Bijnor: यहां आज भी ट्रैक पर दौड़ता है भाप का इंजन, चीनी मिल की बढ़ा रहा है शान
बिजनौर में रेलवे का यह अतीत अब तक जिंदा है। जी हां यहां आज भी भाप का इंजन ट्रैक पर मालगाड़ी को खींचता है। लगभग 1956 में जर्मन से मंगाया गया था। लेकिन अभी भी सही हालत में है।
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छुक छुक करती ट्रेन चली...यह लाइन बचपन में किताबों में पढ़ी और सुनी। दरअसल, भाप के इंजन से चलने वाली ट्रेन छुक छुक की आवाज निकालती थी। अब भाप के इंजन इतिहास बन चुके हैं। लेकिन बिजनौर में रेलवे का यह अतीत अब तक जिंदा है। जी हां, बिजनौर के स्योहारा में भाप का इंजन अब भी चलता है। हालांकि इसके संचालन का दायरा सिमट कर चीनी मिल और चीनी मिल से रेलवे स्टेशन तक रह गया है।
भारत में चलने वाली पहली रेलगाड़ी को भाप के इंजन से ही चलाया गया, साल 1990 तक यह व्यवस्था चली। इसके बाद धीरे-धीरे पटरियों से भाप के इंजन हटा लिए गए। साल 1971 में इनका निर्माण भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। अब डीजल इंजन भी हटाए जा रहे हैं और दौर आ चला है बिजली से चलने वाले इंजन का।
अब बिजली के इंजन से रेलगाड़ी और मालगाड़ी दौड़ रही हैं। आज की युवा पीढ़ी ने भाप के इंजन से चलने वाली हेरिटेज ट्रेन में ही शायद सफर कर लिया होगा। कालका शिमला और दिल्ली से रेवाड़ी के बीच चलने वाली हेरिटेज ट्रेन को छोड़ दें तो अब देशभर में रेलवे ट्रैक पर भाप के इंजन दिखाई नहीं देंगे।
बिजनौर में एक छोटे से ट्रैक पर भाप का इंजन आज भी दौड़ता है। जो स्योहारा रेलवे स्टेशन से स्योहारा चीनी मिल के अंदर तक जाने वाले ट्रैक पर ही चलता है। चीनी मिल के अधिकारियों ने बताया कि चीनी मिल के गोदामों से जब चीनी को मालगाड़ी में भरकर बाहर भेजा जाता है तो भाप के इंजन का ही प्रयोग होता। रेलवे की ओर से मालगाड़ी के कोच चीनी मिल के बाहर खड़े कर दिए जाते हैं, जिन्हें चीनी मिल का भाप का इंजन अंदर खींच कर ले जाता है। जिनमें चीनी लोड करने के बाद मालगाड़ी को स्टेशन तक छोड़ दिया जाता है।
1956 में जर्मनी से आए थे दो इंजन
साल 1956 में स्योहारा चीनी मिल ने जर्मनी की जंग कंपनी से भाप से चलने वाले दो इंजन खरीदे थे। यह कंपनी अब बंद हो चुकी है। ऐसे में इन इंजन के पार्ट्स भी नहीं मिलते हैं। हालांकि चीनी मिल की वर्कशॉप में पार्ट्स बना लेने के बाद एक इंजन को चलने की स्थिति में बनाकर रखा गया है। हालांकि एक इंजन खराब हो गया था।
1990 तक रेल से ढोया जाता था गन्ना
साल 1990 तक चीनी मिल में ट्रेन से गन्ना ढोया जाता था। इस चीनी मिल के क्रय केंद्र रेलवे ट्रैक के किनारे बने हुए थे। नगीना में रेलवे स्टेशन से दूसरी ओर से गन्ना क्रय केंद्र हुआ करता था। इसके अलावा बुंदकी, फजलपुर और मौजम्मपुर नारायण में भी गन्ना क्रय केंद्र था। तब मालगाड़ी में गन्ना भरकर भाप के इंजन से ही चीनी मिल तक लाया जाता था। चीनी मिल अधिकारियों ने बताया कि कभी रुड़की और लक्सर से भी गन्ना आता था। अब ट्रकों से गन्ना आने लगा तो ट्रेन से गन्ना ढुलाई बंद कर दी गई। इसके साथ ही भाप के इंजनों के परिचालन का दायरा भी सिमट गया।
इंजन काफी पुराना है। लगभग 1956 में जर्मन से मंगाया गया था। लेकिन अभी भी सही हालत में अपना काम कर रहा है। इंजन के सभी पार्ट्स जरूरत पड़ने पर हम अपनी वर्कशॉप में तैयार कर लेते हैं। इसलिए कोई परेशानी नहीं होती है - दिनेश कुमार, जीएम, पावर प्लांट, अवध शुगर मिल स्योहारा