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सवर्णों और अति पिछड़ों ने लिखी जीत की पटकथा
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ज्ञानपुर। 2019 के महासमर में भदोही सीट पर जीत की पटकथा सवर्णों और अति पिछड़ों ने लिखी। 19 लाख 40 हजार मतों में करीब 11 लाख वोट सवर्ण और अति पिछड़ों का रहा। अति पिछड़ों ने 2014 से अधिक लामबंदी दिखाई और चुपचाप अपना मत डाल दिया। 2004 के बाद भदोही सीट पर ओबीसी वर्ग का सांसद बना।
आजादी के बाद भदोही- मिर्जापुर के नाम से संसदीय सीट जानी जाती थी, लेकिन वर्ष 2009 में परिसीमन के बाद भदोही सीट अस्तित्व में आई। 2014 की तरह 2019 के चुनाव में जनता ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए अपना वोट डाला। जिले की ज्ञानपुर, औराई, भदोही और प्रयागराज की प्रतापुर और हंडिया विधानसभाओं को मिला कर कुल 19 लाख 40 हजार मतदाताओं में 12 मई को 10 लाख 39 हजार वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। मतगणना के बाद आकलन में जो बात सामने आई उसमें यह देखा गया कि भाजपा की जीत में सवर्ण और अति पिछड़े वोटर निर्णायक की भूमिका में रहे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ आदि के मत साढ़े पांच लाख से अधिक रहे तो बिंद, मौर्य, पाल, चौहान, नाई, कुम्हार जैसी-जैसी छोटी- छोटी जातियों के मत भी पांच लाख 50 हजार के करीब रहे। भाजपा और गठबंधन के वोट प्रतिशत में मात्र तीन फीसदी के आसपास का अंतर रहा। ऐसे में माना जा रहा है कि सवर्ण और अति पिछड़ों की दमदार वोटिंग भाजपा की जीत में निर्णायक की भूमिका निभाई। रमेश चंद्र बिंद ने जीत दर्ज कर करीब डेढ़ दशक से ओबीसी श्रेणी से भदोही सांसद के सूखे को भी समाप्त किया। 2004 में नरेंद्र कुमार कुशवाहा के बाद लगातार सामान्य वर्ग के ही सांसद रहे। 2007 के उपचुनाव में बसपा के रमेश दूबे, 2009 के चुुनाव में बसपा के गोरखनाथ पांडेय जबकि 2014 में भाजपा के ही वीरेंद्र सिंह सदन में पहुंचे।
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आजादी के बाद भदोही- मिर्जापुर के नाम से संसदीय सीट जानी जाती थी, लेकिन वर्ष 2009 में परिसीमन के बाद भदोही सीट अस्तित्व में आई। 2014 की तरह 2019 के चुनाव में जनता ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए अपना वोट डाला। जिले की ज्ञानपुर, औराई, भदोही और प्रयागराज की प्रतापुर और हंडिया विधानसभाओं को मिला कर कुल 19 लाख 40 हजार मतदाताओं में 12 मई को 10 लाख 39 हजार वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। मतगणना के बाद आकलन में जो बात सामने आई उसमें यह देखा गया कि भाजपा की जीत में सवर्ण और अति पिछड़े वोटर निर्णायक की भूमिका में रहे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ आदि के मत साढ़े पांच लाख से अधिक रहे तो बिंद, मौर्य, पाल, चौहान, नाई, कुम्हार जैसी-जैसी छोटी- छोटी जातियों के मत भी पांच लाख 50 हजार के करीब रहे। भाजपा और गठबंधन के वोट प्रतिशत में मात्र तीन फीसदी के आसपास का अंतर रहा। ऐसे में माना जा रहा है कि सवर्ण और अति पिछड़ों की दमदार वोटिंग भाजपा की जीत में निर्णायक की भूमिका निभाई। रमेश चंद्र बिंद ने जीत दर्ज कर करीब डेढ़ दशक से ओबीसी श्रेणी से भदोही सांसद के सूखे को भी समाप्त किया। 2004 में नरेंद्र कुमार कुशवाहा के बाद लगातार सामान्य वर्ग के ही सांसद रहे। 2007 के उपचुनाव में बसपा के रमेश दूबे, 2009 के चुुनाव में बसपा के गोरखनाथ पांडेय जबकि 2014 में भाजपा के ही वीरेंद्र सिंह सदन में पहुंचे।
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