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चकबंदी के 30 साल बाद भी नहीं मिले चक

Wed, 31 Mar 2021 11:55 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 31 Mar 2021 11:55 PM IST
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Chak not found even after 30 years of consolidation in Bijnor
बिजनौर में चकबंदी के 30 साल बाद भी नहीं मिले चक
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बिजनौर। जिले में हुई चकबंदी किसानों की मुसीबत बन गई है। चकबंदी के फेर में दो किसान आत्महत्या भी कर चुके हैं। चकबंदी शुरू होने के दशकों बाद भी किसानों को जमीन पर कब्जा नहीं मिल सका है। किसानों के हवाई चक काट दिए जाते हैं। इसके बाद किसान सालों तक विभाग में केस डालकर चक्कर काटने को मजबूर रहते हैं।
किसानों के जगह जगह बिखरे खेतों को एक जगह लाने और खेतों पर जाने के लिए रास्ते की जगह देने के लिए चकबंदी होती है। सोचने में तो यह अच्छा लगता है, लेकिन चकबंदी की असलियत को वही किसान समझ सकते हैं जो चकबंदी के फेर में फंस जाते हैं। झालू में कई साल पहले चकबंदी हुई तो किसानों के हवाई चक काट दिए गए। किसान अब भी चकबंदी विभाग में चक्कर काट रहे हैं। प्रभावशाली किसानों को मनमर्जी के खेत दिए गए। चकबंदी में कमजोर किसानों की महंगी जमीनों के चक को सड़क से पीछे धकेल दिया जाता है।
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हाल यह रहा कि कई दलाल किसानों से चक दिलाने के नाम पर पैसे लेकर अमीर हो गए। मौजा हल्दौर में साल 1993 से चकबंदी हो रही है, लेकिन अब तक पूरी नहीं हुई। अब तक डोलबंदी नहीं हुई है। डोलबंदी न होने तक चकबंदी पूरी नहीं होती है। 14 मई 2008 को चकबंदी के फेर में हल्दौर थाने के गांव कुम्हारपुरा निवासी अशोक कुमार कलक्ट्रेट में खुद को आग लगाकर जान दे चुका है। मंडावर के गांव राजारामपुर के किसान धर्मवीर ने भी खराब चक देने का विरोध किया था, सुनवाई नहीं तो किसान ने मंडावर थाने में खुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली थी।
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किसान भी हैं जिम्मेदार
चकबंदी प्रक्रिया लटकने में काफी हद तक कुछ किसान भी जिम्मेदार होते हैं। किसान ग्राम समाज की भूमि पर कब्जा किए रहते हैं। चकबंदी में ये जमीन कब्जामुक्त कराई जाती हैं। ऐसे में ये किसान नहीं चाहते हैं कि चकबंदी प्रक्रिया पूरी हो।

चकबंदी से संबंधित कोई शिकायत नहीं आ रही है। जो भी शिकायत आएगी उसका जांच करा समाधान कराया जाएगा। यदि किसी किसान को कोई शिकायत है तो प्रार्थना पत्र दे सकता है। उसका निराकरण कराया जाएगा - विनोद कुमार गौड़, एडीएम प्रशासन।
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