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Bhadohi News: 3.50 करोड़ से बने 24 मुक्तिधाम का हुआ 'अंतिम संस्कार'
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बेरासपुर में अंत्येष्टि स्थल का खराब टीनशेड। संवाद
कौलापुर/जंगीगंज। गंगा को निर्मल और स्वच्छ बनाने की मुहिम कालीन नगरी में फेल हो गई है। गंगा किनारे शव दाह के लिए दस साल पहले करीब तीन करोड़ 50 लाख की लागत से 24 स्थानों पर मुक्तिधाम बनाए गए थे। निगरानी और सुविधाएं नहीं होने से अब इन मुक्तिधामों का अंतिम संस्कार हो चुका है। 10 साल में यहां एक भी शव नहीं जलाया गया। कारण कि इनकी दूरी गंगा तट से लगभग 500 मीटर है। अब मुक्तिधाम नशेड़ियों और अराजकतत्वों का अड्डा बन चुका है।
जनपद में 45 किलोमीटर परिक्षेत्र में गंगा का दायरा है। साल 2014 में भाजपा सरकार बनने के बाद गंगा को निर्मल एवं अविरल बनाने की मुहिम शुरू की गई। नमामि गंगे योजना के तहत गंगा के किनारे शवदाह रोकने के लिए उससे सटे ग्राम पंचायतों में शवदाह गृह यानी अंत्येष्टि स्थल बनाने की योजना शुरू हुई। साल 2015-16 में गोपालापुर कलिंजरा, सेमराध, सीतामढ़ी, बरजी, बदरी, बिहरोजपुर, बेरासपुर, मवैया थान सिंह, दुगुना, खेमापुर सहित 21 ग्राम पंचायतों में इसका निर्माण शुरू हुआ। प्रत्येक अंत्येष्टि स्थल के निर्माण पर 15 लाख रुपये खर्च हुए। साल 2022-23 में तीन अन्य अंत्येष्टि स्थल 24-24 लाख की लागत से बनाए गए। निर्माण के समय प्रधान, सचिव और अन्य विभागीय अफसरों ने ध्यान नहीं दिया। यहां बिजली, पानी सहित अन्य मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। यही कारण है कि शव लेकर आने वाले लोग मुक्तिधाम यानी शवदाह गृह स्थल पर रुकने की बजाए गंगा के किनारे ही शवदाह कर रहे हैं।
केस एक :
बिहरोजपुर में अंत्येष्टि स्थल गंगा की तलहटी से करीब 400 मीटर दूर बना है। इससे कम ही लोग वहां शव का अंतिम संस्कार करने के लिए पहुंचते हैं। देखरेख के अभाव में अब यह बदहाल हो चुका है। टीनशेड टूट गए हैं।
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केस दो :
बेरासपुर और सेमराध अंत्येष्टि स्थल परिसर में शौचालय और हैंडपंप खराब हो चुका है। परिसर में गंदगी का अंबार है। गंगा तट से दूर होने के कारण लोग वहां शवदाह करने के लिए नहीं पहुंचते हैं।
बोले लोग
- गंगा के किनारे अंत्येष्टि स्थल का निर्माण अच्छी पहल थी। बेहतर व्यस्थाएं नहीं होने से यहां शवदाह नहीं होता है। कर्मचारियों की तैनाती होने से बदलाव आएगा। - मंटू पांडेय
- ग्राम पंचायतों की उदासीनता से अंत्येष्टि स्थलों की हालत खराब है। पेयजल, शौचालय, प्रकाश की सुविधा होनी चाहिए। ताकि लोग यहां शव जला सकें। - विनय पांडेय
गंगा के किनारे शवदाह गृह बनाना मुनासिब नहीं है। बाढ़ के समय बहाव से वे ध्वस्त हो जाते हैं। इस कारण गंगा तट से 200 से 500 मीटर की दूरी पर शवदाह गृह बनाए गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के कारण लोग उसमें जाने से बचते हैं। इसके लिए लोगों को जागरूक होने की जरूरत है। - संजय कुमार मिश्रा, डीपीआरओ।
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जनपद में 45 किलोमीटर परिक्षेत्र में गंगा का दायरा है। साल 2014 में भाजपा सरकार बनने के बाद गंगा को निर्मल एवं अविरल बनाने की मुहिम शुरू की गई। नमामि गंगे योजना के तहत गंगा के किनारे शवदाह रोकने के लिए उससे सटे ग्राम पंचायतों में शवदाह गृह यानी अंत्येष्टि स्थल बनाने की योजना शुरू हुई। साल 2015-16 में गोपालापुर कलिंजरा, सेमराध, सीतामढ़ी, बरजी, बदरी, बिहरोजपुर, बेरासपुर, मवैया थान सिंह, दुगुना, खेमापुर सहित 21 ग्राम पंचायतों में इसका निर्माण शुरू हुआ। प्रत्येक अंत्येष्टि स्थल के निर्माण पर 15 लाख रुपये खर्च हुए। साल 2022-23 में तीन अन्य अंत्येष्टि स्थल 24-24 लाख की लागत से बनाए गए। निर्माण के समय प्रधान, सचिव और अन्य विभागीय अफसरों ने ध्यान नहीं दिया। यहां बिजली, पानी सहित अन्य मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। यही कारण है कि शव लेकर आने वाले लोग मुक्तिधाम यानी शवदाह गृह स्थल पर रुकने की बजाए गंगा के किनारे ही शवदाह कर रहे हैं।
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केस एक :
बिहरोजपुर में अंत्येष्टि स्थल गंगा की तलहटी से करीब 400 मीटर दूर बना है। इससे कम ही लोग वहां शव का अंतिम संस्कार करने के लिए पहुंचते हैं। देखरेख के अभाव में अब यह बदहाल हो चुका है। टीनशेड टूट गए हैं।
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केस दो :
बेरासपुर और सेमराध अंत्येष्टि स्थल परिसर में शौचालय और हैंडपंप खराब हो चुका है। परिसर में गंदगी का अंबार है। गंगा तट से दूर होने के कारण लोग वहां शवदाह करने के लिए नहीं पहुंचते हैं।
बोले लोग
- गंगा के किनारे अंत्येष्टि स्थल का निर्माण अच्छी पहल थी। बेहतर व्यस्थाएं नहीं होने से यहां शवदाह नहीं होता है। कर्मचारियों की तैनाती होने से बदलाव आएगा। - मंटू पांडेय
- ग्राम पंचायतों की उदासीनता से अंत्येष्टि स्थलों की हालत खराब है। पेयजल, शौचालय, प्रकाश की सुविधा होनी चाहिए। ताकि लोग यहां शव जला सकें। - विनय पांडेय
गंगा के किनारे शवदाह गृह बनाना मुनासिब नहीं है। बाढ़ के समय बहाव से वे ध्वस्त हो जाते हैं। इस कारण गंगा तट से 200 से 500 मीटर की दूरी पर शवदाह गृह बनाए गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के कारण लोग उसमें जाने से बचते हैं। इसके लिए लोगों को जागरूक होने की जरूरत है। - संजय कुमार मिश्रा, डीपीआरओ।