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अधूरी रह गई परिवार के लिए सहारा बनने की ललक
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सूरत से लौटे सोनू व आजाद। बीच में खड़े हैं आजाद के पिता बबलू।
- फोटो : BHADOHI
भदोही। लगभग पांच माह पूर्व 20 वर्षीय आजाद व उसका दोस्त सोनू भदोही से जब सूरत के लिए निकले थे तो उनकी आंखों में एक चमक थी। घर परिवार के लिए सहारा बनने की ललक थी। तीन माह तक सबकुछ ठीक ठाक चला। वे शायद खुद को सूरत में व्यवस्थित करने की दिशा में बढ़ रहे थे कि तभी कोरोना का ऐसा संकट आया कि उनके सपनों को तार तार कर गया। नतीजा यह हुआ कि दो महीने से भी अधिक समय सूरत में बदहाली में गुजारने के बाद दोनों बृहस्पतिवार को घर लौट आए।
आजाद के पिता बबलू दोनों को लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आए थे। उन्होंने बताया कि घर की माली हालत देख उनका पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगा। किसी संबंधी ने बता दिया कि सूरत में अच्छा काम मिल सकता है तो दोनों सूरत चले गए। लेकिन मुझे नहीं पता था कि वे अपने अपने घरवालों पर बोझ बनने के लिए सूरत जा रहे हैं। बकौल आजाद सूरत में रेडिमेड कपड़ों की फैक्ट्री में काम मिल गया था। बताया धीरे धीरे वे अपने काम में माहिर भी हो चले थे। मेहनताना भी अच्छा मिल जाता था सोच लिया था कि अब सूरत में ही भविष्य ढूंढूंगा लेकिन तभी कोरोना के कहर से पूरी जिंदगी ही बोझिल हो गई। बताया कि एक पैसा तो घर भेजा नहीं। ऊपर से घर वालों से ही खर्च मंगा कर वहां दो महीने बिताए।
22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दिन ही भविष्य अंधकारमय महसूस हो गया था। हुआ भी वही। वहां से चाह कर भी हम लोग लौट नहीं सके। काम भी बंद था। जो पूंजी थी वह भी खत्म हो गई और घर लौटने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो पिता को फोन कर पैसे मंगवाए। सोनू ने बताया कि हम लोगों ने ट्रेन से आने के लिए एक व्यक्ति को दो टिकट के लिए 16 सौ रुपये भी दिए लेकिन संयोग से ट्रेन चली ही नहीं और हमारा रुपया वापस हो गया। इसके बाद दोबारा ट्रेन चली तो नि:शुल्क मुगलसराय तक आए जहां से राजकीय बस ने भदोही पहुंचाया। फिलहाल घर वालों के बीच आकर दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं है। घर वाले भी अपने उन्हें देख कर प्रसन्न हो उठे।
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आजाद के पिता बबलू दोनों को लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आए थे। उन्होंने बताया कि घर की माली हालत देख उनका पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगा। किसी संबंधी ने बता दिया कि सूरत में अच्छा काम मिल सकता है तो दोनों सूरत चले गए। लेकिन मुझे नहीं पता था कि वे अपने अपने घरवालों पर बोझ बनने के लिए सूरत जा रहे हैं। बकौल आजाद सूरत में रेडिमेड कपड़ों की फैक्ट्री में काम मिल गया था। बताया धीरे धीरे वे अपने काम में माहिर भी हो चले थे। मेहनताना भी अच्छा मिल जाता था सोच लिया था कि अब सूरत में ही भविष्य ढूंढूंगा लेकिन तभी कोरोना के कहर से पूरी जिंदगी ही बोझिल हो गई। बताया कि एक पैसा तो घर भेजा नहीं। ऊपर से घर वालों से ही खर्च मंगा कर वहां दो महीने बिताए।
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22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दिन ही भविष्य अंधकारमय महसूस हो गया था। हुआ भी वही। वहां से चाह कर भी हम लोग लौट नहीं सके। काम भी बंद था। जो पूंजी थी वह भी खत्म हो गई और घर लौटने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो पिता को फोन कर पैसे मंगवाए। सोनू ने बताया कि हम लोगों ने ट्रेन से आने के लिए एक व्यक्ति को दो टिकट के लिए 16 सौ रुपये भी दिए लेकिन संयोग से ट्रेन चली ही नहीं और हमारा रुपया वापस हो गया। इसके बाद दोबारा ट्रेन चली तो नि:शुल्क मुगलसराय तक आए जहां से राजकीय बस ने भदोही पहुंचाया। फिलहाल घर वालों के बीच आकर दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं है। घर वाले भी अपने उन्हें देख कर प्रसन्न हो उठे।
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