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छठ पूजा की खबर..........

Mon, 31 Oct 2022 12:30 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 31 Oct 2022 12:30 AM IST
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chhath puja
सीतामढ़ी गंगा घाट पर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य देती व्रती महिलाएं। संवाद - फोटो : BHADOHI
ज्ञानपुर। मन में श्रद्धा और भक्ति का उल्लास और छठी मइया से परिवार के सुख-समृद्धि की कामना को लेकर व्रती महिलाओं ने रविवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया। महिलाओं की अगाध श्रद्धा और कठोर तप वाले पर्व पर घाटों पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। निराजल व्रत रखने वाली महिलाओं ने घुटने भर पानी में खड़े होकर अस्त होते भगवान भास्कर को जल अर्पित किया तो पूरा परिसर छठी मइया के जयकारे से गूंज उठा। लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा को लेकर रविवार की दोपहर बाद से ही लोग गाजे-बाजे के साथ नदी और तालाबों पर पहुंचने लगे। दिव्य प्रकाश और छठी मइया के गीतों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। छठी मइया के पारंपरिक और नए लोक गीतों को गाती-गुनगुनाती महिलाए हाथों में दीप लिए घाटों पर पहुंची। पीछे-पीछे सिर पर दउरा और कांधे पर ईख लेकर चल रहे पुरुष भी छठी मइया की भक्ति में तल्लीन दिखे। तेजस्वी पुत्र और परिवार की सुख समृद्धि की कामना को लेकर नगर से लेकर गांव-देहात तक महिलाओं ने निराजल व्रत रखा था।
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जिले के रामपुर, सीतामढ़ी, धनतुलसी घाट, कलिजरा, भोगांव, पारीपुर, फुलौरी, इटहरा, बेरवा पहाड़पुर, पुरवां, जगन्नाथपुर सहित ज्ञानसरोवर और अन्य ताल तलैया पर चार बजे के बाद से ही व्रती महिलाओं की भीड़ जुटने लगी। शाम होते-होते घाटों पर पैर रखने की जगह नहीं बची। अपनी-अपनी वेदियों के सामने पूजन सामग्री रख व्रती महिलाएं नदी में पश्चिम मुख किए खड़ी थी, तो साथ के लोग घाट पर थे। अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने का समय आया, तो सभी के हाथ आगे बढ़ते गए। व्रती महिलाओं के साथ परिवार के अन्य सदस्यों ने अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया। वेदियों पर पूजन-अर्चन के बाद दीप जलाए गए। दीप जलते नदी के घाट जगमगा उठे। विद्युत झालरों से सजे घाट दुधिया रोशनी से नहा उठे। इस दौरान घाटों पर भीड़ पर नजर रखने के लिए पुलिस के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
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ज्ञानपुर। लोक आस्था के महापर्व डाला छठ के प्रति लोगों की आस्था और विश्वास इतना अटूट है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता चला आ रहा है। कहीं बेटी मां की परंपरा का निर्वहन कर रही है तो कहीं बहू अपने सास की जिम्मेदारियों को निभा रही है। कुछ ऐसी परंपराओं का निर्वहन कर रही हैं पूनम चौधरी और प्रियंका। कहने को तो दोनों के बीच ननद-भौजाई का रिश्ता है, लेकिन यह रिश्ता सगी बहनों से कम नहीं है। इन दोनों ने अपनी मां और सास की परंपरा का निर्वहन इतनी निष्ठा किया है कि हर साल ये डाला छठ पर घर लौटना नहीं भूलती। ज्ञानपुर के पानमति देवी की बिटिया पूनम चौधरी की शादी दिनेश चौधरी से हुई है। पेशे से एकाउंटेंट हैं और मुंबई में रहते हैं। पूनम का कहना है कि हमारी मां वर्ष 1970 से ही छठ करती थी। जब हम छोटे थे तो मां को छठ करता देख उत्साहित होते और तय किया था कि मां की इस परंपरा हो हमेशा निभाती रहूंगी। शादी के बाद जब मैंने अपने पति दिनेश से इच्छा जाहिर की तो न सिर्फ उन्होंने अपनी सहमति दी, बल्कि मेरे साथ वह भी छठी मइया का व्रत करने को तैयार हो गए। वह दिन है और आज का दिन आज सात साल से हम पति-पत्नी हर साल डाला छठ के अवसर पर मुंबई से यहां आते हैं और पूजन-अर्चन करते हैं। दूसरी तरफ पानमति देेवी की बहू प्रियंका ने बताया कि उनकी सास उन्हें बेटी की तरह ही मानती हैं। उनकी बढ़ती उम्र को देखते हुए हमने उनके स्थान पर व्रत करने का निर्णय लिया। छठी मइया के आशीर्वाद से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि रहती है। इसी तरह नई बाजार निवासी ज्योति सेठ, जिनके पति मुंबई में सर्विस करते हैँ, वे भी हर साल अपने पति के साथ डाला छठ पर घर आती हैं और छठी मइया का व्रत करती हैं।
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छठी मइया के प्रति अटूट आस्था का आलम यह है कि महिलाओं की उम्र भी उसके आड़े नहीं आती है। कहते हैँ छठ व्रत कठिन व्रतों में एक होता है। इसमें महिलाओं को न सिर्फ 36 घंटे का कठोर व्रत रखना पड़ता है, बल्कि ठंड में सरोवर और तालाब के पानी में घुटने भर रहकर भगवान भास्कर के उदय होने का इंतजार करना पड़ता है। इसके बाद भी 60 और 70 साल की उम्र में भी महिलाएं छठ व्रत करती आ रही हैं। इसीपुर मोहम्मदाबार निवासी भागीरथी देवी इसका जागता उदाहरण हैं। वर्ष 1977 से व्रत करती आ रही हैं। इस समय इनकी उम्र 65 साल हैं, लेकिन उनके हौसले 16 साल वाले हैं। पूछने पर कहती हैँ कि छठी मइया जब तक हिम्मत दिहन तब तक बरत करत रहबल।
इनके साथ इनकी बेटी मनीता भी करती छठ पूजा करती हैं। छोटा डीह निवासी शिवकुमारी 1980 से छठ पूजा कर रही हैं। उनका कहना है कि पहले छठ पूजा पर इतनी भीड़ नहीं रहती थी। वे और उनकी बहनें ही छठ का व्रत करती थीं। कुछ और महिलाएं भी आती थी, लेकिन अब धीरे-धीरे सारी चीजें बदल गई है। छठी मइया के कृपा से अब यह त्योहार एक उल्लास की तरह लगता है। इस उम्र में भी व्रत करने के सवाल पर कहती हैं कि छठी मइया का आशीर्वाद है और उन्हें कभी व्रत के दौरान कमजोरी या अन्य परेशान महसूस नहीं होती है। बालीपुर ज्ञानपुर निवासी यशोदा देवी सन 1960 से ही व्रत कर रहीं है, लेकिन घर वालों के दबाव पर छोड़ दिया। अब उनके स्थान पर उनकी बहू अनीता व्रत करती हैं।

सुरियावां। क्षेत्र के प्राचीन बावनबीघा घाट पर इस बार एक भी व्रती महिला नहीं पहुंची। हर साल इस घाट पर सैकड़ों महिलाएं पहुंचती थीं। प्रशासन और स्थानीय लोगों के तमाम इंतजाम के बाद भी इस घाट पर इस बार एक भी महिला नहीं पहुंची। चूंकि यह घाट पक्का घाट है। इसलिए उम्मीद लगाई जा रही थी कि इस बार अधिक संख्या में महिलाएं पहुंचेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। स्थानीय लोगों का मानना था कि गांव-गांव में अमृत सरोवर के निर्माण के कारण इस बार बावनबीघा घाट पर महिलाओं का जमावड़ा नहीं हुआ।
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