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मौसम की मार, तराई क्षेत्र में सब्जी की फसल हुई बर्बाद
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सीतामढ़ी गंगा के किनारे कोहड़ा की खेती दिखाता किसान।
- फोटो : BHADOHI
सीतामढ़ी। मौसम की मार ने गंगा कछार में बड़े पैमाने पर सब्जी की खेती करने वाले किसानों की कमर तोड़ दी है। गुजरे 10 दिनों से बर्फीली हवाओं के साथ लुढ़के पारे, कोहरे और पाले से कोनिया क्षेत्र के गंगा किनारे करैला, कोहड़ा, नेनुआ, लौकी, बजरबट्टू आदि सब्जियों की तैयार फसल को बर्बाद कर दिया है। किसानों को पूंजी निकालना भी मुश्किल हो गया है।
मोटी पूंजी और दिन रात की कड़ी मेहनत के बाद तैयार फसल पर मौसम और अज्ञात रोग का कहर पड़ा है। कोनिया के धनतुलसी, गजाधरपुर, हरिरामपुर, भुर्रा, डीघ सहित कई गांवों के गंगा के कछार में सैकड़ों बीघे भूमि पर विभिन्न प्रकार की सब्जियों की खेती कर किसान अच्छा मुनाफा कमाते हैं। इस बार जब सब्जी तैयार हो गई और ताजी सब्जियां निकलने लगीं उसी वक्त बेहद ठंड मौसम, पाला और रोगों के कहर से देखते ही देखते तैयार फसल पीली पड़ने लगी। किसान दवाओं का भी छिड़काव किए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। तैयार सब्जियां बर्बाद हो गईं। पिछले वर्ष से ही सब्जी की खेती करने वाले किसानों को मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले सीजन में कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण किसान अपनी सब्जियों को थोक मंडियों तक नहीं ले जा पाए थे। साथ ही सब्जियों की कीमतें भी काफी कम थीं, क्योंकि लगन के सीजन में शादी विवाह आदि मांगलिक कार्यक्रम भी स्थगित हो गए थे।
अब लागत निकालना भी मुश्किल
सीतामढ़ी। गंगा कछार में सब्जी की खेती में कड़ी मेहनत और मोटी पूंजी लगती है। अगर फसल और मौसम अच्छा रहा तो पैदावार काफी अच्छी होती है, जिससे बेहतर मुनाफा होता है। भुर्रा गांव के युवा किसान दृष्टद्युम्न तिवारी ने बताया कि उन्होंने पांच बीघे तरी में करैला, कोहड़ा, नेनुआ, बजरबट्टू की खेती की। इसमें लगभग एक लाख रुपये का खर्च आया। फसल तैयार हुई। ताजी सब्जियां निकलने लगीं। इसी बीच मौसम की मार और रोगों के प्रकोप से पूरी खेती बर्बाद हो गई। गजाधारपुर के किसान कुंदन सिंह ने पांच बीघे, भुर्रा के किसान अनिल सिंह 15 बीघे के अलावा धनतुलसी केे प्रेमसागर, कलयुग माझी, मुन्नू माझी आदि किसानों ने गंगा के कछार में दिन रात मेहनत कर सब्जी की खेती कर अच्छी कमाई का सपना संजोया था, लेकिन फसल बर्बाद होने से अब पूंजी भी डूबने की आशंका से किसान परेसान हैं। किसानों के अनुसार सब्जी की खेती में 25 से 30 हजार रुपये प्रति बीघे का खर्च आता है। यहां की सब्जियां पूर्वांचल के विभिन्न मंडियों में भेजी जाती है।
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मोटी पूंजी और दिन रात की कड़ी मेहनत के बाद तैयार फसल पर मौसम और अज्ञात रोग का कहर पड़ा है। कोनिया के धनतुलसी, गजाधरपुर, हरिरामपुर, भुर्रा, डीघ सहित कई गांवों के गंगा के कछार में सैकड़ों बीघे भूमि पर विभिन्न प्रकार की सब्जियों की खेती कर किसान अच्छा मुनाफा कमाते हैं। इस बार जब सब्जी तैयार हो गई और ताजी सब्जियां निकलने लगीं उसी वक्त बेहद ठंड मौसम, पाला और रोगों के कहर से देखते ही देखते तैयार फसल पीली पड़ने लगी। किसान दवाओं का भी छिड़काव किए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। तैयार सब्जियां बर्बाद हो गईं। पिछले वर्ष से ही सब्जी की खेती करने वाले किसानों को मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले सीजन में कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण किसान अपनी सब्जियों को थोक मंडियों तक नहीं ले जा पाए थे। साथ ही सब्जियों की कीमतें भी काफी कम थीं, क्योंकि लगन के सीजन में शादी विवाह आदि मांगलिक कार्यक्रम भी स्थगित हो गए थे।
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अब लागत निकालना भी मुश्किल
सीतामढ़ी। गंगा कछार में सब्जी की खेती में कड़ी मेहनत और मोटी पूंजी लगती है। अगर फसल और मौसम अच्छा रहा तो पैदावार काफी अच्छी होती है, जिससे बेहतर मुनाफा होता है। भुर्रा गांव के युवा किसान दृष्टद्युम्न तिवारी ने बताया कि उन्होंने पांच बीघे तरी में करैला, कोहड़ा, नेनुआ, बजरबट्टू की खेती की। इसमें लगभग एक लाख रुपये का खर्च आया। फसल तैयार हुई। ताजी सब्जियां निकलने लगीं। इसी बीच मौसम की मार और रोगों के प्रकोप से पूरी खेती बर्बाद हो गई। गजाधारपुर के किसान कुंदन सिंह ने पांच बीघे, भुर्रा के किसान अनिल सिंह 15 बीघे के अलावा धनतुलसी केे प्रेमसागर, कलयुग माझी, मुन्नू माझी आदि किसानों ने गंगा के कछार में दिन रात मेहनत कर सब्जी की खेती कर अच्छी कमाई का सपना संजोया था, लेकिन फसल बर्बाद होने से अब पूंजी भी डूबने की आशंका से किसान परेसान हैं। किसानों के अनुसार सब्जी की खेती में 25 से 30 हजार रुपये प्रति बीघे का खर्च आता है। यहां की सब्जियां पूर्वांचल के विभिन्न मंडियों में भेजी जाती है।
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