तमाम लोगों को वह नाम से जानते थे। राम विलास पासवान के निधन से उनके समर्थकों को भी गहरा सदमा लगा है।
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डॉ. सत्येंद्र थे पासवान के चुनाव अधिकारी
फोटो समाचार
चांदपुर। जीवन मिलना भाग्य की बात है, मृत्यु होना समय की बात है, पर मृत्यु के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहना, यह कर्मों की बात है। नगर के मोहल्ला साहुवान निवासी समाजसेवी डॉ. सत्येंद्र कुमार शर्मा का पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान से गहरा नाता रहा है। वर्ष 1984 में कांग्रेस सांसद गिरधारी लाल के निधन के बाद 1985 में हुए उप चुनाव में बिजनौर सुरक्षित सीट से रामविलास पासवान ने कांग्रेस के प्रत्याशी पूर्व उपप्रधानमंत्री जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार के सामने चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में पासवान ने डॉ. सत्येंद्र कुमार शर्मा को चुनाव क्षेत्र चांदपुर का चुनाव प्रभारी बनाया था। डॉ. सत्येंद्र ने बताया कि पासवान इतने मृदुल स्वभाव के थे कि चुनाव के दौरान पासवान अपनी पत्नी के साथ उनके घर पर आए थे तथा भोजन किया था। डॉ. सत्येंद्र ने बताया कि पासवान अपनी चुनावी सभा में कहते थे कि लोग कहते हैं अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, पर अकेला चना भुनने वाले भड़भूजेे की आंख फोड़ सकता है।
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बिजनौर। पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान 1985 में जिले की सियासत में ध्रुव की तरह चमके थे। जिले के लोग उनकी मृदुभाषा के कायल हो गए थे। उन्होंने जिले की सियासत में अपना खूब लोहा मनवाया था। पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार से भले ही वे लोकसभा का उपचुनाव हार गए थे। लेकिन जिले के लोग उन्हें ही सांसद मानकर रात भर उनकी जीत का जश्न मनाते रहे थे। जिले के लोग रामविलास पासवान के मुरीद हो गए थे। कई साल तक उनके पास दिल्ली आते-जाते रहे। कई लोगों से पासवान का गहरा नाता रहा है।
1985 के उपचुनाव में बिजनौर लोकसभा सुरक्षित सीट थी, कांग्रेस के सांसद गिरधारी लाल के निधन के बाद इस सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को चुनाव मैदान में उतारा तो लोकदल के टिकट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने ताल ठोंक दी। बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी अपने राजनीति सफर की शुरूआत इस चुनाव से ही की थी। वे भी बसपा के टिकट पर चुनाव में उतर गईं। देश भर की निगाह इस चुनाव पर रही। रामविलास पासवान का जिले का हर कोई व्यक्ति मुरीद होता गया। लोगों को गले लगाने के साथ पासवान की मृदुभाषा लोगों को खूब पसंद आई। राम विलास पासवान के चुनाव में देश के कई दिग्गज नेताओं ने बिजनौर में डेरा डाल दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के अलावा शरद यादव, बीजू पटनायक, पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल समेत तमाम नेता पासवान का चुनाव लड़ाने बिजनौर पहुंचे थे।
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कई दिग्गज नेता जिले की गली कूचों में घूमकर पासवान के लिए वोट मांग रहे थे। इन नेताओं को अपने साथ घूमता देख जिले के लोग भी हैरान थे। हालांकि राम विलास पासवान यह चुनाव हार गए। मीरा कुमार पहली बार सांसद बनी थीं, उन्हें 1,29,086 और राम विलास पासवान को 1,22,747 वोट मिले थे। मायावती तीसरे नंबर पर रही थीं। मायावती को 61,504 वोट मिले थे। इस चुनाव के बाद भी रामविलास पासवान का रुतबा कम नहीं हुआ। बिजनौर के लोग कई साल तक उनके पास दिल्ली आते-जाते रहे। कई लोगों से रामविलास पासवान के घर जैसे रिश्ते बन गए थे। जिले के तमाम लोगों को वह नाम से जानते थे। राम विलास पासवान के निधन से उनके समर्थकों को भी गहरा सदमा लगा है।
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डॉ. सत्येंद्र थे पासवान के चुनाव अधिकारी
फोटो समाचार
चांदपुर। जीवन मिलना भाग्य की बात है, मृत्यु होना समय की बात है, पर मृत्यु के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहना, यह कर्मों की बात है। नगर के मोहल्ला साहुवान निवासी समाजसेवी डॉ. सत्येंद्र कुमार शर्मा का पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान से गहरा नाता रहा है। वर्ष 1984 में कांग्रेस सांसद गिरधारी लाल के निधन के बाद 1985 में हुए उप चुनाव में बिजनौर सुरक्षित सीट से रामविलास पासवान ने कांग्रेस के प्रत्याशी पूर्व उपप्रधानमंत्री जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार के सामने चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में पासवान ने डॉ. सत्येंद्र कुमार शर्मा को चुनाव क्षेत्र चांदपुर का चुनाव प्रभारी बनाया था। डॉ. सत्येंद्र ने बताया कि पासवान इतने मृदुल स्वभाव के थे कि चुनाव के दौरान पासवान अपनी पत्नी के साथ उनके घर पर आए थे तथा भोजन किया था। डॉ. सत्येंद्र ने बताया कि पासवान अपनी चुनावी सभा में कहते थे कि लोग कहते हैं अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, पर अकेला चना भुनने वाले भड़भूजेे की आंख फोड़ सकता है।

अफजलगढ़ में शेख सुलेमान के साथ रामविलास पासवान।- फोटो : BIJNOR

नगीना में 1990 में रामविलास पासवान पूर्व विधायक सतीश कुमार गौतम के साथ।- फोटो : BIJNOR

हल्दौर में 1985 में चुनावी सभा के दौरान मंच पर बैठे रामविलास पासवान।- फोटो : BIJNOR