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मौला अली की सदाओं के साथ जियारत

अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 22 May 2017 12:33 AM IST
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जोगीरम्पुरी दरगाह पर मजलिस को खिताब करते मौलाना अली शम्शुल।
जोगीरम्पुरी दरगाह पर मजलिस को खिताब करते मौलाना अली शम्शुल। - फोटो : अमर उजाला

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बिजनौर में नजीबाबाद की जोगीरम्पुरी दरगाह परिसर में मातमी मजलिसों के अंतिम दिन मौला अली की सदाओं के साथ जियारत का सिलसिला जारी रहा। नोहाख्वानी और मरसियाख्वानी के साथ मातमी जुलूस बरामद किए गए।
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दरगाह परिसर में स्थित शम्सुल हसन हॉल में दिन भर मौला अली की गूंज रही। वाकयाते करबला का जिक्र सुनकर सोगवार जार-जार रोए और सीनाजनी की। चार रोजा सालाना मजलिस के अंतिम दिन कई शिया विद्वानों ने मजलिस को खिताब किया।


मौलाना अली शम्शुल ने कहा कि इस्लाम धर्म इंसानियत और प्यार-मुहब्बत का पैगाम देता है। नसीमुल बाकरी के संचालन में हुई मजलिस में अन्य शिया विद्वानों ने भी करबला की जंग के हवाले से कहा कि इस्लाम ने कभी दहशतगर्दी को कुबूल नहीं किया।

आखिरी दिन मरसियाख्वानी और नोहाख्वानी के साथ अलम और जुलजना के मातमी जुलूस बरामद किए गए। छुरियों व अंगारों के मातम से भी सोगवारों ने करबला के शहीदों को नम आंखों से खिराज ए अकीदत पेश की।

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