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टूट रहा 27 दिनों की तरावीह का सिलसिला
Updated Mon, 28 May 2018 01:48 AM IST
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अमरोहा। अब इसे भाग दौड़ भरी जिंदगी का असर कहें या कारोबार की मजबूरी.. माह-ए-रमजान में 27 दिनों की नमाज-ए-तरावीह का सिलसिला टूटने लगा है। नमाज-ए-तरावीह पांच, सात, दस और पंद्रह दिनों में सिमटने लगी है। शहर की गिनी चुनी मस्जिदों में ही 27 दिन तरावीह पढ़ी जाती है।
बाजार और कारोबार का असर अब माह-ए-रमजान पर भी दिखने लगा है। मुकद्दस रमजान का दूसरा अशरा चल रहा है। इस अशरे का अभी एक दिन ही गुजरा है। लेकिन कुछ मस्जिदों में नमाज-ए-तरावीह पूरी भी हो गई है। इन मस्जिदों में सात और दस दिनों में ही कुरान मुकम्मल हो गया। अब इन मस्जिदों में छोटी तरावीह पढ़ी जा रही है। वहीं इक्कीस रमजान तक शहर की अधिकांश मस्जिदों में नमाज-ए-तरावीह पूरी हो चुकी होगी। यहां पंद्रह और बीस दिनों की नमाज-ए-तरावीह पढ़ी जा रही है। शहर की कुछ ही मस्जिदों में 27 दिनों की तरावीह पढ़ी जा रही है। मदरसा जामिया नूरिया अशरफुल उलूम के मोहतमिम मौलाना तय्यब कादिरी नईमी ने बताया कि कम दिनों की तरावीह का रिवाज बनता जा रहा है, जो बेहतर नहीं है। मुकद्दस रमजान में पूरे महीने नमाज और तरावीह का एहतिमाम करना चाहिए। कुरान-ए-पाक ऐसे पढ़ने चाहिए कि सुनने वाला समझ सके। माह-ए-रमजान का एक-एक लम्हा कीमती है। इसे पूरी शिद्दत के साथ इबादत में गुजारना चाहिए। पूरे महीने तरावीह की नमाज पढ़नी चाहिए।
रमजान के चांद से ईद के चांद तक होती है तरावीह
अमरोहा। रमजान का चांद दिखने के साथ ही मस्जिदों में नमाज-ए-तरावीह शुरू हो जाती है। ये सिलसिला ईद का चांद दिखने के साथ टूटता है। पूरे मुकद्दस महीने में नमाज-ए-तरावीह में कुरान सुनना चाहिए। शहर की मस्जिदों में तरावीह शुरू तो एक साथ होती है लेकिन मुकम्मल अलग-अलग दिनों में होती है।
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बाजार और कारोबार का असर अब माह-ए-रमजान पर भी दिखने लगा है। मुकद्दस रमजान का दूसरा अशरा चल रहा है। इस अशरे का अभी एक दिन ही गुजरा है। लेकिन कुछ मस्जिदों में नमाज-ए-तरावीह पूरी भी हो गई है। इन मस्जिदों में सात और दस दिनों में ही कुरान मुकम्मल हो गया। अब इन मस्जिदों में छोटी तरावीह पढ़ी जा रही है। वहीं इक्कीस रमजान तक शहर की अधिकांश मस्जिदों में नमाज-ए-तरावीह पूरी हो चुकी होगी। यहां पंद्रह और बीस दिनों की नमाज-ए-तरावीह पढ़ी जा रही है। शहर की कुछ ही मस्जिदों में 27 दिनों की तरावीह पढ़ी जा रही है। मदरसा जामिया नूरिया अशरफुल उलूम के मोहतमिम मौलाना तय्यब कादिरी नईमी ने बताया कि कम दिनों की तरावीह का रिवाज बनता जा रहा है, जो बेहतर नहीं है। मुकद्दस रमजान में पूरे महीने नमाज और तरावीह का एहतिमाम करना चाहिए। कुरान-ए-पाक ऐसे पढ़ने चाहिए कि सुनने वाला समझ सके। माह-ए-रमजान का एक-एक लम्हा कीमती है। इसे पूरी शिद्दत के साथ इबादत में गुजारना चाहिए। पूरे महीने तरावीह की नमाज पढ़नी चाहिए।
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रमजान के चांद से ईद के चांद तक होती है तरावीह
अमरोहा। रमजान का चांद दिखने के साथ ही मस्जिदों में नमाज-ए-तरावीह शुरू हो जाती है। ये सिलसिला ईद का चांद दिखने के साथ टूटता है। पूरे मुकद्दस महीने में नमाज-ए-तरावीह में कुरान सुनना चाहिए। शहर की मस्जिदों में तरावीह शुरू तो एक साथ होती है लेकिन मुकम्मल अलग-अलग दिनों में होती है।
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