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शिकायतों के पटल से तैयार हो रही चुनावी जमीन
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ज्ञानपुर। पंचस्थानीय चुुनाव की घोषणा भले अभी नहीं हुई है, लेकिन संभावित दावेदार दमखम के साथ तैयारी में जुट गए हैं। वर्तमान प्रधान की शिकायतों से चुनावी जमीन को तैयार की जा रही है। इसमें कुछ नए संभावित दावेदार तो कुछ पूर्व प्रधान शामिल हैं। सरकारी योजनाओं में धांधली का आरोप लगाकर कागज को सरकारी दफ्तर से लेकर गांव-गांव का चक्कर लगा रहे हैं।
2015 में चुनाव होने के बाद सभी की नजरें 2020 में होने वाले पंचायत चुनाव पर टिकी हुई थीं। 2019 से संभावित दावेदार तैयारी में भी जुट गए थे, हालांकि कोरोना वायरस के कारण चुनाव तय समय पर नहीं हो सका। अब शासन स्तर से सुगबुगाहट शुरू होने पर दावेदार तैयारी में जुट गए हैं। ग्राम पंचायत में पांच साल तक शौचालय, आवास, खड़ंजा, हैंडपंप, मनरेगा समेत अन्य योजनाओं में होने वाले कार्यों, अधूरे काम की एक-एक खामी को निकालकर आला अफसरों तक पहुंचा रहे हैं। धांधली में कुछ प्रधानों की गर्दन फंसी तो उन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी और कुछ अफसरों से तालमेल बिठाकर बच गए और आगामी चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए सारे हथकंडे अभी से अपना रहे हैं।
मठाधीश प्रधान विरोधियों को शांत कराने के लिए सुविधा शुल्क से लेकर थाने तक का सहयोग लेने से पीछे नहीं हट रहे, जबकि सामान्य प्रधान सरकारी दफ्तरों में अफसर से लेकर कर्मचारियों की जी हजूरी कर कुर्सी बचा रहे हैं। गांव की सरकार बनाने के लिए स्थानीय स्तर की राजनीति गरमाने लगी है। गांव के चट्टी-चौराहों पर चुनाव की चर्चा करने लगे हैं। पंचायत राज विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो पांच साल में 561 ग्राम पंचायतों में 200 से अधिक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इसमें 40 से 45 प्रधानों की कुर्सी चली गई, जबकि कई की फाइलें धूल फांक रही हैं। सहायक निर्वाचन अधिकारी डीएस शुक्ला का कहना है कि अभी मतदाता पुनरीक्षण का कार्य चल रहा है। चुनाव से जुड़ा कोई दिशा निर्देश अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। हालांकि विभाग अपने स्तर की तैयारियों को पूरा कराने में जुटा है।
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2015 में चुनाव होने के बाद सभी की नजरें 2020 में होने वाले पंचायत चुनाव पर टिकी हुई थीं। 2019 से संभावित दावेदार तैयारी में भी जुट गए थे, हालांकि कोरोना वायरस के कारण चुनाव तय समय पर नहीं हो सका। अब शासन स्तर से सुगबुगाहट शुरू होने पर दावेदार तैयारी में जुट गए हैं। ग्राम पंचायत में पांच साल तक शौचालय, आवास, खड़ंजा, हैंडपंप, मनरेगा समेत अन्य योजनाओं में होने वाले कार्यों, अधूरे काम की एक-एक खामी को निकालकर आला अफसरों तक पहुंचा रहे हैं। धांधली में कुछ प्रधानों की गर्दन फंसी तो उन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी और कुछ अफसरों से तालमेल बिठाकर बच गए और आगामी चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए सारे हथकंडे अभी से अपना रहे हैं।
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मठाधीश प्रधान विरोधियों को शांत कराने के लिए सुविधा शुल्क से लेकर थाने तक का सहयोग लेने से पीछे नहीं हट रहे, जबकि सामान्य प्रधान सरकारी दफ्तरों में अफसर से लेकर कर्मचारियों की जी हजूरी कर कुर्सी बचा रहे हैं। गांव की सरकार बनाने के लिए स्थानीय स्तर की राजनीति गरमाने लगी है। गांव के चट्टी-चौराहों पर चुनाव की चर्चा करने लगे हैं। पंचायत राज विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो पांच साल में 561 ग्राम पंचायतों में 200 से अधिक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इसमें 40 से 45 प्रधानों की कुर्सी चली गई, जबकि कई की फाइलें धूल फांक रही हैं। सहायक निर्वाचन अधिकारी डीएस शुक्ला का कहना है कि अभी मतदाता पुनरीक्षण का कार्य चल रहा है। चुनाव से जुड़ा कोई दिशा निर्देश अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। हालांकि विभाग अपने स्तर की तैयारियों को पूरा कराने में जुटा है।
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