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185 गांव तोड़ना चाहते हैं बिजनौर से नाता
Bijnor
Updated Mon, 14 Apr 2014 05:30 AM IST
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बिजनौर। लोस चुनाव पीक पर चल रहे हैं। बिजनौर जिले की नगीना और इसी जिले से जुड़ी मुरादाबाद सीट पर मतदान होगा। महीनों पहले से इस बार भी जनप्रतिनिधि ग्रामीणाें को उनके क्षेत्र का विकास कराने का वायदा कर रहे हैं। इस तरह के वायदे तो आजादी के बाद से लेकर अब तक हर प्रत्याशी ने किए हैं। विकास के नाम पर वोट लिया, लेकिन आज तक किया कुछ नहीं। यही वजह है कि मुरादाबाद सीट से जुड़े बिजनौर जिले के बढ़ापुर विधानसभा क्षेत्र की 33 ग्राम पंचायतों के 185 गांवों ने बिजनौर जिला ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश से भी अपना नाता तोड़ने का मन मना लिया है। इन्हें अब आस नहीं है नेताओं से। चिकित्सा, शिक्षा, पानी, बिजली ये सारी मूलभूत सुविधाएं इनके लिए सपने से ज्यादा कुछ नहीं है। यहां तक कि पुल व रास्ते भी ग्रामीणों को खुद ही कारसेवा करके बनाने पड़ते हैं। सांसद बदलते हैं, लेकिन समस्या जस की तस। मुरादाबाद क्षेत्र से जुड़े इस इलाके के सांसद पूर्व क्रिकेटर मो. अजहरुद्दीन भी इनकी समस्याएं सुनने नहीं आए और दोबारा चुनाव के समय जनता उनसे सवाल पूछती तो इस बार उन्होंने संसदीय क्षेत्र ही बदल लिया।
ये गांव तोड़ना चाहते हैं बिजनौर से नाता
अफजलगढ़ क्षेत्र में उत्तराखंड बार्डर पर बसी कल्लूवाला, फतेहपुर धारा, इस्लामनगर, तुरतपुर, रसूलाबाद, भोगपुर, कुंआखेड़ा खदरी, अलवरपुर चंडिका, रायपुर, चौहड़वाला, सुक्खेवाला प्रेमनगर, मोदीवाला, मीरापुर, मोटा ढांग, तेलीपाड़ा, देवानंदपुर गढ़ी, मुकरनपुर गढ़ी, नारायणवाला, भिक्कावाला, रेहड़, कादराबाद, वियजपुर, नवाबपुर, खेड़ीखत्ता, भूतपूर्व सैनिकोें की 12 कालोनियां समेत 33 ग्राम पंचायतों के 185 गांव के लोग लंबे समय से उत्तराखंड के नजदीकी जिले पौड़ी में शामिल होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मदन सिंह रावत का कहना है कि उनका क्षेत्र यूपी उत्तराखंड बार्डर पर है। जनप्रतिनिधि विकास पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। मुरादाबाद के सांसद अजहरुद्दीन तो क्षेत्र में आए ही नहीं है। सभी सड़कें टूटी पड़ी हैं। बिजनौर वहां से 75 किलोमीटर दूर है। टूटी सड़कों से होकर जिला मुख्यालय पर आकर लौटने में रात हो जाती है। क्षेत्र में एक भी सरकारी डिग्री कालेज नहीं है। सरकारी इंटर कालेज भी एक ही है। बच्चों को धामपुर 40 किलोमीटर का सफर करके पढ़ाई के लिए आना पड़ता है। स्कूल नहीं होने के कारण ज्यादातर लड़कियां उच्च शिक्षा नहीं ले पाती हैं। बिजली भी महज पांच घंटे ही मिलती है। अगर लाइन खराब हो जाए तो कई कई दिन तक गांवों में अंधेरा रहता है। कुछ जगहोें पर उप स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन उनमें चिकित्सक नहीं हैं। क्षेत्र में उद्योग नहीं है, युवा बेरोजगार हैं। रेहड़ के गंगाराम, बिट्टू व गौरव का कहना है कि क्षेत्र में यातायात की सुविधा नहीं है। सांसद जी ने जनता की कोई सुध नहीं ली, वे पिकनिक टूर की तरह ही यहां एक दो बार आए।
पुल और रास्ता खुद ही बनवाया
रामगंगा पर पुल बनवाने के लिए लंबे समय से मांग होती रही, लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि ने पुल नहीं बनवाया। कुंवर सिंह कैथ बताते हैं कि वर्ष 1998 में पंजाब के समाज सेवी चरण सिंह की मदद और कार सेवा से ग्रामीणों ने यहां पर पुल बनाया। भूतपूर्व सैनिकों की कालोनी पर जाने के लिए भी कच्चा मार्ग है। यह भी ग्रामीणों ने ही बनाया है। कल्लूवाला व भिक्कावाला के बीच बनैली नदी पर पुल बन रहा है। वह पुल भी राष्ट्रपति की अनुकंपा से ही बनाया जा रहा है। बलविंदर सिंह बताते हैं कि राष्ट्रपति से गुहार लगाने पर यह पुल बना है। पुल बनने के बाद ग्रामीण यहां से टिहरी डैम, कालागढ़, कोटद्वार जा सकेंगे। पुल निर्माण में जनप्रतिनिधियों का कोई योगदान नहीं है। भूतपूर्व सैनिकों की कालोनी के लिए वर्ष 1965 में तीन टंकियां बनाईं, लेकिन एक टंकी तभी से फेल है। जमीन पथरीली होने के कारण हैंडपंप यहां पर लगवाना आसान काम नहीं है। ग्रामीणों को पेयजल के लिए भी परेशानी झेलनी पड़ती है।
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इन रास्तों का हो उद्धार
बढ़ापुर विधान सभा क्षेत्र में तेलीपाड़ा गांव बिल्कुल बॉर्डर पर है। पूरी विधानसभा क्षेत्र घूमने के लिए उत्तराखंड से होकर क्षेत्र में आना पड़ता है। मदन सिंह रावत बताते हैं कि अफजलगढ़ से बढ़ापुर होते हुए तेलीपाड़ा व कादराबाद से तेलीपाड़ा के लिए ये दो मार्ग बनाने की मांग लंबे समय से हो रही है, लेकिन मार्ग नहीं बने। एक गांव से दूसरे गांव तक जाने के लिए पक्के मार्ग बनें। टूटी सड़कों की मरम्मत हो।
जंगली जानवर भी बने मुसीबत
बार्डर क्षेत्र कार्बेट टाइगर रिजर्व एरिया से सटा हुआ है। यहां पर जंगली जानवरों की आवाजाही रहती है। जंगली जानवर फसल तबाह करते हैं। किसान फसलों के मुआवजे की मांग उत्तराखंड सरकार से करते हैं तो वहां की सरकार यूपी सरकार की ओर से प्रस्ताव भिजवाने के लिए कहती है। यूपी सरकार किसानों को मुआवजा दिलाने से हाथ खड़ा कर लेती है।
अजहरुद्दीन भी नहीं बदल पाए तस्वीर
अफजलगढ़ क्षेत्र में जिले के बार्डर पर बसे इन गांवों में बिजनौर से अलग होने के लिए आंदोलन की चिंगारी दस साल पहले लगी, जो अब तेजी के साथ धधक रही है। बिजनौर को छोड़ने की मुख्य वजह यहां के बाशिंदों को बिजली, सड़क, शिक्षा और चिकित्सा दिलाने में जनप्रतिनिधियों की नाकामी है।
कब कब हुए आंदोलन
इसके लिए 2002 में सीमावर्ती संघर्ष समिति बनाई गई। अब तक 20 आंदोलन हो चुके हैं। इस समिति के संयोजक विजयपुर के बाशिंदे मदन सिंह रावत के नेतृत्व में ग्रामीणों का प्रतिनिधि मंडल उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत, पूर्व सीएम एनडी तिवारी, पूर्व सीएम निशंक पोखरियाल समेत अब तक बने सभी मुख्यमंत्रियों से मिल चुके हैं और अपने आप को उत्तराखंड में शामिल करने की मांग लगातार करते चले आ रहे हैं। 14 जून 2010 को कोटद्वार में, 16 अगस्त 2010 को कादराबाद में, इसके बाद अफजलगढ़ से जसपुर तक 20 किलोमीटर रैली निकाली गई। अब फिर से ग्रामीण आंदोलन को लेकर लामबंद हो रहे हैं।
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ये गांव तोड़ना चाहते हैं बिजनौर से नाता
अफजलगढ़ क्षेत्र में उत्तराखंड बार्डर पर बसी कल्लूवाला, फतेहपुर धारा, इस्लामनगर, तुरतपुर, रसूलाबाद, भोगपुर, कुंआखेड़ा खदरी, अलवरपुर चंडिका, रायपुर, चौहड़वाला, सुक्खेवाला प्रेमनगर, मोदीवाला, मीरापुर, मोटा ढांग, तेलीपाड़ा, देवानंदपुर गढ़ी, मुकरनपुर गढ़ी, नारायणवाला, भिक्कावाला, रेहड़, कादराबाद, वियजपुर, नवाबपुर, खेड़ीखत्ता, भूतपूर्व सैनिकोें की 12 कालोनियां समेत 33 ग्राम पंचायतों के 185 गांव के लोग लंबे समय से उत्तराखंड के नजदीकी जिले पौड़ी में शामिल होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मदन सिंह रावत का कहना है कि उनका क्षेत्र यूपी उत्तराखंड बार्डर पर है। जनप्रतिनिधि विकास पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। मुरादाबाद के सांसद अजहरुद्दीन तो क्षेत्र में आए ही नहीं है। सभी सड़कें टूटी पड़ी हैं। बिजनौर वहां से 75 किलोमीटर दूर है। टूटी सड़कों से होकर जिला मुख्यालय पर आकर लौटने में रात हो जाती है। क्षेत्र में एक भी सरकारी डिग्री कालेज नहीं है। सरकारी इंटर कालेज भी एक ही है। बच्चों को धामपुर 40 किलोमीटर का सफर करके पढ़ाई के लिए आना पड़ता है। स्कूल नहीं होने के कारण ज्यादातर लड़कियां उच्च शिक्षा नहीं ले पाती हैं। बिजली भी महज पांच घंटे ही मिलती है। अगर लाइन खराब हो जाए तो कई कई दिन तक गांवों में अंधेरा रहता है। कुछ जगहोें पर उप स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन उनमें चिकित्सक नहीं हैं। क्षेत्र में उद्योग नहीं है, युवा बेरोजगार हैं। रेहड़ के गंगाराम, बिट्टू व गौरव का कहना है कि क्षेत्र में यातायात की सुविधा नहीं है। सांसद जी ने जनता की कोई सुध नहीं ली, वे पिकनिक टूर की तरह ही यहां एक दो बार आए।
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पुल और रास्ता खुद ही बनवाया
रामगंगा पर पुल बनवाने के लिए लंबे समय से मांग होती रही, लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि ने पुल नहीं बनवाया। कुंवर सिंह कैथ बताते हैं कि वर्ष 1998 में पंजाब के समाज सेवी चरण सिंह की मदद और कार सेवा से ग्रामीणों ने यहां पर पुल बनाया। भूतपूर्व सैनिकों की कालोनी पर जाने के लिए भी कच्चा मार्ग है। यह भी ग्रामीणों ने ही बनाया है। कल्लूवाला व भिक्कावाला के बीच बनैली नदी पर पुल बन रहा है। वह पुल भी राष्ट्रपति की अनुकंपा से ही बनाया जा रहा है। बलविंदर सिंह बताते हैं कि राष्ट्रपति से गुहार लगाने पर यह पुल बना है। पुल बनने के बाद ग्रामीण यहां से टिहरी डैम, कालागढ़, कोटद्वार जा सकेंगे। पुल निर्माण में जनप्रतिनिधियों का कोई योगदान नहीं है। भूतपूर्व सैनिकों की कालोनी के लिए वर्ष 1965 में तीन टंकियां बनाईं, लेकिन एक टंकी तभी से फेल है। जमीन पथरीली होने के कारण हैंडपंप यहां पर लगवाना आसान काम नहीं है। ग्रामीणों को पेयजल के लिए भी परेशानी झेलनी पड़ती है।
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इन रास्तों का हो उद्धार
बढ़ापुर विधान सभा क्षेत्र में तेलीपाड़ा गांव बिल्कुल बॉर्डर पर है। पूरी विधानसभा क्षेत्र घूमने के लिए उत्तराखंड से होकर क्षेत्र में आना पड़ता है। मदन सिंह रावत बताते हैं कि अफजलगढ़ से बढ़ापुर होते हुए तेलीपाड़ा व कादराबाद से तेलीपाड़ा के लिए ये दो मार्ग बनाने की मांग लंबे समय से हो रही है, लेकिन मार्ग नहीं बने। एक गांव से दूसरे गांव तक जाने के लिए पक्के मार्ग बनें। टूटी सड़कों की मरम्मत हो।
जंगली जानवर भी बने मुसीबत
बार्डर क्षेत्र कार्बेट टाइगर रिजर्व एरिया से सटा हुआ है। यहां पर जंगली जानवरों की आवाजाही रहती है। जंगली जानवर फसल तबाह करते हैं। किसान फसलों के मुआवजे की मांग उत्तराखंड सरकार से करते हैं तो वहां की सरकार यूपी सरकार की ओर से प्रस्ताव भिजवाने के लिए कहती है। यूपी सरकार किसानों को मुआवजा दिलाने से हाथ खड़ा कर लेती है।
अजहरुद्दीन भी नहीं बदल पाए तस्वीर
अफजलगढ़ क्षेत्र में जिले के बार्डर पर बसे इन गांवों में बिजनौर से अलग होने के लिए आंदोलन की चिंगारी दस साल पहले लगी, जो अब तेजी के साथ धधक रही है। बिजनौर को छोड़ने की मुख्य वजह यहां के बाशिंदों को बिजली, सड़क, शिक्षा और चिकित्सा दिलाने में जनप्रतिनिधियों की नाकामी है।
कब कब हुए आंदोलन
इसके लिए 2002 में सीमावर्ती संघर्ष समिति बनाई गई। अब तक 20 आंदोलन हो चुके हैं। इस समिति के संयोजक विजयपुर के बाशिंदे मदन सिंह रावत के नेतृत्व में ग्रामीणों का प्रतिनिधि मंडल उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत, पूर्व सीएम एनडी तिवारी, पूर्व सीएम निशंक पोखरियाल समेत अब तक बने सभी मुख्यमंत्रियों से मिल चुके हैं और अपने आप को उत्तराखंड में शामिल करने की मांग लगातार करते चले आ रहे हैं। 14 जून 2010 को कोटद्वार में, 16 अगस्त 2010 को कादराबाद में, इसके बाद अफजलगढ़ से जसपुर तक 20 किलोमीटर रैली निकाली गई। अब फिर से ग्रामीण आंदोलन को लेकर लामबंद हो रहे हैं।