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Bijnor News: धामपुर - कार्बेट रिजर्व के 50 साल पूरे, 252 हुई बाघों की संख्या

Sun, 02 Apr 2023 11:42 PM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर Updated Sun, 02 Apr 2023 11:42 PM IST
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Corbett Reserve completes 50 years, number of tigers increased to 252
- 1973 में कालागढ़ के जंगलों में छोड़े गए थे बाघों के जोड़े
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फोटो समाचार
संवाद न्यूज एजेंसी
कालागढ़ (बिजनौर)। कार्बेट टाइगर रिजर्व की स्थापना को 50 वर्ष पूरे हो गए हैं। टाइगर रिजर्व में इस अरसे में बाघों की संख्या 252 से भी अधिक हो गई है। बाघों की बढ़ती संख्या से जहां दुनिया में भारत का नाम रोशन हुआ है, वहीं अब इनकी सुरक्षा व संरक्षण एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रही है।
कार्बेट टाइगर रिजर्व भारत उप महादीप का सबसे पुराना टाइगर रिवर्ज है। 1973 में कालागढ़ के जंगलों में बाघों के जोड़े छोड़े गए थे। उस समय देश में बाघों की संख्या 1827 थी। 50 वर्ष बीतने के बाद कार्बेट टाइगर रिजर्व में बाघों का संरक्षण बाघ परियोजना से किया गया। बाघों के शिकार पर टाइगर रिजर्व बनने के बाद से ही भारत सरकार ने रोक लगा दी थी। 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू कर दिया गया।
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बाघ परियोजना एवं वन्यजीव सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों की वजह से कार्बेट टाइगर रिजर्व के वनों में बाघों का कुनबा लगातार बढ़ता जा रहा है। 2006 की गणना में यहां 160, 2010 में 186, 2014 में 215 एवं 2020 में 252 हो गई। सबसे अधिक बाघ कालागढ़ उप प्रभाग के अंतर्गत दर्ज हैं। बाघों की बढ़ती संख्या एवं उसके लिए किए गए उपायों के कारण कार्बेट टाइगर रिजर्व का नाम दुनिया में बाघों की राजधानी का खिताब पा चुका है।
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वन, वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्बेट टाइगर रिजर्व का नाम दुनिया में किसी परिचय का मौहताज नहीं है। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, एशिया आदि देशों के पर्यावरण विद्धान एवं पर्यटक वन्यजीवों का दीदार करने आते हैं। यहां देहरादून के भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक वन्यजीवों पर शोध करते हैं।


जन सहभागिता से हो सकेगी वन्यजीवों की सुरक्षा
कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डाॅ. धीरज पांडेय का कहना है कि कार्बेट टाइगर रिजर्व का जंगल और वन्यजीव हमारे देश की एक खास विरासत है। इसका संरक्षण विभागीय नियमों एवं योजनाओं के अनुसार किया जा रहा है। इसकी सीमाओं पर बसे गांवों के लोगों की सहभागिता से जीवों की सुरक्षा में मदद मिलती है। ग्रामीणों को रोज़गार मिल रहा है। इन 50 वर्षों के परिणाम अच्छे आ रहे हैं। इस धरोहर को बचाए रखने में जनसहभागिता आवश्यक है।
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