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ज्ञानपुर तहसील क्षेत्र के दर्जनों तालाबों पर कब्जा
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ज्ञानपुर। डीघ विकास खंड के 99 गांवों में सैकड़ों तालाबों का अस्तित्व राजस्व विभाग की मिलीभगत से खतरे में पड़ गया है। तहसील कर्मियों की कृपा से तालाबों की जमीन पर धड़ल्ले से अतिक्रमण हो रहा है। विवादों में घिरे लेखपालों और कानूनगो की तैनाती जानबूझ कर उन्हीं गांवों में कर दी जाती है, जहां वह पहले से ही विवादित होकर हट चुके हैं। इससे मामले सुलझने की बजाए उलझता जाता है।
मामला चाहे गोधना गांव का हो या फिर दरवांसी, नवधन, मैलौना, रजमला, रामकिशुनपुर-बसहीं, मानशाहपुर, ऊंज-मुंगरहां, कुरमैचा, सुधवैं आदि गांवों का हर जगह तालाब की जमीन पर अतिक्रमण है। यही नहीं जमीनों पर आलीशान मकान, भवन, पेट्रोल पंप, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, होटल-ढाबों का संचालन, मत्स्य पालन, दुकान आदि चलने लगी हैं। वर्ष 2014 में गोधना गांव स्थित एक दर्जन तालाबों का स्थलीय निरीक्षण कर निवर्तमान एसडीएम रामजी चौबे ने तालाब की जमीन को खतौनी में दर्ज कराने का निर्देश दिया था, लेकिन छह वर्ष बीतने के बाद भी तालाब अपने मूल खाते में दर्ज नहीं हो सके। इसका मूल कारण यह रहा कि 1981 में 52 लोगों ने कूटनीतिक ढंग से 99 बीघे जमीन को पट्टा करा लिया था।
कब्जे के दौरान उत्पन्न विवाद तहसील तक पहुंचने पर पट्टों की पत्रावलियां गायब मिलीं, जिसके आधार पर एसडीएम ने पट्टे को इसलिए निरस्त कर दिया कि अधिकतर पट्टे की जमीन तालाब से जुड़ी थीं। शिकायतकर्ता अजय कुमार मौर्या, राजकुमार ने चेतावनी दी है कि जब तक तालाबों को मूल खाते में दर्ज नहीं करा दिया जाता, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे। उधर तहसीलदार देवेंद्र यादव का कहना है कि मामला संज्ञान में है। जब तक उच्चाधिकारी कोई फैसला नहीं लेंगे, तब तक समस्या का समाधान करा पाना संभव नहीं है।
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मामला चाहे गोधना गांव का हो या फिर दरवांसी, नवधन, मैलौना, रजमला, रामकिशुनपुर-बसहीं, मानशाहपुर, ऊंज-मुंगरहां, कुरमैचा, सुधवैं आदि गांवों का हर जगह तालाब की जमीन पर अतिक्रमण है। यही नहीं जमीनों पर आलीशान मकान, भवन, पेट्रोल पंप, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, होटल-ढाबों का संचालन, मत्स्य पालन, दुकान आदि चलने लगी हैं। वर्ष 2014 में गोधना गांव स्थित एक दर्जन तालाबों का स्थलीय निरीक्षण कर निवर्तमान एसडीएम रामजी चौबे ने तालाब की जमीन को खतौनी में दर्ज कराने का निर्देश दिया था, लेकिन छह वर्ष बीतने के बाद भी तालाब अपने मूल खाते में दर्ज नहीं हो सके। इसका मूल कारण यह रहा कि 1981 में 52 लोगों ने कूटनीतिक ढंग से 99 बीघे जमीन को पट्टा करा लिया था।
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कब्जे के दौरान उत्पन्न विवाद तहसील तक पहुंचने पर पट्टों की पत्रावलियां गायब मिलीं, जिसके आधार पर एसडीएम ने पट्टे को इसलिए निरस्त कर दिया कि अधिकतर पट्टे की जमीन तालाब से जुड़ी थीं। शिकायतकर्ता अजय कुमार मौर्या, राजकुमार ने चेतावनी दी है कि जब तक तालाबों को मूल खाते में दर्ज नहीं करा दिया जाता, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे। उधर तहसीलदार देवेंद्र यादव का कहना है कि मामला संज्ञान में है। जब तक उच्चाधिकारी कोई फैसला नहीं लेंगे, तब तक समस्या का समाधान करा पाना संभव नहीं है।
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