फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bijnor News ›   41 years spent in two-hour sentence

बिजनौर की शान रहा पुस्तकालय खो रहा अपनी पहचान

Tue, 26 Oct 2021 12:27 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 26 Oct 2021 12:27 AM IST
विज्ञापन
41 years spent in two-hour sentence
दो घंटे की सजा में बिता दिए 41 साल
विज्ञापन

बिजनौर। कभी आपने सोचा है, दो घंटे की सजा मिली हो और खुशी-खुशी उसे 41 साल काटा जाए। जी हां सजा भी ऐसी नहीं, बल्कि किताबों के बीच रहने की। यह रोचक कहानी है जिला पुस्तकालय में रहने वाले छोटेलाल भटनागर की। कलक्ट्रेट में रिकॉर्ड लिफ्टर रहे, तत्कालीन डीएम से नोकझोंक हुई तो सजा के तौर पर शाम को पांच से सात बजे तक पुस्तकालय में अतिरिक्त ड्यूटी लगा दी गई। उसके बाद न जाने कितने डीएम आए और चले गए, लेकिन 41 सालों से आज भी छोटेलाल भटनागर किताबों के बीच उस सजा को पुरस्कार समझकर काट रहे हैं। आइये छोटेलाल से ही जानते हैं कि आखिर कैसे शाम के दो घंटे की सजा में उन्होंने 41 साल काट दिए।
बिजनौर के मोहल्ला चाहशीरी बी निवासी छोटेलाल भटनागर (75) कलक्ट्रेट बिजनौर में रिकॉर्ड लिफ्टर के पद पर तैनात थे। सन 1980 में तत्कालीन डीएम एम रामचंद्रम से किसी बात को लेकर नोकझोंक हो गई। डीएम साहब ने छोटेलाल को सजा के तौर पर कलक्ट्रेट का काम निपटने के बाद रोज शाम को पांच से सात बजे तक जिला पुस्तकालय में बैठने और वहां किताबों का हिसाब किताब रखने की सजा दे दी। छोटेलाल भटनागर कहते हैं कि शुरू में लगा कि गलत हो गया, लेकिन धीरे-धीरे किताबों से ऐसी दोस्ती हुई कि यह सजा पुरस्कार लगने लगी। उन्होंने बताया कि मैं रोज कलक्ट्रेट का काम निपटाता और शाम को पुस्तकालय आकर किताबों के बीच बैठता। कुछ किताबें पढ़ता, तो कुछ अनुभवों को कागजों पर उतारता।
विज्ञापन

सन 2006 में कलक्ट्रेट से सेवानिवृत्त हो गया तो पूरा समय पुस्तकालय को समर्पित कर दिया। छोटेलाल ने बताया कि आज 75 साल की उम्र हो गई, लेकिन आज भी सुबह नौ बजे पुस्तकालय आकर बैठ जाता हूं और शाम तक यहीं रहता हूं। (संवाद)
विज्ञापन
विज्ञापन

कभी हाथ जोड़कर पाठकों को भेजते थे घर
छोटेलाल भटनागर ने कहा कि सन 2000 से पहले पुस्तकालय आज के बिजनौर क्लब के भवन में चलता था। इसके बाद इसे वर्तमान में जो हॉल है, वहां शिफ्ट कर दिया गया। 40 साल पहले 300 के आसपास सदस्य होते थे, जो देर रात तक यहां बैठकर किताबें पढ़ते रहते थे। देररात होने पर पाठकों के आगे हाथ जोड़ने पड़ते थे कि घर चले जाओ और आज एक भी सदस्य नहीं बचा। कुछ युवक-युवतियां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने जरूर आ जाते हैं। यहां इस समय करीब चार हजार से ज्यादा किताबें हैं, लेकिन व्यवस्था ठीक न होने से हालात बदहाल है।
किरायेदारों के भवन चमक रहे, मालिक बदहाल
जिला पुस्तकालय के संयुक्त सचिव एसएस विश्नोई कहते हैं कि बिजनौर क्लब, सीतापुर नेत्र चिकित्सालय और बाहर की ओर बनी दुकानें, सभी जिला पुस्तकालय की प्रापर्टी है। बिजनौर क्लब भी यहां किरायेदार की हैसियत से हैं। किरायेदारों के भवन चमक रहे हैं, जबकि मालिक पुस्तकालय के भवन और यहां के हालातों की व्यवस्था किसी से छिपी नहीं है।

दस से ज्यादा अखबार आते हैं, अब नहीं आती पत्रिका
जिला पुस्तकालय में आज भी दस से ज्यादा हिंदी, अंग्रेजी के अखबार आते हैं, जिन्हें पढ़ने के लिए कुछ लोग सुबह आते हैं। पहले कई पत्रिकाएं भी आती थीं, जिन्हें पढ़ने के लिए महिलाओं का एक बड़ा पाठक वर्ग आता था। पत्रिका बंद होने से पाठकों की संख्या घट गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed