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हिंदु मुस्लिम एकता की अनूठी मिशाल का नाम है अमरनाथ
Updated Sat, 22 Sep 2018 12:38 AM IST
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ज्ञानपुर। जिला मुख्यालय से लगे देवाजीतपुर गांव में कौमी एकता की अनूठी इबारत लिखी जा रही है। जो यह बताने के लिए काफी है कि अल्लाह और भगवान एक हैं। इस गांव में दो हिंदू परिवार मिलकर गांव के मुस्लिम भाइयों के लिए पिछले 20 साल से ताजिया बनाते हैं। इसमें गांव के सभी जाति और मजहब के लोग अपना योगदान करते हैं। यहां दोनों धर्मों के लोग एक-दूसरे के त्योहार मिलकर मनाते हैं। इससे यहां जितनी रौनक ईद और मोहर्रम पर होती है, उतनी ही होली और नवरात्र पर।
देवाजीतपुर गांव निवासी अमरनाथ प्रजापति और राजनाथ उपाध्याय गांव में रहने वाले मुस्लिम भाइयों के लिए पिछले 20 साल से मोहर्रम की ताजिया बनाते हैं। यही नहीं वह ताजिया जुलूस में शामिल होने के साथ ज्ञानपुर करबला ईदगाह पर खुद ताजिया बैठाते भी हैं। अमरनाथ ने बताया कि जब वह पांचवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे, उसी दौरान मेरी शादी हो गई। शादी के करीब 10 साल बाद तक मेरी पत्नी को कोई बच्चा नहीं हुआ। इससे समाज में धीरे-धीरे कई तरह की बातें होने लगीं। तिरस्कृत महसूस करने लगा तो कुछ लोगों के कहने पर मैंने इमाम से मन्नत मांगी। बताया कि अगले ही वर्ष मन्नत पूरी हो गई। तबसे इमाम के प्रति उनकी अटूट श्रद्घा ने मन में जगह बना ली। तब से लेकर आज तक वह प्रतिवर्ष बिना किसी बिना पैसे के मुहर्रम पर गांव में रहने वाले मुस्लिमों के लिए ताजिया बनाते हैं। इसमें गांव के ही राजनाथ उपाध्याय भी उनकी मदद करते हैं। इसके चलते गांव में हर त्योहार प्रेम और सौहार्द के साथ मनाया जाता है। अमर उजाला से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि गांव में सभी एक दूसरे के धर्म को मानते हैं। यहां कोई धार्मिक भेदभाव नहीं है। वह जब तक जिंदा रहेंगे, इमाम के लिए ताजिया बनाते रहेंगे।
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देवाजीतपुर गांव निवासी अमरनाथ प्रजापति और राजनाथ उपाध्याय गांव में रहने वाले मुस्लिम भाइयों के लिए पिछले 20 साल से मोहर्रम की ताजिया बनाते हैं। यही नहीं वह ताजिया जुलूस में शामिल होने के साथ ज्ञानपुर करबला ईदगाह पर खुद ताजिया बैठाते भी हैं। अमरनाथ ने बताया कि जब वह पांचवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे, उसी दौरान मेरी शादी हो गई। शादी के करीब 10 साल बाद तक मेरी पत्नी को कोई बच्चा नहीं हुआ। इससे समाज में धीरे-धीरे कई तरह की बातें होने लगीं। तिरस्कृत महसूस करने लगा तो कुछ लोगों के कहने पर मैंने इमाम से मन्नत मांगी। बताया कि अगले ही वर्ष मन्नत पूरी हो गई। तबसे इमाम के प्रति उनकी अटूट श्रद्घा ने मन में जगह बना ली। तब से लेकर आज तक वह प्रतिवर्ष बिना किसी बिना पैसे के मुहर्रम पर गांव में रहने वाले मुस्लिमों के लिए ताजिया बनाते हैं। इसमें गांव के ही राजनाथ उपाध्याय भी उनकी मदद करते हैं। इसके चलते गांव में हर त्योहार प्रेम और सौहार्द के साथ मनाया जाता है। अमर उजाला से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि गांव में सभी एक दूसरे के धर्म को मानते हैं। यहां कोई धार्मिक भेदभाव नहीं है। वह जब तक जिंदा रहेंगे, इमाम के लिए ताजिया बनाते रहेंगे।
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