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...मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा

Tue, 01 Sep 2020 12:09 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 01 Sep 2020 12:09 AM IST
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Gajalkar Dushyant Kumar remembered
...मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा
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नजीबाबाद। यहां तक आते-आते सूख जातीं हैं कई नदियां/मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा, रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया/इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारों... सरीखीं पंक्तियां उस हिंदी ग़जलकार की ओर इशारा करती हैं। जिसने अपना पूरा जीवन समाज चिंतन को समर्पित कर दिया। उनका नाम है दुष्यंत कुमार। नजीबाबाद तहसील के गांव राजपुर नवादा में जन्मे साहित्यकार दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़जल को नया आयाम देकर जन-जन तक पहुंचाया। सादा जीवन उच्च विचार के धनी हिंदी ग़जल के प्रणेता दुष्यंत कुमार बचपन से ही सौम्य, हिंदी के प्रति समर्पित और समाज के लिए चिंतन, मनन की सोच रखने वाले साहित्यकार थे। दुष्यंत कुमार की काव्य रचनाएं और गजलें समाज के दर्द, व्यवस्थाओं पर चोट और सामाजिक के इर्द-गिर्द के माहौल से जुड़ी होतीं थीं।
खास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए/यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है...साहित्यकार दुष्यंत कुमार की वह पंक्तियां हैं सामाजिक व्यवस्थाओं पर आज भी सटीक चोट हैं। दुष्यंत कुमार का जन्म राजपुर नवादा में एक सितंबर 1933 में हुआ था। आकाशवाणी में कार्यरत रहे दुष्यंत कुमार के बाल सखा नजीबाबाद के गांव रघुनाथपुर निवासी 87 वर्षीय वयोवृद्ध सत्य कुमार त्यागी कहते हैं कि दुष्यंत न केवल महान साहित्यकार थे बल्कि सादगी पसंद, सबको साथ लेकर चलने वाले ऐसे इंसान थे जो समाज के दर्द को अपना दर्द समझते थे और सबसे अपनत्व बटोरते थे। दुष्यंत कुमार के बचपन के साथी सत्य कुमार बताते हैं कि भोपाल से जब लंबा सफर तय कर गांव राजपुर नवादा आया करते थे तो अपनी पुरानी फिएट कार लेकर आते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि मैं अपनी पुरानी फिएट कार का शुक्रगुजार हूं जिसने रास्ते के सारे मिस्त्री मेरे मित्र बना दिए हैं। बेचारे मेरी फिएट कार दुरुस्त करते हैं और चाय भी पिलाते हैं। इतना ही नहीं उनके बीच रुक कर मैं जो कुछ भी महसूस करता हूं घर आने के बाद उसे गजलों में ढाल देता हूं। यकीनन इसी सोच ने दुष्यंत कुमार को देशवासियों के दिलों में स्थान दिलाया।
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भावुकता भरे शब्दों में वयोवृद्ध सत्य कुमार त्यागी फरमाते हैं दुष्यंत कुमार अक्सर गंगा स्नान को जाया करते थे हालांकि उनके पास ट्रैक्टर, कार सब कुछ थे। लेकिन बैलगाड़ी उन्हें प्रिय थी। एक दिन पूर्व गंगा स्नान के लिए गंगा तट पहुंचते तब्बू लगाते और संगी-साथियों के साथ गंगा स्नान का लुत्फ उठाते। सत्य कुमार कहते हैं कि पिता की जब मृत्यु हुई उस वर्ष भी उन्होंने गंगा स्नान के अपने दायित्वों को पूरा किया। दुष्यंत कुमार की पंक्तियां हौले-हौले पांव हिलाओ, जल सोया है छेड़ो मत/हम सब अपने-अपने दीपक यहां सिराने आएंगे...आज भी दुष्यंत के बाल सखा सत्य कुमार त्यागी याद कर भावुक हो जाते हैं। कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता /एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों.., मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही/हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए.., सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं/मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.. यह वह पंक्तियां हैं जो गजलकार दुष्यंत कुमार की गंभीर सोच की कसौटी पर खरा उतरती हैं।
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मेरा सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा/मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा..,हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए/इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.. महान साहित्यकार दुष्यंत कुमार की वह सदाबहार पंक्तियां जो आमजन की जुबान से गुनगुनाए जाते हैं।
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