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झारखंड मंदिर में रात को ही शुरू हुआ जलाभिषेक
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झारखंड मंदिर में रात को ही शुरू हुआ जलाभिषेक
चांदपुर। बाबा झारखंड शिव मंदिर में महाशिवरात्रि पर बृहस्पतिवार रात से ही जलाभिषेक शुरू हो गया। बुधवार रात तक यहां हरिद्वार से सैंकड़ों की तादात में कांविड़ये जल लेकर पहुंच चुके थे। मान्यता है कि इस मंदिर में जो भी जलाभिषेक करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
बाबा झारखंड शिव मंदिर में वर्ष में दो बार फाल्गुन और श्रावण मास में पड़ने वाली शिवरात्रि पर मेला लगता है। चांदपुर से करीब दो किलोमीटर दूर स्याऊ-छाछरी मार्ग पर स्थित शिवमंदिर के बारे में ग्रामीण बताते हैं कि करीब पांच सौ साल पहले यहां घना जंगल था। एक ग्वाला गांव के पशु चराने यहां आता था। पशुओं में एक गाय जंगल के बीच स्थित ऊंचे टीले पर जाकर रूक जाती थी तथा उसके थन से स्वयं ही दूध निकलने लगता था। थोड़ी देर बाद गाय वहां से चली जाती थी। कई दिनों तक गाय का दूध निकलता देख ग्वाले ने गाय मालिक को बताया। गांववासियों ने उस स्थान पर खुदाई की तो वहां शिवलिंग दिखाई दिया। उसके बाद गांववासियों ने मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर परिसर में बनी झील के बीच में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु लक्ष्मी मंदिर है। झील में कमल के फूल मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। मंदिर परिसर में श्री हनुमान मंदिर, मां दुर्गा मंदिर, सरभंग बाबा की समाधि, शंकर पार्वती परिवार मंदिर, मोनी बाबा की समाधि, यज्ञ शाला, शनि देवता मंदिर, गायत्री माता मंदिर, विशाल पीपल देवता वृक्ष, वट देवता वृक्ष आदि मौजूद हैं।
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चांदपुर। बाबा झारखंड शिव मंदिर में महाशिवरात्रि पर बृहस्पतिवार रात से ही जलाभिषेक शुरू हो गया। बुधवार रात तक यहां हरिद्वार से सैंकड़ों की तादात में कांविड़ये जल लेकर पहुंच चुके थे। मान्यता है कि इस मंदिर में जो भी जलाभिषेक करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
बाबा झारखंड शिव मंदिर में वर्ष में दो बार फाल्गुन और श्रावण मास में पड़ने वाली शिवरात्रि पर मेला लगता है। चांदपुर से करीब दो किलोमीटर दूर स्याऊ-छाछरी मार्ग पर स्थित शिवमंदिर के बारे में ग्रामीण बताते हैं कि करीब पांच सौ साल पहले यहां घना जंगल था। एक ग्वाला गांव के पशु चराने यहां आता था। पशुओं में एक गाय जंगल के बीच स्थित ऊंचे टीले पर जाकर रूक जाती थी तथा उसके थन से स्वयं ही दूध निकलने लगता था। थोड़ी देर बाद गाय वहां से चली जाती थी। कई दिनों तक गाय का दूध निकलता देख ग्वाले ने गाय मालिक को बताया। गांववासियों ने उस स्थान पर खुदाई की तो वहां शिवलिंग दिखाई दिया। उसके बाद गांववासियों ने मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर परिसर में बनी झील के बीच में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु लक्ष्मी मंदिर है। झील में कमल के फूल मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। मंदिर परिसर में श्री हनुमान मंदिर, मां दुर्गा मंदिर, सरभंग बाबा की समाधि, शंकर पार्वती परिवार मंदिर, मोनी बाबा की समाधि, यज्ञ शाला, शनि देवता मंदिर, गायत्री माता मंदिर, विशाल पीपल देवता वृक्ष, वट देवता वृक्ष आदि मौजूद हैं।
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