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पुरातत्व का खजाना दबा है बिजनौर में
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बिजनौर के ग्राम जहानाबांद में नौलखा का खस्ताहाल द्वार।
- फोटो : BIJNOR
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पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है जिला
बिजनौर। पुरातत्व की दृष्टि से बिजनौर बहुत समृद्ध जनपद है, पर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। अगर योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए तो अब भी कई क्षेत्र पर्यटन केंद्रों में तब्दील हो सकते हैं।
महाभारतकालीन जनपद में कई स्थल हैं। मंडावर बौद्धकालीन नगर हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यहां बौध मठ में रहकर छह माह अध्ययन किया। केंद्र सरकार ने बौद्ध सर्किट बनाया। जनपद में मंडावर को बौद्ध सर्किट में शामिल करने की मांग उठी लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ। अरब यात्री इबने बतूता दिल्ली से अमरोहा मंडावर होकर गया। मंडावर क्षेत्र में यदि खनन कराया जाए तो बेशकीमती पुरातात्चिक संपदा मिल सकती हैं।
मोरध्वज का किला
नजीबाबाद -कोटद्वार मार्ग पर महाभारत कालीननगर मोरध्वज है। गढ़वाल विश्वविद्यालय ने यहां खनन कराया। काफी महत्वपूर्ण टेरीकोटा की मूर्तियां यहां मिली। आज यहां टीले में मंदिर है। कहा जाता है कि यह बौद्ध मठ है।
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चार मीनार
नवाब नजीबुद्दौला के नवासे नवाब जहांगीर खान की शादी किरतपुर के मोहल्ला कोटरा में हुई थी। शादी के दो साल बाद वह अपनी बेगम को लेने कोटरा गए थे। लौटते समय जश्न की आतिशबाजी के दौरान छोड़ा गया गोला लगने से नवाब जहांगीर खान की मौत हो गई। बेगम ने नवाब की याद में नजीबाबाद के मोजममपुर तेली गढ़ी में चारमीनार नाम का शानदार मकबरा बनवाया। इस मकबरे के चारों ओर चार मीनारें हैं। चारों मीनारों के बीच में बना भव्य गुंबद कभी का ढह गया। बताया जाता है कि इसी गुंबद में नवाब जहांगीर खान की कब्र है।
ताजपुर का चर्च
ताजपुर चर्च का एक दर्शनीय स्थल है। इसका निर्माण 1913 में राजा शिवनाथ सिंह रिख और उनके भाई श्याम सिंह रिख ने अपनी ईसाई पत्नियों मारग्रेट मैरी और विलियन मैरी के लिए कराया था। बाद में दोनों भाई भी धर्म बदलकर ईसाई बन गए थे। शिवनाथ सिंह रिख की मृत्यु के बाद उनका शव इसी गिरजाघर में दफनाया गया था। यह प्रसिद्ध स्थल है। इसकी खूबसूरती देखने के लिए काफी पर्यटक दूर-दूर से आते हैं।
सुलताना का किला
नजीबाबाद के पास सुलताना डाकू के किले के नाम से मशहूर किले को गुलाम कादिर उर्फ नजीबुददौला ने 18 वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के पतन के बाद बनाया था। पहले इस शहर का नाम नजीबुद्दौला ही था जो बाद में नजीबाबाद कहलाने लगा। अंग्रेजों ने इस किले को आपराधिक जाति भातुओं का सुधार गृह बनाया। सुधार गृह की प्रताड़नाओं से आजिज आकर एक युवक विद्रोही हो गया, जो सुलताना के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कांशीवाला
बढ़ापुर क्षेत्र में कांशीवाला का जंगल जैन तीर्थ स्थल के रूप में विकसित हो रहा है। पारसनाथ नाम से विख्यात क्षेत्र में भव्य मंदिर बनाने के साथ ही पुरातत्व महत्व की वस्तुओं का संग्रह है। खेतों में खुदाई के दौरान कई पुरातन प्रतिमाएं निकली, लेकिन प्रशासन के उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण इन प्रतिमाओं को विशिष्ट पहचान नहीं मिल सकी। जैन समाज ने इस क्षेत्र की महत्ता को पहचाना है। इस क्षेत्र के विकास का बीड़ा उठाया । जैन समाज द्वारा सात बीघा भूमि में भव्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। प्रांगण में विशाल धर्मशाला बनाई गई है। मंदिर के एक कक्ष में संग्रहालय बनाया गया है। संग्रहालय में खुदाई के दौरान मिली सामग्रियों का संग्रह किया गया है।
नौलखा
बंगाल विजय के बाद शाहजहां ने जहानाबाद का इलाका अपनी सेना के एक सिपाहसालार शुजात अली को ईनाम में दे दिया। शुजात अली ने बादशाह का सम्मान रखते हुए इस क्षेत्र का नाम जहानाबाद रखा। इसी क्षेत्र में यह नौलखा बाग स्थित है। लगभग दस एकड़ क्षेत्र, चारों ओर मजबूत दीवार और बीस फुट ऊंचे भव्य प्रवेश द्वार लिए इस बाग को शुजात अली के मकबरे के नाम से भी जाना जाता है। शुजात अली के अलावा उनकी पत्नी और दासी के भी मकबरे हैं।
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बिजनौर। पुरातत्व की दृष्टि से बिजनौर बहुत समृद्ध जनपद है, पर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। अगर योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए तो अब भी कई क्षेत्र पर्यटन केंद्रों में तब्दील हो सकते हैं।
महाभारतकालीन जनपद में कई स्थल हैं। मंडावर बौद्धकालीन नगर हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यहां बौध मठ में रहकर छह माह अध्ययन किया। केंद्र सरकार ने बौद्ध सर्किट बनाया। जनपद में मंडावर को बौद्ध सर्किट में शामिल करने की मांग उठी लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ। अरब यात्री इबने बतूता दिल्ली से अमरोहा मंडावर होकर गया। मंडावर क्षेत्र में यदि खनन कराया जाए तो बेशकीमती पुरातात्चिक संपदा मिल सकती हैं।
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मोरध्वज का किला
नजीबाबाद -कोटद्वार मार्ग पर महाभारत कालीननगर मोरध्वज है। गढ़वाल विश्वविद्यालय ने यहां खनन कराया। काफी महत्वपूर्ण टेरीकोटा की मूर्तियां यहां मिली। आज यहां टीले में मंदिर है। कहा जाता है कि यह बौद्ध मठ है।
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चार मीनार
नवाब नजीबुद्दौला के नवासे नवाब जहांगीर खान की शादी किरतपुर के मोहल्ला कोटरा में हुई थी। शादी के दो साल बाद वह अपनी बेगम को लेने कोटरा गए थे। लौटते समय जश्न की आतिशबाजी के दौरान छोड़ा गया गोला लगने से नवाब जहांगीर खान की मौत हो गई। बेगम ने नवाब की याद में नजीबाबाद के मोजममपुर तेली गढ़ी में चारमीनार नाम का शानदार मकबरा बनवाया। इस मकबरे के चारों ओर चार मीनारें हैं। चारों मीनारों के बीच में बना भव्य गुंबद कभी का ढह गया। बताया जाता है कि इसी गुंबद में नवाब जहांगीर खान की कब्र है।
ताजपुर का चर्च
ताजपुर चर्च का एक दर्शनीय स्थल है। इसका निर्माण 1913 में राजा शिवनाथ सिंह रिख और उनके भाई श्याम सिंह रिख ने अपनी ईसाई पत्नियों मारग्रेट मैरी और विलियन मैरी के लिए कराया था। बाद में दोनों भाई भी धर्म बदलकर ईसाई बन गए थे। शिवनाथ सिंह रिख की मृत्यु के बाद उनका शव इसी गिरजाघर में दफनाया गया था। यह प्रसिद्ध स्थल है। इसकी खूबसूरती देखने के लिए काफी पर्यटक दूर-दूर से आते हैं।
सुलताना का किला
नजीबाबाद के पास सुलताना डाकू के किले के नाम से मशहूर किले को गुलाम कादिर उर्फ नजीबुददौला ने 18 वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के पतन के बाद बनाया था। पहले इस शहर का नाम नजीबुद्दौला ही था जो बाद में नजीबाबाद कहलाने लगा। अंग्रेजों ने इस किले को आपराधिक जाति भातुओं का सुधार गृह बनाया। सुधार गृह की प्रताड़नाओं से आजिज आकर एक युवक विद्रोही हो गया, जो सुलताना के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कांशीवाला
बढ़ापुर क्षेत्र में कांशीवाला का जंगल जैन तीर्थ स्थल के रूप में विकसित हो रहा है। पारसनाथ नाम से विख्यात क्षेत्र में भव्य मंदिर बनाने के साथ ही पुरातत्व महत्व की वस्तुओं का संग्रह है। खेतों में खुदाई के दौरान कई पुरातन प्रतिमाएं निकली, लेकिन प्रशासन के उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण इन प्रतिमाओं को विशिष्ट पहचान नहीं मिल सकी। जैन समाज ने इस क्षेत्र की महत्ता को पहचाना है। इस क्षेत्र के विकास का बीड़ा उठाया । जैन समाज द्वारा सात बीघा भूमि में भव्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। प्रांगण में विशाल धर्मशाला बनाई गई है। मंदिर के एक कक्ष में संग्रहालय बनाया गया है। संग्रहालय में खुदाई के दौरान मिली सामग्रियों का संग्रह किया गया है।
नौलखा
बंगाल विजय के बाद शाहजहां ने जहानाबाद का इलाका अपनी सेना के एक सिपाहसालार शुजात अली को ईनाम में दे दिया। शुजात अली ने बादशाह का सम्मान रखते हुए इस क्षेत्र का नाम जहानाबाद रखा। इसी क्षेत्र में यह नौलखा बाग स्थित है। लगभग दस एकड़ क्षेत्र, चारों ओर मजबूत दीवार और बीस फुट ऊंचे भव्य प्रवेश द्वार लिए इस बाग को शुजात अली के मकबरे के नाम से भी जाना जाता है। शुजात अली के अलावा उनकी पत्नी और दासी के भी मकबरे हैं।

नजीबाबाद -कोटद्वार मार्ग पर महाभारत कालीन नगर मोरध्वज को किला।- फोटो : BIJNOR

राजा का ताजपुर में स्थित चर्च।- फोटो : BIJNOR

नजीबाबाद में चारमीनार नाम का मकबरा।- फोटो : BIJNOR

नजीबाबाद के पास सुलताना डाकू का किला।- फोटो : BIJNOR