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रहमतों, बरकतों और मगफिरत का महीना है माह-ए-रमजान : मो. फैसल

Tue, 24 Feb 2026 01:27 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 24 Feb 2026 01:27 AM IST
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It is the month of Ramadan, a month of blessings, prosperity, and forgiveness: Md. Faisal
मौ.फैसल अशर्फी।स्रोत-स्वयं - फोटो : kathua news
भदोही। इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है माह-ए-रमजान। इस महीने को रहमतों, बरकतों और मगफिरत (माफी) का महीना कहा जाता है। इसका कारण यह है कि इसी मुकद्दस महीने में मुसलमानों की धार्मिक किताब कुरान शरीफ नाजिल हुई। इस्लाम धर्म के पांच बुनियादी स्तंभ अर्थात तौहीद, नमाज, रोजा, हज और जकात हैं कुरआन में ही लिखी हुई हैं। इसी पाक महीने मे ही रोजा रखा जाता है। ये बातें इन दिनों मस्जिदों में पेश इमाम अपने हर तकरीर में बयान कर रहे हैं।
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मुसलमानों पर पांच वक्त की नमाज पढ़ने को अनिवार्य किया गया है। जबकि माह-ए-रमजान में रात की नमाज के बाद तरावीह पढ़ना भी सुन्नत है। रमजान में रोजा रखना हर व्यस्क मुसलमान के लिए जरूरी करार दिया गया है। बीमारों को छूट दी गई है। रोजा इफ्तार सामूहिक रूप से करने की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। इस पूरे महीने कुरआन पढ़ते हुए सुनने की भी हिदायत की गई है। इसे ही तरावीह कहा गया है जो आज नगर की विभिन्न मस्जिदों में चल रही है। भदोही नगर के मर्यादपट्टी स्थित मदरसा शमसिया तेगिया के प्रधानाचार्य मो. फैसल अशर्फी ने कहा कि इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ल. ने रमजान को बहुत ही रहमतों, बरकतों और माफी वाला महीना बताया है। कहा कि इस्लाम धर्म सामाजिक समरसता का संदेश देता है। समाज के निर्धनों, असहायों, यतीमों और मजबूर लोगों की मदद करने को कहा गया है जो जकात की शक्ल में वितरित किया जाता है। मौलाना ने बताया कि हालांकि जकात साल में कभी भी बांटा जा सकता है लेकिन अधिकतर लोग रमजान के महीने में जकात बांटते हैं वह इसलिए कि गरीब लोगों की ईद भी अच्छी तरह से खुशी के साथ बीत सके।
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तुम जमीन वालों पर रहम करो, आसमान वाला तुम पर रहम फरमाएगा
मौलाना ने बताया कि हजरत मोहम्मद सल्ल की हदीस है, वे लोगों से कहा करते थे कि तुम जमीन वालों पर रहम करो- आसमान वाला तुम पर रहम फरमाएगा। नबी सल्ल. फरमाया कि जो लोग दूसरों पर रहम नहीं करते, उन पर अल्लाह भी रहम नहीं करता। मौलाना बताते हैं कि नबी का फरमान है कि हर बड़े को छोटों पर रहम करना चाहिए जो ऐसा नहीं करता वह अल्लाह की रहमतों से खारिज हो जाता है।
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