खुद को इंसानों के साथ ढाल रहा गुलदार, स्वभाव में दिखा परिवर्तन, पढ़िए खास रिपोर्ट
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बाघों के डर से वन को छोड़कर खेतों में ठिकाना बनाने वाला गुलदार अपने प्राकृतिक स्वभाव को बदल रहा है। वन विभाग के अफसर व शिकारी भी गुलदार के व्यवहार में पहले से ज्यादा परिवर्तन देख रहे हैं। इंसानों की आहट होते ही दूर भागने वाला गुलदार अब खुद को इंसानों के साथ रहने के लिए तैयार कर रहा है।
करीब दो साल पहले कहीं गुलदार देखा जाता था तो यह बड़ी बात होती थी। गुलदार को खेतों में देखे जाने के साल में गिनती के मामले आते थे। हालांकि अमानगढ़ रेंज के आसपास के गांवों में गुलदार रात को सड़क पर घूम रहे कुत्तों को अपना निवाला बना लेते थे। गुलदार दिखने पर गांव वाले भी बहुत चिंतित हो जाते थे। लेकिन अब गुलदार का दिखना आम हो गया है। अमानगढ़ वन रेंज में बाघों की गणना के लिए कैमरे लगाए जाते हैं। इन कैमरों में बाघों के फोटो तो काफी कैद होते हैं, जबकि गुलदार के बहुत कम। इसकी सबसे बड़ी वजह तो यह है कि गुलदार बाघ से बहुत डरता है और उसके इलाके में नहीं जाता है। दूसरी वजह यह है कि अमानगढ़ में बाघों की संख्या पहले से काफी बढ़ गई है। इस वजह से गुलदार ने वन को छोड़कर गन्ने के खेतों में आसरा बनाया है। गुलदार वन में शायद जिस आजादी से न घूम पाता हो वह आजादी उसे गन्ने के खेतों में मिली है। खेतों में उसका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। ऐसे में गुलदार का प्राकृतिक स्वभाव भी धीरे-धीरे बदल रहा है।
ऐसे दिख रहे बदलाव
पहले गुलदार मई व बहुत कम मामलों में जून के मध्य तक बच्चों को जन्म देते थे। इसकी वजह यह होती थी कि बरसात शुरू होने से पहले उसके बच्चे चलने लगें। लेकिन अब जुलाई व अगस्त में बरसात के महीने में भी गुलदार के प्रसव करने के मामले सामने आए हैं। जुलाई में बरुकी क्षेत्र के गांव कनखला में गुलदार के तीन शावक मिले थे। वे इतने छोटे थे कि उनकी आंख भी नहीं खुली थीं। दूसरी जगहों पर भी गुलदार के बहुत छोटे शावक देखे जाने की सूचना मिली थी। नर व मादा गुलदार प्रणय के समय आमतौर पर केवल दो तीन दिन तक साथ रहते थे, लेकिन अब गुलदार के दस से 15 दिन तक साथ देखे जाने के मामले भी सामने आए हैं। नर व मादा गुलदार अब काफी समय तक साथ समय बिता रहे हैं।
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खेतों में दौड़ रहा खुलेआम
गुलदार को बहुत शर्मिला वन्यजीव माना जाता है। इंसानों की आहट होते ही गुलदार खेतों में भाग जाता है। रात को ही ये सक्रिय होता है। लेकिन अफजलगढ़ में गुलदार आए दिन खेतों में भारी संख्या में मौजूद किसानों के सामने ही खेतों में छलांग मारता घूम रहा है। कई जगह गुलदार द्वारा काफी देर तक रास्ते में बैठकर रास्ता जाम करने की भी सूचनाएं मिलती रहती हैं।
खेतों में दिखे गुलदार तो यह करें
- खेतों में काम करने को झुंड में जाएं।
- रात को खेतों पर न रुकें।
- खेत में काम करने से पहले आग जलाएं।
- खेत में शोर मचाएं और तेज आवाज में ध्वनि प्रसारित करें।
- जहां काम करना है वहां एक दिन पहले हांका लगाएं।
ऐसा होता है गुलदार
गुलदार हल्के पीले रंग का होता है। उस पर धब्बे होते हैं। गुलदार अधिकतम 58 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तरा से दौड़ता है। यह एक बार में छह मीटर तक की छलांग मार सकता है। इसका वजन 50 से 90 किलोग्राम तक होता है। मादा गुलदार और नर गुलदार अलग-अलग रहते हैं। यह केवल अपने बच्चों को खतरा होने पर ही इंसानों पर हमला करता है। हालांकि अब गुलदार के छोटे बच्चों पर हमला करने के मामले सामने आ रहे हैं।
स्वभाव में आ रहा परिवर्तन
डीएफओ डॉ. एम सेम्मारन के अनुसार, गुलदारों के स्वभाव में परिवर्तन देखने को मिल रहा है। अपना प्राकृतिक आवास छोड़ने की वजह से ऐसा हो रहा है।
सहअस्तित्व में रहना सीख रहा गुलदार
शेरकोट के रहने वाले शिकारी सैद बिन आसिफ के अनुसार गुलदारों के स्वभाव में परिवर्तन देखने को मिल रहा है। गुलदार इंसानों के सहअस्तित्व में रहना सीख रहा है।
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